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मारवाड़ी भाषा एक परिष्कृत भाषा है : इन्दु तोदी

 

इन्दु तोदी, धरान (नेपाल) । मारवाड़ी भाषा एक परिष्कृत, सुसंस्कृत भाषा है। वक्ताओं की दृष्टि से भारतीय भाषाओं में राजस्थानी भाषा का 7वां स्थान तथा विश्व की भाषाओं में राजस्थानी भाषा का 16 वां स्थान माना जाता है। उद्योतन सुरी ने 8 वीं शताब्दी में अपने ग्रंथ कुवलयमाला में 18 देशी भाषाओं में मरु भाषा अर्थात मारवाड़ी भाषा को भी सामिल किया था। विश्वभर में करीब 12 करोड़ मारवाड़ी भाषी होने की पुष्टि हो चुकी है।
मारवाड़ी बोली पश्चिमी राजस्थान,हरियाणा, मालवा के साथ साथ उसके निकटवर्ती इलाके एवम् पाकिस्तान, नेपाल में भी बोली जाती है। मारवाड़ी बोली का प्राचीन नाम मरुभाषा है।
पूर्वकाल में इसकी अपनी खुदकी लिपी मोड़िया लिपी जिसे महाजनी लिपी भी कहते हैं होने के काफी प्रमाण मिले हैं किन्तु उस समय के राजे रजवाड़े एवम् बाद की सरकार के ध्यान न देने की वजह से यह लिपी लुप्त हो गयी और उस की जगह देवनागरी लिपी ने ले ली।मारवाड़ी बोली के साहित्यिक रूप को डिंगल कहते है।
मारवाड़ी बोली के उद्भव (उत्पत्ति) गुर्जर अपभ्रंश से हुआ मानते हैं । हालांकि इस विषय में अलग-अलग विद्वानों के अलग-अलग मत है। इस की उत्पत्ति 8 वीं सदी में ही हो चुकी थी ऐसा वेत्ताओं का मानना है।
मारवाड़ी बोली पर सर्वाधिक प्रभाव गुजराती भाषा का रहा है। देखा जाए तो मारवाड़ी और नेपाली भाषा भी आपस में काफी मिलती जुलती है जैसे- पानी-पाणी, समधी-समधी,राजी-राजी गीत-गीत इत्यादि ।
इस को राजस्थान की प्राचीनतम बोली माना जाता है।
➯जैन साहित्य एवं मीरा की अधिकांश रचनायें इसी भाषा में है। जैसे-
राजिया रा सोरठा, वेलि क्रिसन रुकमणी री, ढोला-मरवण, मूमल आदि लोकप्रिय काव्य मारवाड़ी भाषा में ही रचित है।
पद्म श्री सीतारामलालास ने राजस्थानी भाषा का शब्दकोश बनाया है जिस शब्दकोश में 2 लाख से अधिक शब्द हैं।
मारवाड़ी भाषा का प्रथम व्याकरण रामकरण आसोपा है।
नेपाल में मारवाड़ी भाषा की अवस्था देखी जाए तो- यहाँ बोली जाने वाली कुल १३१ भाषाओं में से एक मारवाड़ी भाषा भी है साथ ही नेपाल में नेपाली नागरिक द्वारा बोली जाने वाली अपनी अपनी मातृ भाषाओं को संविधान की धारा 6 में राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया गया है इस अनुसार हमारी मारवाड़ी भाषा भी राष्ट्रीय भाषा अन्तर्गत की भाषा में आ गई है। नेपाल में जनसंख्या के आधार पर 10 हजार से 1 लाख तक के लोगों की बोलने वाली 37 भाषा में से एक मारवाड़ी भाषा भी आती है।किन्तु इसे फिलहाल राजस्थानी भाषा के नाम से मान्यता दि गई है ।
मारवाड़ी भाषा एक सुसंस्कृत, परिष्कृत, मिठी भाषा है इस में किसी की दो राय नही है इसके बावजूद वर्तमान में मारवाड़ी समुदाय में इसका प्रयोग काफी कम होता दिखाई जान पड़ रहा है इस की जगह इंग्लिश और हिन्दी भाषा को दी जाने लगी हैं आज कोई मारवाड़ी बोलता भी है तो लोग उसे गंवार जाहिल की संज्ञा दे देते हैं जो बिल्कुल भी गलत है। हमारे जीवन में जो स्थान माँ का होता है वही स्थान हमें मातृभाषा अर्थात माँ की भाषाको भी देना चाहिए क्योंकि कहीं भी हमारी अपनी पहचान अपनी भाषा, वेषभूषा और संस्कृति से ही सुनिश्चित होगी अतः हर मातृभाषीको अपनी अपनी मातृभाषा के संरक्षण, संवर्धन हेतू हर सम्भव प्रयास करने चाहिए साथ ही हर देश की सरकारको भी हरेक की भाषाको महत्व और संविधान में मान्यता और अधिकार अवश्य देना चाहिए, शिक्षा प्रणाली में भी सामिल करना चाहिए।

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