‘कागज के फूल’ काव्य-कृति पर अंतर्राष्ट्रीय विचार-गोष्ठी आयोजित
गंभीर भावबोध और गहरी संवेदना से पूर्ण हैं संग्रह की कविताएं : डॉ पांडेय
नारनौल। गंभीर भावबोध और गहरी संवेदना से पूर्ण हैं ‘कागज के फूल’ संग्रह की कविताएं। भारतीय संस्कृति की प्राण-प्रतिष्ठा का प्रयास भी इन कविताओं में हुआ है। यह कहना है केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार, नई दिल्ली के सहायक निदेशक और पूर्व राजनयिक डॉ दीपक पांडेय का। मनुमुक्त ‘मानव’ मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) के कुलपति डॉ उमाशंकर यादव की नव-प्रकाशित काव्य-कृति ‘कागज के फूल’ पर केंद्रित ‘वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय विचार-गोष्ठी’ में अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि डॉ यादव की कविताओं में सामाजिक विसंगतियों एवं विद्रूपताओं पर गहरी चोट की गई है, वहीं राष्ट्रीयता और दायित्व-बोध को भी सफल अभिव्यक्ति मिली है। हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला के कुलाधिपति डॉ एचएस बेदी ने ‘कागज के फूल’ संग्रह की कविताओं को पारिवारिक और सामाजिक यथार्थ की उपज बताते हुए कहा कि इनमें जीवन की विविध विसंगतियों और विडंबनाओं का बखूबी चित्रण हुआ है।
डॉ पंकज गौड़ के कुशल संचालन में संपन्न हुई इस विचार-गोष्ठी के प्रारंभ में चीफट्रस्टी डॉ रामनिवास ‘मानव’ ने विषय-प्रवर्तन करते हुए कवि डॉ उमाशंकर यादव तथा विवेच्य कृति ‘कागज के फूल’ का परिचय प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् हिंदी साहित्य अकादमी, मोका (मॉरीशस) के अध्यक्ष डॉ हेमराज सुंदर, जयपुर (राजस्थान) के असिस्टेंट कलेक्टर विजयसिंह नाहटा, नागरी लिपि परिषद्, नई दिल्ली के महामंत्री डॉ हरिसिंह पाल, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमांडू की पत्रिका ‘समकालीन साहित्य’ के संपादक डॉ पुष्करराज भट्ट तथा इग्नू, दिल्ली की एकेडमिक काउंसलर डॉ विदुषी शर्मा ने ‘कागज के फूल’ संग्रह पर विचार प्रकट करते हुए कहा कि मानव-मन की सूक्ष्म अनुभूतियों की अकृत्रिम अभिव्यक्ति इन कविताओं में हुई है। कवि के आशावादी दृष्टिकोण की प्रशंसा करते हुए वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि विविध भावों और विभिन्न रंगों के कारण ये कविताएं पाठकों के लिए प्रेरणादायी बन पड़ी हैं तथा उनके मन में नई ऊर्जा का संचार करती हैं। कार्यक्रम के अंत में कवि डॉ उमाशंकर यादव ने अपनी रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डाला तथा अपनी प्रतिनिधि कविताओं का पाठ किया।
ये रहे उपस्थित : लगभग दो घंटों तक चली इस महत्त्वपूर्ण संगोष्ठी में ट्रस्टी डॉ कांता भारती, ट्रस्ट की दिल्ली प्रभारी उर्वशी अग्रवाल ‘उर्वी’ तथा गुजरात सिंधी अकादमी, अहमदाबाद के पूर्व अध्यक्ष डॉ हूंदराज बलवाणी के अतिरिक्त चितवन (नेपाल) से रचना शर्मा, कोलकाता (पश्चिम बंगाल) से संगीता शाॅ, दमोह (मध्य प्रदेश) से मनीषा दुबे, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) से मधु रानी, नागपुर (महाराष्ट्र) से डॉ सुधा जांगिड़, लुधियाना (पंजाब) से पूनम सपरा, मंगलूर (कर्नाटक) से डॉ मल्लिकार्जुन, नेरटी (हिमाचल प्रदेश) से रमेशचंद मस्ताना, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) से डॉ अरविंद उपाध्याय तथा हरियाणा में हिसार से डॉ जितेंद्र पानू तथा राजेश शर्मा, मंडी अटेली से पूर्व पार्षद ब्रह्मप्रकाश ‘मानव’ और नारनौल से डॉ जितेंद्र भारद्वाज आदि महानुभावों की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही।



