कैसे जन्मदिन मनाऊँ मैं, जब बेबसी हो फ़िज़ाओं में : स्मृति श्रीवास्तव
कैसे जन्मदिन मनाऊँ मैं,
जब बेबसी हो फ़िज़ाओं में,
सिसकियाँ हो घटाओं में,
वक़्त जैसे ठहर गया हो,
अनहोनी आशंकाओं में।
बताओ कैसे जन्मदिन मनाऊँ मैं।
और मैं अपने साल क्यों गिनती रहूँ,
जब कोई गिन रहा हो अपनी साँसे।
लूँ क्या उपहार भला,
जब कोई निराहार सोया हो।
और क्यों कर मैं काटूँ केक,
जब कोई बैचैन रातें काटता हो।
हां, मुबारकबाद ले रही हूँ,
और मोड़ रही हूँ उसे अपने हृदय में,
दुआ के मानिंद
ताकि वो कर सके आबाद किसी बेसहारे बर्बाद को।
हां समझ सकती हूँ आज,
बढ़ती उम्र से,
अनुभवों के जरिए,
जिंदगी अब उतनी सरल नही,
जितनी थी दो दशक पहले,
मेरे बचपन में।
…. भगवान सभी को स्वास्थ्य दे।

स्मृति श्रीवास्तव ।


