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प्रत्येक दिवस पर्यावरण दिवस : डॉ विजय पंडित

 
किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की खोज करने से बेहतर हैं कि हम अपनी पृथ्वी को ही सुरक्षित कर रहने योग्य बनाये…
आज के समय में जब पूरी कायनात एक वायरस के जानलेवा हमले से जूझ रही हैं , ये समय हम सभी के लिए प्रकृति और अपने प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी व दुरूपयोग के कारणों और उसके दुष्परिणाम के बारे में एक खुले मन से और पूरी ईमानदारी और गंभीरता से चिंतन मनन करनें का समय है कि अपनी प्रकृति को संरक्षित करने के नाम पर करोड़ों अरबों रूपए खर्च करने के बाद भी स्तिथि बद से बदतर क्यों होती जा रही हैं
अगर हम आंकड़ों की बात करें तो मेरठ में मात्र 2.7 प्रतिशत भूभाग पर वन क्षेत्र शेष रह गया है, उत्तर प्रदेश स्तर पर हरियाली का यह आंकड़ा केवल 5.95 प्रतिशत है और राष्ट्रिय स्तर पर हरियाली केवल 20.60 प्रतिशत ही बची है जोकि राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार 33 प्रतिशत होनी चाहिए ….
इसी कड़ी में यदि हम अपने पडोसी देशों के हरियाली के आंकड़े देखते हैं तो सबसे गंभीर स्तिथि में पाकिस्तान आता हैं जहाँ केवल 5 प्रतिशत भूभाग पर ही हरियाली शेष रह गई हैं
भारत के पडोसी देशों में सबसे ज्यादा हरियाली और सुरक्षित वन क्षेत्र वाला देश भूटान हैं जहाँ पर 71 प्रतिशत भूभाग पर वन क्षेत्र हैं, भारत के पडोसी देश नेपाल की सरकार द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, वर्तमान में देश के कुल 1,41,718 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का 44.74 प्रतिशत हिस्सा वनक्षेत्र है। पडोसी देश बांग्लादेश में 11 प्रतिशत भूभाग पर सुरक्षित वन क्षेत्र हैं,
पडोसी देश श्रीलंका में 36.42 प्रतिशत भूभाग पर सुरक्षित वन क्षेत्र हैं
बेहिसाब बढ़ती हुई जनसँख्या के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी बेतहाशा बढ़ता ही जा रहा हैं अनेकानेक योजनाएं बनती हैं लेकिन बहुत सी योजनाएं सरकारी फाइलों से निकलकर ज़मीन पर नहीं आ पातीं आखिर कब तक कुछ स्वार्थी लोगो , प्रशासनिक अधिकारीयों, कुछ नेताओ और सामाजिक माफियाओं का गठजोड़ सरकारी फाइलों में हरियाली बढ़ाते रहेंगे असंतुलित विकास कार्यों की योजना बना कर ‘विकास के नाम पर विनाश’ करते रहेंगे, कब तक वनों के कटान के साथ आग के हवाले कर जैव विविधतता बर्बाद करते रहेंगे ..
आम जनता , मीडिया और कथित सामाजिक कार्यकर्ता हर बात के लिए तो सरकार को जिम्मेदार तो ठहरा देतें हैं लेकिन इनमे से किसी का भी साहस भ्रष्ट सामाजिक माफियाओं , अफसरों पर सवाल उठाने का क्यों नहीं होता कि दशकों तक करोडो रूपए खर्च कर करोड़ों पौधे रोपित किए जाते हैं हर साल गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में कथित उपलब्धि दर्ज होती है लेकिन करोड़ों अरबों रुपये ठिकाने लगाने के बाद भी साल दर साल हरियाली घटती जा रही है ..
इसलिए प्रश्न तो बनता हैं आखिर कब तक पेड़ों को काटकर कागज़ बनातें रहेंगे और उन्हीं कागजों पर लिखेंगे कि पेड़ बचाओ जंगल बचाओ .. आखिर कब तक ?
पृथ्वी पर मानव यह भूल गया लगता है कि प्रकृति तो जब चाहे तब पृथ्वी पर अपना संतुलन बना सकती है लेकिन प्रकृति द्वारा बनाया गया संतुलन मानव जीवन के लिए बेहद विनाशकारी और अकल्पनीय होगा ..
आज हर गांव, गली, मोहल्ले में होड़ मची हुई है हर आदमी पर्यावरणविद् , हरित मानव, धरती पुत्र, तालाब पुत्र, पेड़ पुत्री, नदी मानव , जल मानव और भी अनगिनत उपाधियां अपने आप को ही अलंकृत करने की ..
इन छदम मानवों की अपनी अपनी जबरदस्त मार्केटिंग चल रही हैं यदि इतनी ऊर्जा ज़मीनी स्तर पर हरियाली सहेजने में की जाती तो शायद तस्वीर बदल सकती थी
लेकिन एक दिन प्रकृति इनके द्वारा किए गए छल, विनाश और नौटंकी का हिसाब ऐसे कथित मानवों से अवश्य मागेंगी ….
लेकिन प्रश्न तो बनता है न कि प्रकृति के साथ ऐसा छल क्यों और कब तक चलेगा ?अगर यही सब चलता रहा तो आनें वाली पीढिय़ां हमें कभी माफ़ नहीं कर पायेंगी कि आपके सामने जंगल दहकते रहें .. वन्य जीवों का शिकार होता रहा और आप हिरण और बाघों के सर से अपनें महलों की दिवारें सजाते रहें ..
साथ ही आपकी मूक सहमति से प्रकृति , पर्यावरण , नदियां और वन संपदा बर्बाद होती रहीं, ग्लेशियर पिघलते रहे , प्राकृतिक आपदाएं एक के बाद एक आती रहीं जान माल का नुकसान निरंतर होता रहा और आप जमीनी स्तर पर कार्य करने की जगह जूम मीटिंग, बेबीनार – सेमिनार, चित्रकला , स्लोगन , दीवारों पर पेंटिंग , रैली, वाद विवाद प्रतियोगिता, फैन्सी ड्रेस प्रतियोगिता और साल में एक बार पर्यावरण दिवस की नौटंकी करते रहे और सब कुछ हाथों से निकल गया ,
दोस्तों इससे पहले की बहुत देर हो जाये अब तो जाग जाइए क्योंकि पहले ही बहुत देर हो चुकी हैं .. जूम मीटिंग, बेबीनार – सेमिनार, चित्रकला , स्लोगन , दीवारों पर पेंटिंग , रैली, और वाद विवाद प्रतियोगिता और साल में एक बार पर्यावरण दिवस की औपचारिकता निभाने से हमारी प्रकृति का कुछ भला होने वाला नहीं हैं
अब युद्धस्तर पर ज़मीनी स्तर पर कार्य करने का समय आ गया हैं और इसके लिए हम सभी को ‘प्रत्येक दिवस पर्यावरण दिवस’ के रूप में अपनाने की आवश्यकता है
आईए दोस्तों हम संकल्प लें कि हम सभी प्रत्येक दिवस पर्यावरण दिवस और हमारा प्रत्येक कदम हरियाली सहेजने की ओर होगा .. सभी भारतवासियों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि सब मिलकर हरियाली को बचाए और जब भी अवसर मिले पौधारोपण अवश्य करें और अब पौधारोपण को एक जन आंदोलन का रूप देना होगा
प्रत्येक भारतवासी को प्रत्येक दिवस पर्यावरण दिवस मानते हुए पौधारोपण को अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए , किसी का जन्मदिन हो , या कोई और शुभ अवसर या किसी प्रियजन की स्मृति एक – एक पौधा रोपित अवश्य कीजिए एक दूसरे को उपहार में भी पौधों का प्रयोग किया जाए तो निश्चित रूप से हम अपनी पृथ्वी की हरियाली सहेजने में सफल होंगे
दूसरे ग्रहों पर जीवन की खोज करने से बेहतर हैं … कि हम अपनी पृथ्वी को ही सुरक्षित कर रहने योग्य बनाये… प्रकृति से सदैव जुड़े रहिए .. सम्मान, संवर्धन और संरक्षण कीजिए ..
यकीन मानिए अगर हम सभी अपनी प्रकृति व संस्कृति से जुड़े रहें तो प्रकृति आपके साथ कभी भी कुछ गलत नहीं होने देगी ..
डा. विजय पण्डित, मेरठ, (भारत)
डा. विजय पण्डित, मेरठ, (भारत)

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