Sat. Aug 8th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें himalini-sahitya

सब मन में काली सोच छिपी है गली गली में लाश बिछी है। – अनिल कुमार मिश्र

 

रिश्तों की तलाश
**************

रिश्तों की व्यर्थ तलाश छिपी है
गली गली में लाश बिछी है।

कौन यहाँ तेरा अपना है
सब रिश्तेदारी सपना है
रिश्तों का बाजार वही है
सब संघर्ष का सार वही है।

जाने ये कैसी हवा चली है
गली गली में लाश बिछी है।

क्या मात-पिता बंधु-भगिनी
सब पीड़ा की रीढ़ बने हैं
रिश्तों में अमृत कहीं नही है
जीत नही है हार वही है।

यह भी पढें   सूचना संकलन के दृष्टिकोण से ‘नेपाल किसी का प्ले ग्राउंड नहीं बनना चाहिए – अमरेशकुमार सिंह

रिश्तेदारी सब नकली है
गली गली में लाश बिछी है।

हृदय रक्त तेरा पी जाएँ
जी भर झुलसाएँ, झुंझलाएँ
रिश्तों में कौमार्य नही है
अपनो वाली बात नहीं है।

सुख छीन रहे पल पल रिश्ते
ढल रही उमर गिनते गिनते
कैसे रिश्ते,अपने कौन
कहो विधाता क्यूँ हो मौन ?

सब अपनापन एक माया है
रिश्तेदारी पल की छाया है
सब अपनी मंज़िल के पथिक बने हैं
थामे किसकी अंगुली कौन
कहो विधाता क्यूँ हो मौन ?

यह भी पढें   लेन-देन के विवाद पर हुए समझौते को रद्द करने की मांग को लेकर जनकपुरधाम में साहूकारों का प्रदर्शन

बाजार यहां है हर पल अद्भुत
सब बिक जाएँ, लुट जाएँ
रिश्तों में झनकार नहीं है
अपनों वाली बात नहीं है।

कोई दिल की बात न जाने
फिर हमको कैसे पहचाने
तन की डोली,मन विह्वल है
सब रिश्तेदारी नकली है।

सब मन में काली सोच छिपी है
गली गली में लाश बिछी है।
रिश्तों की व्यर्थ तलाश छिपी है
गली गली में लाश बिछी है।

अनिल कुमार मिश्र,राँची,झारखंड,भारत

 

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com