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टूटता रहा एक-एक तारा, होता रहा ये चमन विराना : हार्दिक श्रद्धा‌जंलि कविवर

 

सभी के काम में आएँगे वक़्त पड़ने पर,
तू अपने सारे तजुर्बे ग़ज़ल में ढाल के चल.
बस उसी दिन से ख़फ़ा है वो मेरा इक चेहरा,
धूप में आईना इक रोज दिखाया था जिसे.
चमन में तितलियाँ हों या की भंवरे, रहना पड़ता है,
इन्ही फूलों, इन्ही तीख़े नुकीले तेज़ खारों में.
हम तुम्हारे हैं ‘कुँअर’ उसने कहा था इक दिन,
मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक.
कुंवर बेचैन जी हिंदी के प्रमुख कवि हैं. ये अपनी कविता, गजलों व गीतों के जरिये सालो से लोगों के बीच एक खाश रिश्ता बनाते आये हैं. इन्होने आधुनिक ग़ज़लों के माध्यम से आम आदमी के दैनिक जीवन का वर्णन किया है.

कवि कुंवर बेचैन जी गजल लिखने वालें रचनाकारों में से एक प्रमुख गजलकार और संगीतकार हैं. लगभग 50 वर्षों से देश – विदेश के सैंकड़ों कवि सम्मेलनों में अपनी छवि बनाने वाले कवि कुंवर बेचैन जी का जन्म 1 जुलाई सन 1942 में जिला मुरादाबाद चंदोसी उत्तर – प्रदेश में हुआ था. इनका पूरा नाम कुंवर बहादुर सक्सैना था. इनके पिता जी का नाम श्री नारायणदास सक्सैना और माता का नाम श्री मति गंगादेवी था.
कुंवर जी को देश-विदेश की लगभग 250 संस्थाओं ने सम्मानित किया है. उत्तर प्रदेश के हिंदी संस्थान द्वारा 50 हजार का साहित्यक भूषण पुरस्कार तथा 2 लाख का हिंदी गौरव सम्मान, मुंबई की परिवार संस्था द्वारा 51 हजार का परिवार पुरस्कार आदि प्राप्त कर चुके हैं.

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