चिपको आंदोलन के नेता और विश्व प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा का निधन
चिपको आंदोलन के नेता और विश्व प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा का आज निधन हो गया। पर्यावरणविद् बहुगुणा पिछले दिनों कोरोना संक्रमित हुए थे, जिसके बाद उन्हें ऋषिकेश एम्स में भर्ती करवाया गया था। यहां उनका इलाज चल रहा था, लेकिन शुक्रवार की दोपहर 12 बजे 95 वर्ष की उम्र में उन्होंने अस्पताल में आखिरी सांस ली है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर चलने वाले सुंदरलाल बहुगुणा ने 70 के दशक में पर्यावरण सुरक्षा को लेकर अभियान चलाया,इसी दौरान चिपको आंदोलन की भी शुरुआथ की गई। उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में पेड़ों की कटाई व्यापक तौर से शुरू हुई, 1974 में बहुगुणा के नेतृत्व में कटाई का विरोध शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुआ । इस विरोध में स्थानीय महिलाएं पेड़ों से चिपक कर खड़ी हो गईं, जिसके बाद पूरी दुनिया इसे चिपको आंदोलन के नाम से जाना ।
सुंदरलाल बहुगुणा का मानना था कि पेड़ों को काटने की अपेक्षा उन्हें लगाना हमारे जीवन के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए उन्होंने 1970 में गढ़वाल हिमालय में पेड़ों को काटने के विरोध में आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन का नारा – “क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार” तय किया गया था। वर्ष 1971 में शराब दुकान खोलने के विरोध में सुन्दरलाल बहुगुणा ने सोलह दिन तक अनशन किया।
15 साल तक लगा पेड़ो को काटने पर रोक
यह विरोध प्रदर्शन पूरे भारत में फैल गया। 26 मार्च 1974 में चमोली जिला में जब ठेकेदार पेड़ो को काटने के लिए पधारे तब ग्रामीण महिलाएं पेड़ो से चिप्पकर खड़ी हो गईं। परिणामस्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 15 साल के लिए पेड़ो को काटने पर रोक लगा दिया। चिपको आंदोलन की वजह से बहुगुणा विश्व में वृक्षमित्र के नाम प्रसिद्ध हो गए।


