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बैल पूजा से जुड़ा जाच्छ पंचायत के काण्डा गाँव का “शकूरा देवोत्सव” धूम–धाम से सम्पन्न

 

एक ऐतिहासिक घटना को स्मरण करवाता यह अनोखा देवोत्सव आज भी जीवंत

हिमाचल प्रदेश जिला मण्डी में यह परम्परा आज भी जीवंत है । आधुनिक काल में जहां पशुधन विशेषकर बैल मशीनी युग के कारण उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं ऐसे समय में जाच्छ पंचायत में बैल पूजा का विधान नि:संदेह वैदिक कालीन पशुचारण, सामाजिक व सांस्कृतिक व्यवस्था का स्मरण दिलाता है। सुकेत की प्राचीन राजधानी पांगणा के जाच्छ-चरखड़ी सड़क पर छोलगढ़ के आंचल में प्राकृतिक सुषमा और पुरातात्विक धरोहर के लिए प्रसिद्ध काण्ढा नामक स्थान पर नृसिंह भगवान का मंदिर संपूर्ण मंदिर मण्डी- सुकेत क्षेत्र में पशुधन वृद्धि,रोग निवारण भूत-बाधा,महामारी निवारण और फसलों की वृद्धि के लिए विख्यात है।नाचन निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत इस गांव का सांस्कृतिक परिदृश्य सनातन परंपरा का जीवंत उदाहरण है काण्ढा गांव में नृसिंह भगवान का पैगोड़ा मंडपीय शैली का बहुत सुंदर कलात्मक मंदिर बना है।मंदिर के समीपस्थ नृसिंह भगवान के वृषभ रुप दो गण राम्बी और चाम्बी का लघु मंदिर स्थित है। मंदिर में दोनों गणों के विग्रह बैल के रूप में विराजमान हैं।नृसिंह भगवान का मूल मंदिर झुंगी पंचायत की खड्ड के किनारे स्थित है। इस मंदिर में भी दोनो गणों के बैलरुप में विग्रह विराजमान हैं।इस गांव का नाम देव के नाम से ही जाना जाता है। इस स्थान पर जुड़ा लोकाख्यान यहाँ भगवान नृसिंह व दोनों वृषभ देवों की प्रतिष्ठा को उद्घाटित करता है।सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डाक्टर हिमेन्द्रबाली’हिम”जी का कहना है कि नाहरसिंह नामक यह किसान सिद्ध पुरुष था।इसका जन्म झुंगी पंचायत के बडीउली गांव में अत्यंत गरीब परिवार में हुआ था।बाल्यावस्था से ही यह बालक माता भीमाकाली का भक्त था।नाहर संगीतज्ञ और इतिहासकार भी था।सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में इस नृसिंह नामक गांव के एक खेत में नाहरसिह नाम का यह कठोर परिश्रमी किसान धान की रोपाई करने पहुंचा। नाहरसिंह ने चतरोग गांव से बैल और बखारी गांव से हल लाकर अपने खेत को अभी जितना शुरू ही किया था कि वह जुते हुए बैलों की जोड़ी सहित भूमिगत हो गया।देखते ही देखते उस स्थान पर एक प्रस्तर प्रतिमा प्रकट हुई।पास के खेलों में कार्य कर रहे लड़ू,पराग,खोला और चलाह के किसानों ने यह दृश्य देखा तो वे डर गए।नाहर कुछ समय बाद दिल्ली में भूमि से प्रकट हुआ। इस अद्भुत घटना के बारे में जब बादशाह अकबर को पता चला तो उसने उस हलधर को बुलाकर पूछा कि जूते बैलों की जोड़ी सहित तुम कहां थे प्रकट हुए हो?तुम कौन हो? आखिर कहां से आए हो?नाहरसिंह ने उत्तर दिया कि “हल्दणु हल्दणु सीड गराओ,राम्बी-चाम्बी लब्ध नाहरसिंह मेरा नाओं।” अर्थात मेरा नाम नाहरसिंह और राम्बी-चाम्बी यह दो मेरे बैल हैं जो हल चलाते समय मैं यहां प्रकट हुआ हूं। इस चमत्कारिक घटना से प्रभावित होकर मुगल बादशाह ने नाहरसिंह को सम्मानित करने का ऐलान किया।इससे पहले कि मुगल बादशाह नाहर सिंह को सम्मानित करते नारसिह बैलों सहित दरवारी से ओझल हो गया।बादशाह ने तीन सैनिक नाहरसिंह के मूल स्थान को खोजने के लिए भेजे।मीलों लम्बी यात्रा करने के बाद जब ये सैनिक सीड नामक उस स्थान पर आए । जहां नाहरसिंह अलौकिक रूप से भूमिगत होकर दिल्ली में प्रकट हुए तो देवीकोप से सिंह के प्रकट होने के साथ उन्होंने एक पत्थर सिंह पर फैंका।यह पत्थर गर्छन् करते हुए इन सैनिकों को पीछे धकेलते आगे बढ़ती गई।परिणामस्वरूप बादशाह के लोग पीछे लौटते गये।आज भी यह प्रक्षेपित शिला जाच्छ पंचायत के काण्ढा नामक स्थान पर अदृश्य हो गयी।यहां एकत्रित लोगों में से मकराहड़ गांव के एक व्यक्ति ने भावावेश में आकर इस चमत्कारी पत्थर को ढूंढ लिया।लोगों ने इस शिला को मंदिर का निर्माण कर स्थापित कर दिया।यही नृसिंह और राम्बी और चाम्बी नामक दोनों वृषभ गणों के दो मंदिर हैं।नृसिंह देव जी के मुख्य गूर लोकराज का कहना है कि काण्ढा में हर चौथे वर्ष देवता के क्षेत्र वासी(हार” के लोग) लोक देवता और उनके दोनों बैलों के सम्मान में “शकूरा” नामक एक बड़े वृषभ यज्ञ का आयोजन करते हैं। इस बार यह यज्ञ माघ शुक्ल नवमी को 21 फरवरी को पारंपरिक ढंग से मनाया गया।इस अवसर पर संपूर्ण मंडी-सुकेत क्षेत्र के अतिरिक्त हिमाचल के अन्य जिलों से श्रद्धालुओं ने भी यहाँ आकर नृसिंह देवता के साथ दोनों बैलों के श्री विग्रह की पूजा कर आशीर्वाद ग्रहण किया।नृसिंह के गूर लोकराज का कहना है कि इस अनुष्ठानिक देवोत्सव पर देव आह्वान कर देव खेल का आयोजन किया गया।देवगुरो ने आगत जनता को आशीष प्रदान किया। राम्बी और चाम्बी नामक बैलों के गुर बीटु ने बैल की प्रकृति के अनुरूप भाव भंगीमाए बना कर लोगों को आशीष प्रदान किया। नृसिंह देव और ऋषभदेव के मूल स्थान नृसिंह गांव मे भी ऋषभदेव का मूल मंदिर अवस्थित है यहाँ वह खेत भी है जहाँ नाहरसिंह जुते बैलों सहित भूमिगत होकर दिल्ली में यथारूप प्रकट हो गये।संस्कृति मर्मज्ञ डाक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि आज भी गांव में या परंपरा है कि घटना से जुड़े खेत में जब धान रोपनी(रुहणी)अर्थात धान की पहले पौध की शाखाएं बृषभ देव को अर्पित कर फिर खेत में रोपी जाती हैं। धान का पहला अंश (चावल)पकाकर उसकी मांड को राम्बी-चाम्बी की मूर्ति के समक्ष पत्थर पर बड़ी मात्रा में रखा जाता है। जिसे चमत्कारिक रूप में बृषभ देवों द्वारा ग्रहण किया जाता है।सारी माण्ड क्षण भर में आंखों के समक्ष बृषभ गणों द्वारा ग्रहण कर ली जाती है।चावल का पहला भोग बृषभ गणों को ही चढ़ाया जाता है।”शकूरा” देवोत्सव के अतिरिक्त नृसिंह देव हर सात वर्ष बाद गांव- गांव के फेर पर निकलते हैं।नृसिंह के प्रभाव से क्षेत्र में पशुओं के खुरो का घातक रोग खुरपा भी नहीं होता।नृसिंह मंदिर समिति के प्रधान ओम प्रकाश ठाकुर का कहना है इस बार “शकूरा उत्सव” कोरोना की महामारी के शमन के संकल्प के साथ आयोजित किया गया है।सैकड़ों की संख्या में लोगों ने यहां आकर अपने दुख देने के समन की नृसिंह देव जी और राम्बी-चाम्बी बैल रूपी देवगणो से प्रार्थना की।नवगठित जाच्छ पंचायत की युवा प्रधान सोमावती का कहना है कि विविध प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर नृसिंह मंदिर के परिसर में पंचवटी का निर्माण किया जा रहा है।इस स्थल का विकास कर पर्यटकों और श्रद्धालुओं को तमाम सुविधाएं विकसित की जाएंगी।ताकि यहाँ आने वाले न केवल एक बार अपितु बार-बार यहाँ आने की तमन्ना लेकर आएं।मंदिर औ देवोत्सवो की व्यवस्था के लिए एक कमेटी का गठन किया गया है। जिसमें ज्ञान चंद मुख्य सलाहकार,ओम प्रकाश ठाकुर प्रधान,सचिव भगवान दास,कुठियाला लच्छीराम,कोषाध्यक्ष अमर सिंह हैं पुजारी कुशालचंद शर्मा जी हैं। देव वाद्य के प्रमुख (कौड़ु) शिवदयाल, शहनाई वादक छज्जीराम,प्रमुख ढोली तीहरूराम,प्रमुख नागरी बोधराज,करणालची ज्ञान और दुनी,रणसिघा दिलाराम, भाणा वादक मीनाराम तथा काहुली वादक बरमेश्वर और मीनाराम हैं। देवता के छतरैही रूप चंद हैं।हर माह की संक्राति को देव वाद्ययंत्रों की विविध धुनों पर मंदिर में देव आवाह्न होता है।मन्नौतियां पूरा होने पर देव वाद्ययंत्रों की धुनों के साथ देवता का रथ यजमान के घर पहुंच कर आशीर्वाद प्रदान करते हैं।वार्षिक काण्ढा मेला तथा सात वर्षों बाद देवता वाद्ययंत्रों की धुनों के साथ अपनी “हार” (प्रजा क्षेत्र के गांवों)की पद यात्रा कर कुचाली शक्तियों से गांव गांव की रक्षा के लिए दिग्बंधन करते हैं।-

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डाक्टर हिमेन्द्रबाली’हिम”कुमारसैन।

-डाक्टर जगदीश शर्मा पांगणा।
-राज शर्मा आनी।

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