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जिस तरह आती है चुपके से कविता और मृत्यु अकेले में : विनय सौरभ

 

हिन्दी के सुप्रसिद्ध संवेदनशील कवि विनय सौरभ की कविताएँ


किसी दिन मैं आऊँगा
चुपके से सागर के किनारे
लहरों में
स्वयं को समाहित कर दूँगा
या
स्वयं में भर लूँगा
तुम्हारी मासूमियत को
लेकिन,
आऊँगा किसी दिन
यह जानते हुए
कि
लहरें किसी की
प्रतीक्षा नहीं करती
फिर भी ।

एक दिन मैं लौटा
फूलों और संगीत की दुनिया में
उस दिन जाना मैंने
फूल दुनिया में कहीं नहीं होते
नहीं खिलते शाखों पर
नहीं उगते गमलों में
संगीत यंत्रों में नहीं बसता,
किसी की आँखों में
खिलते हैं फूल
संवेदना के तार
छिड़ते ही बजते हैं
मर्म और प्यार के संगीत ।
ऐसे में
कहीं भी खिलते हैं फूल
कहीं, कभी भी
बस सकती है
संगीत की अनाम दसनिया
आपका आना
फूलों और संगीत की दुनिया में
मेरा प्रवेश हो जाना है
एक दिन मैं लौटा
फूलों और संगीत की
ऐसी ही अनाम दुनिया में ।

यहाँ आकर देखो
अपने शब्दों को
देखो
कैसे सो रहे हैं
मेरी धड़कनों में
परिचित स्पर्श की गंध
तलाशता हूँ
उन कुर्सियों पर
जैसे अभी ही उठकर
गए हो यहाँ से
सदाएँ फिसल ही रही हैं
दीवारों पर
मैं पकड़ने की कोशिश में हूँ लगातार
थके हुए कितने अच्छे लगे थे तुम
वक्षों का  गिरना, उतरना
साँसों के शिखर से
जैसे तय कर के
आ रहे थे
पूरी पृथ्वी के फासले तुम
यकीन करो कि
अभी भी कोई जाग ही रहा है
पानी में
चल रही हो कागज की नाव जैसे
जैसे तय कर रही है कोई रक्काशा
सन्नाटे में घुँघरुओं की आवाज
तुम्हारे नाजुक कंधों पर
टिकाकर अपना विश्वास
पूछना चाहूँगा उन शब्दों की
आत्मा के बारे में
जिनकी सुंदरता तय थी
किसी मासूम बच्चों की हँसी की तरह ।

मैं अब वे कविताएँ
लिखना चाहता हूँ
जो मैंने कभी नहीं लिखीं
जिन्हें मैं
हमेशा चाहता रहा हूँ
लिखना, लेकिन
सबसे पहले मैं
शब्दों पर पड़ी हुई
समय की धूल
हटा लेना चाहता हूँ ।

आ सकता हूँ
निःशब्द, मौन, स्तब्ध
नियति को
झेलते हुए

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जिस तरह
आती है
चुपके से
कविता और मृत्यु
अकेले में ।

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