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“योगश्चित्तवृतिनिरोधः” चित की वृतियों का निरोध ही योग है ‘योग के साथ रहें, घर पर रहें’ : डॉ. श्वेता दीप्ति

 

‘योग के साथ रहें, घर पर रहें’

आज की दौड़ती–भागती जिंदगी में हर कोई स्वस्थ रहना चाहता है। बीमारियों से खुद को बचाने के लिए लोग ना जाने कितना कुछ करते हैं। एक अच्छा आहार लेते हैं, अपनी दिनचर्या में कई तरह के बदलाव लाते हैं और साथ ही लोग योग का भी सहारा लेते हैं। योग हमारे जीवन के लिए जरूरी है, हर किसी को योग करना चाहिए। वहीं, कोरोना काल में तो योग की उपयोगिता काफी बढ़ गई है। हर साल पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस २१ जून को मनाया जाता है। २१ जून २०१५ को पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया था। वहीं, संयुक्त राष्ट्र में भारत की पहल पर दुनिया के लगभग सभी देश स्वस्थ रहने के लिए योग के प्रसार की इस मुहिम में शामिल हुए थे।

२१ जून को हर साल पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाती है। इस दिन की खासियत है कि ये साल के ३६५ दिन में से सबसे लंबा दिन होता है। २१ जून को उत्तरी गोलार्ध पर सबसे ज्यादा सूर्य की रोशनी पड़ती है, जिसकी वजह से ये सबसे लंबा दिन होता है। ऐसे में योग के निरंतर अभ्यास से व्यक्ति को लंबा जीवन मिलता है। इसलिए इस दिन को योग दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया गया। ११ दिसंबर २०१४ को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने २१ जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की घोषणा की थी। इसके बाद अगले साल यानी २१ जून २०१५ को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया, और तब से हर साल इस दिन को बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है।

योग विश्व इतिहास का सबसे पुराना विज्ञान है, जिसने व्यक्ति के अध्यात्मिक और शारीरिक क्रिया–कलापों के लिए नए द्वार खोले । योग का जन्म कब हुआ ? यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि इसका अविर्भाव हम ज्ञात नहीं कर सकते । वेदों एवं जैन ग्रंथों में योग का वर्णन मिलता लेकिन फिर भी योग इससे पहले भी विद्यमान था, भले ही वो किसी ग्रंथो में न लिखा गया हो । क्योंकि उस समय ऋषि परम्परा के कारण योग एक ऋषि से दूसरे ऋषि तक मौखिक ही पंहुच जाता होगा । इसलिए योग के आविर्भाव का पता लगाना बहुत मुश्किल है ।

पाणिनी ने ‘योग’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘युजिर् योगे’ ,‘युज समाधो’ तथा ‘युज् संयमने’ इन तीन धातुओं से मानी है। प्रथम व्युत्पत्ति के अनुसार ‘योग’ शब्द का अनेक अर्थो में प्रयोग किया गया है, जैसे – जोड़ना, मिलाना, मेल आदि। इसी आधार पर जीवात्मा और परमात्मा का मिलन योग कहलाता है। इसी संयोग की अवस्था को ‘समाधि’ की संज्ञा दी जाती है जो कि जीवात्मा और परमात्मा की समता होती है। महर्षि पतंजलि ने योग शब्द को समाधि के अर्थ में प्रयुक्त किया है। व्यास जी ने ‘योगः समाधिः’ कहकर योग शब्द का अर्थ समाधि ही किया है। वाचस्पति का भी यही मत है। संस्कृत व्याकरण के आधार पर ‘योग’ शब्द की व्युत्पत्ति निम्न प्रकार से की जा सकती है। योग सूत्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है – ‘योगष्चित्तवृत्तिनिरोधः’ यो.सू.ज्1/2 अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है। चित्त का तात्पर्य, अन्तःकरण से है। बाह्मकरण ज्ञानेन्द्रियां जब विषयों का ग्रहण करती है, मन उस ज्ञान को आत्मा तक पहुँचाता है। आत्मा साक्षी भाव से देखता है। बुद्धि व अहंकार विषय का निश्चय करके उसमें कर्तव्य भाव लाते है। इस सम्पूर्ण क्रिया से चित्त में जो प्रतिबिम्ब बनता है, वही वृत्ति कहलाता है। यह चित्त का परिणाम है। चित्त दर्पण के समान है। अतः विषय उसमें आकर प्रतिबिम्बत होता है अर्थात् चित्त विषयाकार हो जाता है। इस चित्त को विषयाकार होने से रोकना ही योग है।

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श्रीमद्भगवद्गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कुछ इस प्रकार से परिभाषित किया है। योगस्थः कुरू कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजयः। सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।। २/४८ अर्थात् – हे धनंजय! तू आसक्ति त्यागकर समत्व भाव से कार्य कर। सिद्धि और असिद्धि में समता–बुद्धि से कार्य करना ही योग हैं। सुख–दुःख, जय –पराजय, शीतोष्ण आदि द्वन्द्वों में एकरस रहना योग है।

अधिकतर हमने योग को सिर्फ व्यायाम, योगासन, प्राणायाम या शारीरिक रूप से स्वस्थ रखने की क्रिया मात्र समझ रखा है । लेकिन अगर योग को हम गहराई से समझें तो हमें इसके लाभों के साथ–साथ इसके प्रभावों का ज्ञान भी होता है । योग आज के विज्ञान की तरह नहीं है की इसके सिद्धांत बदल सके । यह हमारे हजारों महान ऋषियों की उपलब्धि है जिसे उन्होंने अपने पूर्ण जीवन को समर्पित करके प्राप्त की थी। तभी इसके सिद्धांत भी अकाट्य हैं, क्योंकि ऋषियों ने निश्चित ही इसके सभी पहलुओं को महसूस किया था और यही कारण है कि आज हमारे सामने योग विद्यमान है ।

योग को हम किसी धर्म विशेष में नहीं बांध सकते, यह तो सभी धर्मो से ऊपर है । धर्म हमें सिर्फ जीना सिखा सकते है, कुछ नियम सिखा सकते या फिर धार्मिकता सिखा सकते हैं । लेकिन योग हमें उत्तम तरीके से जीवन यापन करने के साथ–साथ आत्मा से परमात्मा को उपलब्ध होने का तरीका बताता है जो इस मानव जीवन के लिए परम आवश्यक है ।

आज का वातावरण कितना प्रदूषित है ये हम सभी जानते हैं । वर्तमान समय में प्रदूषित वातावरण, प्रदूषित पर्यावरण, फास्ट फूड का सेवन, कृत्रिम (रसायनों से निर्मित या सहेजे गए) भोज्य पदार्थ, डिब्बा बंद भोज्य पदार्थ, एवं बदलते परिवेश में मनुष्य को मानसिक विकृत एवं शारीरक रूप से अस्वस्थ बना दिया है । भले ही आधुनिक वैज्ञानिको ने नए–नए उपचार एवं सुविधाएँ खोजी हो लेकिन इनसे होने वाले साइड इफेक्ट से हम सभी भली प्रकार से परिचित हैं । अतः ऐसे समय में योग एवं आयुर्वेद ही ऐसी विद्या है जिसको अपनाकर हम अपने मानव जीवन को स्वस्थ एवं सार्थक बना सकते है ।

योग के प्रकार

योग के कई अलग–अलग प्रकार हैं, वास्तव में छह प्रकार के योग परंपरागत रूप से अभ्यास किए जाता हैं, साथ ही एक नया प्रकार, बिक्रम योग, जो हाल ही में लोकप्रियता में तेजी से बढ़ रहा है।

योग के छह पारंपरिक प्रकार हैं –१. हठ २. राज ३. कर्म ४. भक्ति ५. ज्ञान ६. तंत्र

हठ योग

पश्चिमी देशों में हठ योग लोकप्रिय है। संस्कृत में “ह” का अर्थ है “सूर्य” और “ठ” का अर्थ है “चंद्रमा”। दो महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं जिन पर हठ योग आधारित है।

१. ध्यान – ध्यान में ऐसी स्थिति (आसन) को ढूंढना जो आपके लिए सबसे आरामदायक है और जिसमे आप ध्यान करते समय लंबे समय तक टिक सकते हैं। बहुत से लोग पद्मासन को ध्यान के लिए विशेष रूप से सहायक पाते हैं।

२. शरीर के भीतर ऊर्जा में सुधार – योग, शरीर में ऊर्जा के प्रवाह में सुधार करता है, इसे करने से स्वास्थ्य में सुधार होता है ।

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राज योग

राज योग हठ योग के समान है। राज को योग के अन्य रूपों की तुलना में थोड़ा अधिक कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें अन्य योगासन की तुलना में अधिक अनुशासन और नियंत्रण की आवश्यकता होती है। राज योग मन और शरीर की एकाग्रता, ध्यान और अनुशासन पर केंद्रित है।

राज योग के आठ अंग हैंः

१.नैतिक अनुशासन २. आत्म संयम ३. एकाग्रता ४. ध्यान ५. सांस नियंत्रण ६. मुद्रा ७. संवेदी अवरोध ८. परमानंद .

राज योग का उद्देश्य विचारों को नियंत्रित करना और मन को शांत करना है, जिससे अंत मे आत्म जागरूकता प्राप्त कर सकते हैं।

कर्म योग

कर्म योग का अर्थ निस्वार्थ क्रिया है। कर्म योग करने के लिए, आपको मनुष्य और मानवता की सेवा करने के लिए स्वयं को आत्मसमर्पण करना होगा। कर्म योग हिंदू धर्म पे आधारित है और और इसे भगवत गीता द्वारा स्थापित किया गया था। इस प्रकार के योग का मुख्य उद्देश्य मन और हृदय को शुद्ध करना, नकारात्मक ऊर्जा और नकारात्मक सोच से छुटकारा पाना है। इसे कारण से पता चलता है की कर्म योग शारीरिक से अधिक आध्यात्मिक है।

भक्ति योग

भक्ति योग, दिव्य प्रेम और विश्वास के बारे में है । व्यक्ति मनुष्यों समेत सभी जीवित प्राणी के लिए समय समर्पित करता है, क्षमा और सहिष्णुता का अभ्यास करता है। यह कर्म योग के समान ही है।

भक्ति के ९ सिद्धांत हैं, जिनका पालन किया जाता है।

१.श्रवण २. प्रशंसा ३. स्मरण ४. पडा–सेवा ५. पूजा ६. वंदना ७. दास्य ८. सखा ९. आत्म–निवेदन

ज्ञान योग

ज्ञान योग, दिमाग से नकारात्मक ऊर्जा को मुक्त करता है। इस प्रकार के योग के माध्यम से ज्ञान को पाया जाता हैं ।

ज्ञान योग के तीन मुख्य सिद्धांत हैः

१. आत्मबोध २. अहंकार को हटाने ३. आत्मानुभूति

ये सिद्धांत योगी को अपने जीवन के बारे में वास्तविक ज्ञान या सत्य प्राप्त करने में सहायता करते है।

तंत्र योग

तंत्र का अर्थ है “विस्तार”। तंत्र योग का उद्देश्य अपने दिमाग का विस्तार करना है, ताकि आप चेतना के सभी स्तरों तक पहुंच सकें। यह वास्तविक आत्मा को जागृत करने के लिए उपयोग में लाया जाता है ।

तंत्र योग, विवाहित जोड़ों के लिए अपनी कामुकता को बढ़ाने और उनके रिश्ते में विशेष प्रकार की जुड़ाव के लिए होता है। लेकिन इसे व्यक्तिगत रूप से भी किया जा सकता है, जिसे कुंडलिनी योग कहा जाता है। यह विशेष रूप से सेक्स के बारे में नहीं है, लेकिन यह इसका एक हिस्सा है। यह ज्ञान को प्राप्त करने और कई अनुष्ठानों के माध्यम से स्वयं को पार करने के बारे में भी है।

नव और गैर पारंपरिक योग

बिक्रम योग

बिक्रम योग पारंपरिक ट योगासन में शामिल नहीं किया गया है , लेकिन यह इतना लोकप्रिय हो रहा है कि यह उल्लेख के योग्य है। बिक्रम चौधरी द्वारा बिक्रम योग की रचना की गयी थी । इसका अभ्यास विशेष कमरे में होता है जिसका तापमान लगभग ४० डिग्री होता है। इसमें २६ मुद्राएं और दो प्रकार के श्वास अभ्यास किये जाते।

बिक्रम योग कुछ प्रकार के आध्यात्मिक ज्ञान तक पहुंचने के बजाय शरीर को डीटाक्सफाइ करने के बारे में है । जिसमे की शरीर को बड़े पैमाने पर पसीने के माध्यम से विषाक्त करना होता हैं।

अयंगर योग

अयंगर योग की स्थापना बी. के. एस. अयंगर ने पुणे में अपनी कक्षाओं सी की और समय के सबसे प्रभावशाली गुरुओं में से एक बन गये । उन्होंने ने योग को सटीका से करने पर जÞोर दिया इसलिए वह कक्षाओं में प्रा‘प्स का उपयोग भी करते थे जैसे की ब्लॉक, बेल्ट, बॉस्टर्स, कुर्सियां और कंबल जो चोटों, जकड़न या असंतुलन से बचते हैं ।

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कुंडलिनी योग

योग की यह प्रणाली मानसिक केंद्रों या चक्रों के जागरण से संबंधित है, जो की हर व्यक्ति में मौजूद है। कुंडलिनी योग में, उच्च–स्तर के चक्रों को जागृत किया जाता है जो की उच्च मानसिक केंद्रों से जुड़ी गतिविधियाँ होती हैं। आसन, प्राणायाम, मुद्रा, जप और मंत्र का उपयोग कुंडलिनी ऊर्जा को प्रोत्साहित करने के लिए किया जाता है।

अष्टांग योग

संस्कृत में, अष्टांग का अनुवाद “आठ अंग” के रूप में किया जाता है । अष्टांग योग को बीसवीं शताब्दी में पट्टाभि जोइस ने खोजा, जब वह “योग कोरुंटा” एक प्रचीन योग ग्रंथ का अनुवाद कर रहे थे । इस योग शैली में एक आसन से दूसरे आसन तक जोरदार प्रवाह से जाना शामिल है। अष्टांग अभ्यास में छह श्रृंखलाएं शामिल होती है, जिसमें योगी को बिना रुके एक मुद्रा से दूसरी मुद्रा में जाना होता हैं।

विन्यास योग

हठ योग की तरह, विन्यास जिसमे कई विभिन्न शैलियों शमिल है। विन्यास में सांस और एक मुद्रा से दूसरे में जाने पर मेल बैठिये जाता है । विन्यास शब्द का अर्थ योग प्रवाह और सांस को एक साथ जोड़ने से है।

योग के फायदे

योगाभ्यास से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढती है। इसकी मदद से लम्बी आयु निरोगी होकर गुजार सकते हैं। आजकल इसका प्रचलन बढ रहा है और बहुत से लोग योग का नित्य अभ्यास हमेशा से करते हैं और लाभांवित हो रहे है। आज जब पूरा विश्व कोरोना नामक कहर का शिकार हो रहा है तब योग का महत्त्व और अधिक बढ गया है ।कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए नियमित रूप से योग करना शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है। इससे शरीर दुरुस्त रहता है और मानसिक तनाव भी कम होता है। नियमित योग करने से फेफड़े मजबूत होते हैं। किसी भी वायरस का संक्रमण अगर हमारे फेफड़ों में पहुंच जाता है तो भस्त्रिका प्राणायाम करना चाहिए। यह हमारे शरीर में अ‘ाक्सीजन स्तर बढ़ाने के लिए बहुत लाभदायक है।

प्राणायाम से फेफड़ों की अधिक ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है, जो कि शरीर के प्रत्येक अंग पर सकारात्मक प्रभाव डालती है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी बढती है । वैसे बता देना जरूरी है कि अस्थमा, डायबिटीज, रक्तचाप रोगों के दुष्प्रभाव को योग के माध्यम से कम किया जा सकता है । ध्यान से मानसिक तनाव दूर होता है और मन की एकाग्रता बढ़ती है, क्योंकि आज के दौर में मन की अशांति ही लोगों को अधिक परेशान कर रही है, इसी वजह से तमाम रोग मनुष्य को हो रहे है, हार्टअटैक के मामलों में कई गुना की वृद्धि ही प्रत्यक्ष प्रमाण माना जा सकता है, यदि ध्यान योग किया जाए तो तमाम रोगों से बचा जा सकता है, या फिर संकट को तो कम किया ही जा सकता है । आइए आज के इस विषम परिस्थिति में अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के २०२१ के थीम ‘योग के साथ रहें, घर पर रहें’ (‘बी विद योग, बी एट होम’)को अपनाएँ और स्वस्थ रहें, सतर्क रहें और सुरक्षित रहें ।

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