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प्रधानमन्त्री ओली का असंवैधानिक कदम और कमजोर अन्य दल : लिलानाथ गौतम

 

लीलानाथ गौतम, हिमालिनी पत्रिका फ़रवरी अंक । प्रधानमन्त्री केपीशर्मा ओली तथा उनके समूह से आबद्ध सत्ताधारी नेता का कहना है कि वैशाख १७ और २७ गते के लिए घोषित आमचुनाव निर्धारित मिति में होनेवाला है और उसको रोकने की ताकत किसी के पास भी नहीं है । लेकिन सत्ताधारी समूह के अलावा अन्य किसी भी राजनीतिक शक्ति को विश्वास नहीं है कि वैशाख में चुनाव होनेवाला है । चुनाव के लिए निर्धारित मिति वैशाख १७ गते आने में अब सिर्फ ३ महीने बाकी हैं । चुनाव करवाना ही है तो आज तक सभी राजनीतिक शक्तियों चुनाव के लिए मानसिक रूप में तैयार करवाना चाहिए था । लेकिन परिस्थिति ऐसी नहीं है । सिर्फ सत्ताधारी नेताओं की ओर से चुनाव के पक्ष में हो रहे भाषणबाजी में आम जनताको विश्वास भी नहीं है ।
वर्तमान में नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (नेकपा)के प्रचण्ड–माधव समूह, नेपाली कांग्रेस और जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) ही प्रमुख राजनीतिक शक्ति है । यह तीनों ही शक्ति का कहना है कि संसद् विघटन असंवैधानिक है, संसद् पुनस्र्थापना ही उपर्युक्त विकल्प है । वैसे तो प्रमुख प्रतिपक्षी दल नेपाली कांग्रेस के सभापति शेरबहादुर देउवा और जसपा के कुछ शीर्ष नेता चुनाव के पक्षधर भी दिखाई देते हैं । लेकिन जो चुनाव के पक्षधर हैं, वे लोग खुद अपनी पार्टी में ही अल्पमत में हैं । ऐसी अवस्था में चुनावी माहौल बनने की संभावना नहीं है ।

दूसरी तरफ संसद् विघटन संबंधी मुद्दा सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है, अदालत की संवैधानिक इजलास में इसके संबंध में बहस भी हो रही है । ऐसी अवस्था में संसद् विघटन के विरुद्ध सड़क संघर्ष में रहे राजनीतिक शक्ति सरकार एवं सत्ताधारी दलों को मनाकर चुनाव में जाने की संभावना नहीं है । ऐसी पृष्ठभूमि में प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली सत्ता में खुद को मजबूत करने में लगे हैं । पिछली बार उन्होंने कई संवैधानिक निकायों में पदाधिकारी नियुक्त किया है । संवैधानिक आयोग में पदाधिकारी नियुक्ति संबंधी विषयों को लेकर ही सड़क संघर्ष में रहे प्रचण्ड–माधव समूह ने एक दिन का आमहड़ताल भी घोषणा किया। सिर्फ प्रचण्ड–माधव समूह का ही नहीं, अन्य राजनीतिक शक्ति, संवैधानिक और कानूनी क्षेत्र से जुड़े हुए विज्ञों का मानना है कि प्रधानमन्त्री ओली कई बहानेबाजी में राज्य शक्ति को अपनी और खीचते जा रहे हैं । विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता में बने रहने के लिए ही प्रधानमन्त्री ओली यह सब कर रहे हैं । नेपाली कांग्रेस के नेता गगन कुमार थापा का कहना है कि यह उनकी निरंकुशता है, सत्ता में हरदम बने रहने की चाहत के कारण ही आज प्रधानमन्त्री ओली संविधान और कानूनी मूल्य–मान्यता के विपरित काम करते जा रहे हैं ।

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लेकिन प्रधानमन्त्री तथा उनके इर्दगिर्द रहे नेताओं का कहना है कि आज के दिन प्रधानमन्त्री ओली जो भी कर रहे हैं, यह उनकी बाध्यता है । प्रधानमन्त्री ओली निकट रहे नेकपा के युवा नेता महेश बस्नेत ने कहा है कि प्रधानमन्त्री ओली के विरुद्ध आज काफी गलत प्रचारबाजी हो रही है, उसको राजनीतिक रूप में प्रतिकार करना स्वाभाविक है । उन्होंने कहा है कि पिछली बार दरबारमार्ग में नेकपा द्वारा आयोजित सभा जनता को सच बताने के लिए ही है ।

एक बात तो सच है कि सही काम करने के लिए प्रधानमन्त्री ओली के पास स्पष्ट बहुमत था, इसके लिए संसद् विघटन की जरुरत नहीं थी । आज प्रधानमन्त्री ओली के पक्ष में कई तरह के बहस करनेवाले व्यक्ति इस सच को भूल रहे हैं । हाँ, जनता ने तत्कालीन नेकपा एमाले और माओवादी को स्पष्ट बहुमत दिया था, अन्य राजनीतिक पार्टियों के सहयोग तथा समर्थन बिना ही नेकपा को ५ साल तक सत्ता से बाहर करने की ताकत किसी के पास नहीं थी । प्रधानमन्त्री ओली के लिए यह एक बहुत बड़ा अवसर था । लेकिन पार्टी के भीतर विकसित विवादों के बीच प्रधानमन्त्री ओली ने संसद् को ही अपाहिज बना दिया है । जिसका परिणाम आज पूरा देश भुगत रहा है ।

ओली पक्षधर नेतागण प्रश्न करते हैं– क्या संवैधानिक अंगों में पदाधिकारी नियुक्त करना सत्ता कब्जा करना है ? वेसे तो सीधा जवाब होता है– नहीं है । लेकिन प्रधानमन्त्री जिस महत्वांकक्षा के साथ आगे बढ़ रहे हैं और विगत में जो–जो हरकत करते आ रहे हैं, उसको देखकर काफी आशंका हो जाती है । वि.सं. २०७५ भाद्र १ गते जारी मुलुकी –फौजदारी तथा दीवानी) कानून हो या सञ्चार माध्यम नियन्त्रण के लिए लाया गया मीडिया काउन्सिल विधेयक और सूचना विविध विधेयक, इसमें प्रधानमन्त्री ओली की नीयत सही नहीं दिख रही थी । इसीतरह मानवअधिकार आयोग, गुठी संस्थान ऐन, संघीय निजामती कर्मचारी ऐन, नेपाल विशेष सेवा ऐन, संघीय पुलिस ऐन, नागरिकता ऐन जैसे कई विधेयक हैं, जिसको लेकर ओली सरकार को आलोचित रहना पड़ा । उसी समय से आलोचकों ने कहा था कि प्रधानमन्त्री ओली निरंकुशता की ओर जा रहे हैं । आज आकर जिस तरह संसद् विघटन किया गया, इसमें भी प्रधानमन्त्री ओली की महत्वांकाक्षा और नीयत पर ही आशंका की जा रही है । यह भी कहा जाता है कि प्रधानमन्त्री ओली में आलोचना सहन करने की क्षमता नहीं है । इसीलिए विरोधी को ठिकाने लगाने के लिए वह हर संभव प्रयास करेंगे । बुद्धिजीवियों का मानना है कि प्रधानमन्त्री ओली का इसी चरित्र और कार्यशैली के कारण ही आज देश में संवैधानिक और राजनीतिक संकट आया है ।

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इसीलिए संघीयता, धर्मनिरपक्षता और समावेशी–समानुपातिक प्राणाली के पक्षधर पार्टी एवं नेता प्रधानमन्त्री ओली के ऊपर प्रश्न कर रहे हैं कि कई प्रधानमन्त्री ओली संघीयता और धर्मनिरपेक्षता को ही खारिज करने तो नहीं जा रहे हैं ? लेकिन प्रधानमन्त्री ओली अपने हर भाषण में इस आरोप का खण्डन करते हैं । तब भी ओली पर विश्वास करने में परिवर्तनकारी शक्ति हिचक रहे हैं । ऐसी ही पृष्ठभूमि में आशंका है कि प्रतिनिधिसभा में प्रमुख प्रतिपक्षी दल के नेता रहे नेपाली कांग्रेस के सभापति शेरबहादुर देउवा का साथ भी ओली को है । कहा जाता है कि कांग्रेस सभापति देउवा भी चाहते हैं कि वैशाख में ही चुनाव हो तो बेहतर है । लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता रामचन्द्र पौडेल, कृष्णप्रसाद सिटौला, गगन थापा जैसे नेताओं के विरोध के कारण देउवा खुलकर सामने नहीं आ पा रहे हैं ।

ऐसी ही अवस्था जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) पार्टी के भीतर भी दिखाई देती है । कहा जाता है कि पूर्व समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव और डा. बाबुराम भट्टराई संसद् पुनस्र्थापना के पक्ष में हैं और पूर्व राजपा के नेता महन्थ ठाकुर और राजेन्द्र महतो चुनाव के पक्षधर हैं । पार्टी के भीतर अपना विचार अल्पमत में होने के कारण बाध्य होकर देउवा, ठाकुर और महतो संसद् विघटन का विरोध कर रहे हैं और कह रहे हैं कि सर्वोच्च अदालत को सम्मान करना चाहिए, अदालत से जो निर्णय आएगा, वह हमारे लिए स्वीकार्य है । प्रमुख राजनीतिक शक्ति कांग्रेस और जसपा में रहे इस तरह के विरोधाभास के मध्यनजर प्रधानमन्त्री ओली आज के दिन तक आत्मविश्वास पूर्वक कह रहे हैं कि निर्धारित मिति में चुनाव होनेवाला है, उसको रोकने की ताकत किसी के पास भी नहीं है ।

प्रधानमन्त्री ओली का आत्मविश्वास और उसके विरुद्ध में रहे प्रमुख राजनीतिक शक्तियों के अड़ान के कारण देश आन्तरिक मुठभेड़ की ओर जा रहा है । बहुसंख्यक संवैधानिक विज्ञ एवं पाँच पूर्व प्रधानन्यायाधीशों ने स्पष्ट कहा है कि संसद् विघटन असंवैधानिक है । संसद् विघटन विरुद्ध सड़क संघर्ष में रहे राजनीतिक शक्तियों के लिए यह एक नैतिक बल भी है । संसद् विघटन के विरुद्ध संघर्ष करनेवाले राजनीतिक शक्ति एवं नागरिक समाज के नेताओं का मानना है कि अदालत हो अथवा निर्वाचन आयोग, प्रधानमन्त्री ओली ने सम्पूर्ण सेटिङ किया है, ताकि निर्णय उनके ही पक्ष में हो सके ।

इसी बीच में सड़क में एक गजब का दृश्य देखने को मिला है । नेकपा ओली समूह द्वारा माघ २२ गते काठमांडू में आयोजित सभा में सहभागी कई ऐसे युवा–युवती ऐसे थे, जो नारे लगा रहे थे– केपी ओली आइलव यू । उन लोगों ने अब १० साल के लिए ओली को देश की जिम्मदारी देने के लिए भी नारे लगाए थे । जिससे एक बात तो स्पष्ट होता है कि ओली के प्रति भी युवाओं में एक प्रकार का क्रेज है । ओली के पक्ष में नारेबाजी करनेवाले हों या प्रचण्ड–मधव समूह तथा अन्य राजनीतिक पार्टी को पक्षधरता की ओर से, दोनों समूह अपने–अपने विचार पर अडिग हैं ।

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वर्तमान संविधान और राजनीतिक परिस्थिति को समझनेवाला हर व्यक्ति जानता है कि संसद् विघटन असंवैधानिक है । लेकिन उसके विरुद्ध सड़क संघर्ष करनेवाले नेताओं के प्रति भी आम लोगों का विश्वास नहीं है । यही कारण आज प्रधानमन्त्री ओली की असंवैधानिक कदम के विरुद्ध आन्दोलन सशक्त नहीं हो पा रहा है । कमजोर आन्दोलन को देखकर ही प्रधानमन्त्री ओली पूरा आत्मविश्वास के साथ संवैधानिक नियुक्ति कर रहे हैं और चुनाव होने का दावा भी कर रहे हैं । साथ में उनके पक्ष में युवाओं की जमात भी दिखाई दे रही है ।

आन्दोलनकारियों के कमजोर नेतृत्व को देकर कर ही प्रचार हो रहा है कि प्रचण्ड को सत्ता न मिलने के कारण ही संसद् विघटन हो गया है । नेकपा में लगभग दो साल से जारी विवाद को नजदीक से देखनेवाले लोग यही विश्वास करते हैं कि अगर केपी शर्मा ओली प्रधानमन्त्री पद इस्तीफा देकर उक्त पद दूसरे अध्यक्ष प्रचण्ड को देने के तैयार हो जाते तो संसद् विघटन की नौबत नहीं आती । कोरोना महामारी के समय में भी नेकपा विवाद इसतरह बाहर आया जो अशोभनीय रहा । इसमें सिर्फ प्रधानमन्त्री ही नहीं, दूसरे पार्टी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड और पूर्व प्रधानमन्त्री माधव कुमार नेपाल भी समान दोषी हैं । क्योंकि कोरोना महामारी के समय में नेकपा के यह शीर्ष नेता सत्ता के लिए ही बार्गेनिङ कर रहे थे । ऐसी अवस्था में सड़क आन्दोलन में नेतृत्व कर रहे प्रचण्ड और नेता नेपाल के प्रति जनआकर्षण नहीं है, ना ही देउवा, यादव और डा. भइराई के प्रति है । आम लोगों का मानना है कि यह सब ‘टेस्टेड’ नेता हैं, यह भी ओली की तरह ही सत्ता के भूखे हैं । आम लोगों में इसतरह की मानसिकता हावी होने के कारण ही आज आज देश संवैधानिक और राजनीतिक संकट में फंसता जा रहा है ।

 

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