राजनीतिक समझ और त्रिकोणात्मक चक्रव्यूह :अजय कुमार झा

हिमालिनी ,अप्रील २०२१ अंक,अरस्तू ने कहा है कि ‘मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है’, मनुष्य किसी–न–किसी ‘राज्य’ (पोलिस) के अंतर्गत रहता है, अर्थात एक सामूहिक सत्ता के माध्यम से अपने जीवन को व्यवस्थित करता है ताकि वह ‘उत्तम जीवन’ और ‘आत्म–सिद्धि’ को प्राप्त कर सके । लेकिन जहां के राजनेता और विद्वान लोग निरंतर इसी दांवपेंच और षड़यंत्र में लगे रहते हैं कि चाहे देश रहे या जाए परंतु अपनी आवश्यकता और महत्वाकांक्षा को हर हाल में पूरा करना है; तो इसे हम राजनीति कह सकेंगे ? यदि हां, तो हमें सामूहिक आत्महत्या के शिकार होने से कोई नहीं रोक सकता ।
अच्छे लोगों को राजनीति से दूर रखने और पैसा तथा क्षणिक लाभ के लिए भ्रष्ट, बेइमान तथा झूठे संस्कार वालों को आगे बढ़ने में सहायक होना आत्मसिद्धि को प्राप्त करना नही बल्कि आत्महत्या को उपलब्ध करना माना जाएगा । दरअसल राजनीति के बारे में आम लोगों की धारणा अलग है; वे अपने व्यक्तिगत अनुभवों एवं दैनिक खबरों के माध्यम से राजनीति के संबंध मे अपनी राय बनाते हैं । जब एक साधारण आदमी राजनेताओं को दल–बदल करते, झूठे वायदे करते या घोटालों में पकड़े जाते देखता है तब राजनीति उसके लिए बुरी चीज बन जाती है, क्योकि उसकी समझ में राजनीति वही है जो राजनेता करते हैं । लेकिन इसके साथ ही वह कई बार राजनेताओं को अच्छे कृत्य करते हुए भी देखता है, इसलिए राजनीति के अंतर्गत ही उसे श्रेष्ठ जीवन की संभाव्यता भी दिखाई देती है । इस प्रकार आम लोगों के लिए राजनीति परस्पर विरोधी दावों का सम्मिश्रण बन जाती है । इस क्रम में बुरे लोग ही बार बार सामने आते हैं । झूठे वायदे करने वाले ही चारो ओर दिखाई देने लगते हैं और इनके चक्रव्यूह में फसकर हम अपनी सर्वस्व को खो बैठते हैं ।

हम यह जानते हैं कि राजनीति का संबंध हमारे सार्वजनिक जीवन से है । सार्वजनिक जीवन में अंतःक्रिया स्वतःस्फुर्त होने के कारण उनमें परस्पर सहयोग, प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष पाया जाना भी स्वाभाविक ही है । हम कह सकते हैं कि, राजनीति परस्पर सहयोग, प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष का क्षेत्र है । लेकिन इसमें इन दो शब्द (सृजनात्मक और सहयोगात्मक प्रतिस्पर्धा) को जोड़ दिया जाय तो राजनीति विश्व कल्याण और सर्वजन हिताय हो सकता है ।

वैसे राजनीति के द्वारा समाज के सभी सदस्यों पर सत्ता का प्रयोग किया जाता है एवं नियम बनाए जाते हैं तथा निर्णय किए जाते हैं, ताकि उनके बीच सहयोग, प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष को नियमित और संयमित किया जा सके । राजनीति के अंतर्गत ही सार्वजनिक जीवन को श्रेष्ठ एवं उन्नत बनाने के लिए नागरिकों के अधिकार, कर्तव्य एवं दायित्व सुनिश्चित किए जाते हैं । यह सब सैद्धांतिक रूप से ठीक है, लेकिन व्यावहारिक रूप में आते ही खींचातानी शुरु हो जाती है । और राजनीति भ्रष्टाचार, दंगा, खून खराबा, हिंसा और षड़यंत्र में परिणत हो जाता है । आज नेपाल फिर से उसी मोड़ पर आ खड़ा हुआ है ।
राजनीति, अर्थात राजा के नीति; या कहें नीति के राजा । वह नीति जो राजपथ का निर्माण करता हो, राजनीति है । वह नीति, को सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय हो, राजनीति है । वह नीति, जो बच्चे, युवक, प्रौढ़, वृद्ध, गरीब, धनी, भिखारी, सम्राट, संत, महात्मा, व्यापारी और किसान सबके हित में हो, सब के लिए विकास के रास्ता प्रशस्त करता हो, सबको बेहिचक अपने–अपने मार्ग पर चलने के लिए सुरम्य माहौल देता हो, सार्वजनिक जीवन के गति को निर्बाध रूप में विकसित होने के लिए सहज वातावरण निर्माण करता हो, वह राजनीति है । और ऐसे विराट विचार तथा सोच रखने वाले महापुरुष ही राजनीतिज्ञ होते हैं, न कि मधेशी को दबाने वाले, हिमाली को कुचलने वाले और हजारों हजार देशवासी को मौत के घाट उतारनेवाले ।
राजनीति और राजनीतिज्ञ के उपर्युक्त परिभाषा को गंभीरता से मनन किया जाय और नेपाल के संदर्भ तथा अपने जीवन के संदर्भ में तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो हम उपलब्धि के रूप में शून्य हीं पाएंगे । फिर हमारा जीवन आत्मसिद्धि को कब और कैसे प्राप्त होगा ? आधुनिक सोच और कम्यूनिष्टो के विचार अनुसार दूसरा जन्म होनेवाला है नहीं, होता ही नही है ! फिर तो अरस्तू जैसे विद्वानों के आत्मसिद्धि का क्या होगा ? परमेश्वर के पुत्र जीसस के सेवा का क्या होगा ? साक्षात् परमपिता कृष्ण के मोक्ष का और पैगंबर के जन्नत का क्या होगा ? जब हम अपनी चेतना को उर्ध्ववान ही नही कर पाएंगे तो फिर इस निरंतर प्रवाहमान जीवन की गति क्या होगा ? क्या हम गुलामी और अजायबघर में रहने के लिए जन्म लिए हैं ? यदि नहीं, तो हमें अच्छे लोगों को सम्मानपूर्वक राजनीति में प्रवेश दिलाना होगा ।
अच्छे लोगों के हाथों में राजनीति आ जाए तो अभूतपूर्व परिवर्तन हो सकते हैं क्योंकि बुरा आदमी बुरा सिर्फ इसलिए है कि अपने स्वार्थ के अतिरिक्त वह कुछ भी नहीं सोचता जबकि अच्छा आदमी इसलिए अच्छा है कि अपने स्वार्थ बदले दूसरे के स्वार्थ को प्राथमिकता देता है, जो राजनीति के परिभाषा को आमूल रुप से प्रशोधित कर सम्पूर्ण कायाकल्प करने की क्षमता रखता है । जो ‘राजनीति’ अभी व्यक्तियों का निहित स्वार्थ बनी हुई है, वही राजनीति समाज का सामूहिक स्वार्थ बन सकती है ।
ध्यान रहे ! बुरा आदमी सत्ता में जाने के लिए सब बुरे साधनों और षडयंत्रों का उपयोग करता है और एक बार सत्ता पाने के लिए अगर बुरे साधनों का उपयोग शुरू हो जाए तो जीवन की सब दिशाओं में बुरे साधनो का प्रयोग शुरु हो जाते हैं । जब एक राजनीतिज्ञ बुरे साधन का प्रयोग करके मंत्री हो जाता है, तो एक गरीब आदमी भी बुरे साधनों का उपयोग करके अमीर होने का उपाय करने लगता है । एक शिक्षक बुरे साधनों का उपयोग करके वाइस–चांसलर बन जाता है । और एक दुकानदार बुरे साधनों को उपयोग करके करोड़पति बनने में लग जाता है । सब ओर बुराइयों का बोलबाला होने लगता है । स्याल दरबार (गा पा) से लेकर सिंह दरबार (संसद भवन) तक एक ही सूत्र काम करता हुआ दिखाई देता है । जिसके निचोड़ में यह व्याख्या की जाती है कि जनता ही बेईमान है, उसने पैसा लेकर वोट दिया है । वह दूध में पानी मिलाता है । चावल और दाल में कंकड़ मिलाता है । मसाले में आटा और भूसा मिलाता है । आखिर वो क्यों न मिलाए ? हर कोई अपनों से बड़ो से ही सीखता है न । जब विद्वान सचिव और मंत्री चोरी करने में नही शर्मातें हैं तो आम नागरिक को कैसा शर्म !
‘राजनीति’ थर्मामीटर है पूरी जिंदगी का । वहाँ जो होता है, वह सब तरफ जिंदगी में होना शुरू हो जाता है । तो राजनीति में बुरा आदमी अगर है तो जीवन के सभी क्षेत्रों में बुरा आदमी सफल होने लगेगा और अच्छा आदमी हारने लगेगा । क्या आज नेपाल में भला होना असफलता की पक्की ’गारंटी’ नहीं है ? किसी को सांसारिक जीवन में असफल होना हो, तो भले होने से अच्छा ’गोल्डन रूल’ दूसरा नहीं है । बस भला हो जाए, असफल हो जाएगा । और जब भला होना असफलता बन जाए, और बुरा होना सफलता की सीढि़याँ बनने लगे, तो जिंदगी सब तरफ विकृत और कुरूप हो जाए, तो आश्चर्य क्या है ! देश बिक जाय तो हर्ज क्या है ! दिन दहाड़े बेटियों की इज्जत लूट जाय तो आश्चर्य क्या है ! आपके पैतृक जमीन दूसरों के नाम हो जाय तो अन्याय क्या है ! अरे देखते देखते सोना पित्तल हो जाय तो फर्क क्या है ! १७ हजार को मारनेवाला प्रधान मंत्री बन जाय तो चिंता की कौन सी बात है ! नक्शा बदल जाय, संधि से पहले अरबों की लूट हो जाय, निर्लज्जता पूर्वक झूठ बोला जाय, पद के लिए देश भाड़ में जाए तो आश्चर्य क्या है ! नेपाल है, यहां सबकुछ संभव है । हिमालय को बेचनेवाला देशद्रोही सागरमाथा शिखर से देशप्रेम का डंका बजाता है, और हम उसके इशारे पर नृत्य करते हैं ! क्या इससे बड़ा आश्चर्य भी कुछ हो सकता है ? नेपाल के बेटियों को विदेश में बेचने वाला उन्हीं बेटियों के कमाई को लूटकर मुसकाता है और महिला दिवस में हम उसके गले में माला डालकर सम्मानित करते हैं, क्या हमारी आत्मा जिंदा है ? नहीं, अब और नही !
हमें राजनीति को शुद्धिकरण की ओर ले जाना ही होगा । राजनीति जितनी स्वस्थ होंगे जीवन के सारे पहलू उतने ही स्वस्थ हो सकते हैं । क्योंकि राजनीति के पास सबसे बड़ी ताकत है । और ताकत अशुभ हो जाए तो फिर कमजोरों को अशुभ होने से नहीं रोका जा सकता है । वास्तव में राजनीति में जो षड़यंत्र और अशुद्धता है, उसने जीवन के सब पहलुओं को दुर्गन्धित कर दिया है । अच्छे लोग राजनीति से हटते गए और दुष्टों के लिए जगह खाली होती गयी, यही पर हम भारी भूल कर लिए ।
कोई भी नहीं जानता कि अगर बुद्ध ने राज्य न छोड़ा होता, तो दुनिया का ज्यादा हित हुआ होता या छोड़ देने से ज्यादा हित हुआ है । गांधी को महात्मा होने का अहंकार ने ही भारत को ६० वर्ष तक दिशाहीन रखा तो नेपाल में गणेश मान सिंह के त्याग और भट्टराई जैसे संत के उदारवादी व्यवहार के कारण गिरिजा जैसे अयोग्य के हाथों हमें दीनता को देखना पड़ा, माओवादी नरसंहार को झेलना पड़ा । लेकिन यह परंपरा है हमारी, कि अच्छा आदमी हट जाये । लेकिन हम कभी नहीं सोचते, कि अच्छा आदमी हटेगा, तो जगह खाली तो नहीं रहेगी, बुरे लोग उसे अपनी कब्जा में ले लेंगे, फिर बुरे को हटाने के लिए उससे भी घटिया और बुरे लोगों की आवश्यकता होगी जो एकदिन सर्वनाश को निमंत्रण कर नष्ट हो जाएगा । आज वही हो रहा है । प्रधान मंत्री ओली और प्रचंड में । दोनों अपने ढंग के मजे हुए खिलाड़ी हैं । दांव पे दांव आजमाया जा रहा है, वार्ता और बचनबद्धता का कोई मूल्य नहीं रहा । झूठे वायदे के संस्कार के कारण आज खुद ही बिलख रहे हैं । सम्मान जनक जीवन जीने के समय में प्रधानमंत्री जैसे गरिमावान पद पाने के बावजूद आज अपनी ही पार्टी से निष्कासित हो अपमानित जीवन जीने को बाध्य हैं । यह सब घटिया दर्जा के मानसिकता और राजनीतिक संस्कार का प्रमाण है ।
अच्छे आदमी के संबंध में ओशो कहते हैं कि, “ऐसा आदमी, जो खुद होने से तृप्त है । आनंदित है । जो किसी के आगे खड़े होने के लिए पागल नहीं है, और किसी के पीछे खड़े होने में जिसे कोई अड़चन, कोई तकलीफ नहीं है । जहां भी खड़ा हो जाए वहीं आनंदित है ।
ऐसा अच्छा आदमी राजनीति में जाये तो राजनीति शोषण न होकर सेवा बन जाती है । ऐसा अच्छा आदमी राजनीति में न जाये, तो राजनीति केवल ‘पावर पालिटिक्स’, सत्ता और शक्ति की अंधी दौड़ हो जाती है । ”
राजनीतिज्ञ, जो झूठे वायदों पर जीते और पलते हैं– वे विश्व में सर्वाधिक अयोग्य लोग हैं । उनकी एकमात्र योग्यता है कि वे भोलेभाले जनता से छल कर सकते हैं; अथवा गरीब देशों में गरीब जनता के मत को खरीदकर उन्हें गुलामी के जंजीरों में जकड़ जनता के सेवक से वे सीधा जनता के स्वामी बन जाते हैं । वर्तमान नेपाल में इस तरह के कम–से–कम तीन हजार राजाओं को हम कटोरीमल से करोड़ीमल होते देख रहे हैं । तीब्र गति से बढ़ती इनकी संख्या को देख आम नागरिक को सिर्फ चिंता ही नही अपनी अस्तित्व और पहचान खोने का डर लगने लगा है । सत्ता और सम्पत्ति की होड़वाजी के कारण नेपाल और नेपाली के मौलिक अस्तित्व पर ही काले बादल मंडराते दिखने लगा है । नेपाल में एम सी सी का प्रवेश और निवेश निकट भविष्य में नेपाली संस्कृति और पौराणिकता के लिए कब्र खोदने का ही काम करनेवाला है, जो आज हमारे तथाकथित विद्वानों के लिए अमृत तुल्य है । सत्ता परिवर्तन के चक्रव्यूह में फसा नेपाल अब त्रिकोणात्मक दबाव और लगानी के कूटनीतिक चक्रव्यूह में फसता जा रहा है । चीन और भारत के साथ साथ अब अमेरिका और यूरोप भी नेपाली नेताओं को निर्देशन और नेपाली राजनीति में निर्णयात्मक हस्तक्षेप बढ़ाने लगे हैं । चिनको चिंतित और तनावग्रस्त बनाने के लिए नेपाल के उत्तरी क्षेत्र में रह रहे तिब्बती शरणार्थी को स्वाधिकार प्राप्ति और स्वदेश फिरती हेतु वैचारिक समर्थन और प्रोत्साहन करना कुछ विशेष ही संकेत करता है । इधर ईसाई मिशनरियों के द्वारा नेपाली संस्कृति को नष्ट करने के उद्देश्य से हिंदू सनातनियों के विरोध में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग और आपसी संघर्ष बढ़ानेवाली माहौल को बड़ी चतुराई के साथ नेपालियों के जूता नेपालियों के सर पर मारने रूप रेखा तयार किया जा रहा है । डालर तथा सुरा सुंदरियों के पीछे बेसुध नेपाली जनता आत्मसम्मोहन में फसकर खुद ही अपना शत्रु बनाने लगी है ।
संभवतः इन देश वेचुआ राजनीतिकर्मी को इस बात का भान हो गया है कि अब नेपाल को युद्ध के मैदान बनने से ज्यादा दिन तक नहीं रोका जा सकता है, अतः जितना लूटा जा सकता है, उतना लूटा जाय; और यूरोप अमेरिका में अपनी वंशजों के लिए स्थान सुरक्षित किया जाय । अब इस तरह के शंका उठना आम बात होने लगा है । जब प्रधान मंत्री रह चुके नेताओं के मुख से किसी खास देश को ध्यान में रखकर सहज सरकार बनाने की बात सार्वजनिक रूप से किया जा सकता है तो हम उसके भीतर छुपे षडयंत्रों के प्रति शंका से भर जाएं तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए ।
कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि अभी नेपाल में राजनेता नहीं क्षुद्र नेताओं का हीं जन्म होता आया है । विदेशियों के रोटी और इशारों पर झुकने में गौरव करनेवाले हमारे बेशर्म नेताओं को आखिर समझाएगा कौन ! जनता को भूखा मरने के लिए बाध्य किया जा रहा है, ता कि वह क्रान्ति करने के लायक भी न रह जाय, रोजी रोटी कमाने में ही उसकी जिंदगी तबाह हो जाय, बची–खुची जिंदगी दवा दारू में पस्त हो जाय । संभवतः इसे ही हमारे पूर्वजों ने पिशाच नीति कहा होगा । शायद महाभारत का इतिहास इसी अयोग्यता की ओर संकेत करता है । मधेशी, हिमाली तथा थारूओं को दबाने की व्यस्तता तथा भारत विरोधी नेपाली राष्ट्रीयता को खड़ा करने की धृष्टता ने आज नेपाल को राजनीति भिखारी के हैसियत में लाकर खड़ा कर दिया है ।

