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वो मेरा बचपन : निशा अग्रवाल

 

वो मेरा बचपन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मन आज भी बचपन के
वो गलियारे ढूंढता है।

दादी ,ताई ,चाचियों से
भरा पूरा परिवार
हम भाई-बहन छोटे-छोटे
सबकी खुशियों के आधार
वो अपनापन ,वो सोंधापन
हॅंसी के गुब्बारे ढूंढता है ।
मन आज भी बचपन के
वो गलियारे ढूंढता है।

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एक ही टॉफी को दांतो से तोड़
वो बॉंट कर खाना
एक ही गन्ने को बारी-बारी
टुकड़ों में चूसना
वो बेपरवाह, वो निष्फ़िक्र
खोए हुए हमारे ढूंढता है ।
मन आज भी बचपन के
वो गलियारे ढूंढता है।

छोटी-छोटी बातों पर हमारा
वो लड़ना – ‌झगड़ना
प्यारी से प्यारी चीज भी
आपस में बाॅंट लेना
हॅंसते खिलखिलाते उन मासूम
चेहरों की तस्वीरें ढूंढता है ।
मन आज भी बचपन के
वो गलियारे ढूंढता है ।

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सूरज का मिजाज ठंडा होते ही
छत की ओर दौड़ जाना
कभी कबड्डी, कभी पकड़म-पकड़ाई,
कभी अंत्याक्षरी खेलना
वो छत ,वो दीवारें, अपने से
वो चौबारे, ढूंढता है।
मन आज भी बचपन के
वो गलियारे ढूंढता है।

बरसात से भरे नालों में
कागज की नाव दौड़ाना
बगीचे के कच्चे पक्के अमरूद
छुप छुप के तोड़ लाना
वो अमरूद का पेड़, घर के
पिछवाड़े ढूंढता है ।
मन आज भी बचपन के
वो गलियारे ढूंढता है।

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तीज त्योहारों की वो रौनक
जो चेहरों पर सजती थी,
किसी एक की तकलीफ पर
सबकी आंखें रातों जगती थी ,
वो अपनों का साथ, वो मस्तियां
प्रेम के उजियारे ढूंढता है ।
मन आज भी बचपन के
वो गलियारे ढूंढता है।

निशा अग्रवाल, धरान ।

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