घर से निकलूं तो : (कविताएं) केशव शरण
घर से निकलूं तो
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घर से
निकलूं तो
नर्सरी से पौधे लाऊं
घर से
निकलूं तो
बाज़ार से खिलौने लाऊं
घर से
निकलूं तो
अस्पताल में वैक्सीन लगवाऊं
घर से
निकलूं तो
संक्रमित न हो जाऊं !
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लाकडाउन में श्वान
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उन्हें मालूम रहता था
मैं बिस्कुट लिये हुए हूं
वे दूर से ही देखकर
पूंछ हिलाते
भागे चले आते
मेरे पास थे
उन्हें मेरा इंतज़ार रहता था
तो अब भी रहता होगा
मगर वे क्या जानते होंगे
कोरोना वायरस क्या है
लाकडाउन क्या है
मैं नहीं जा रहा हूं
घर से बाहर अपने
तो वे मेरे सपने में
चले आ रहे हैं
मेरी आधी-अधूरी नींद के सिरहाने
बिस्कुट खाने
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आठवां दिन है
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सात दिनों में
कितनी सड़कों
और गलियों के
सात चक्कर लगाये होते
कम से कम
सात मित्रों के साथ
और घर लौटता एक अच्छी शाम कर
आठवां दिन है महामारी के नाम पर
दीवारों के बीच
अकेले
पड़े हुए
घर के आंतरिक चित्रों में
जड़े हुए
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एकमात्र आशा
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आशा नहीं है
पोस्टमैन भी आयेगा
ख़त लिखना तो
कब का बंद कर चुके हैं लोग
और अब शब्द भी
छप नहीं रहे हैं
मेरे हों
या किसी और के
दोस्त और रिश्तेदार
पहले ही कह चुके हैं
मिलना-मिलाना बाद में
जीवन बचाना पहले
नगर की हवा में
विषाणु उड़ रहे हैं
दोपहर ढल रही है
चार बज रहे हैं
एकमात्र आशा
चिड़ियों से है
और लो
वे आ गयीं
क्या चहचहा रहीं
मुंडेर पर
दूर कुर्सी लगाकर बैठ जाओ
पौधों के आस-पास
दाने बिखेरकर !
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वाराणसी 221002
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