2022 में योगी बदलेंगे यूपी की राजनीति छवि ? : रूचि सिंह
नई दिल्ली से रूचि सिंह । गौरतलब है कि उत्तरप्रदेश में आनेवाले 2022 के विधानसभा चुनाव का आगाज़ हो चुका है. योगी आदित्यनाथ अयोध्या का दौरा कर रामलला का आशीर्वाद लेकर चुनाव का बिगुल बजा दिया है . चुनावी मंथन के लिए दिल्ली में यूपी के सांसद भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव राधामोहन सुनील बंसल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी नड्डा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद रहे. पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने अपने बनारस दौरे के दौरान योगी की कार्य शैली की जम कर तारीफ की है.काबिलेगौर हैकि यूपी के पंचायत चुनाव में 666 सीटों पर ही काबिज हो सकी. हांलाकि समाजवादी पार्टी ने 745 सीटों पर पकड़ जरूर बना ली है.उत्तर प्रदेश में बेशक भाजपा को पटखनी देते हुए समाजवादी पार्टी आगे निकल गईं हैं.इस का ठिकरा अंदर ही अंदर योगी आदित्यनाथ पर फोड़ने की रणनीति बनने लगी.लिहाजा मुख्यमंत्री को बदलने के लिए तमाम हंथकडे होने लगे.
दूसरीओर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या के साथ योगी की गलतफहमी को राजनीतिक गलियारे में भुनाने की कोशिश भी होने लगी.लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी. नड्डा की कोशिश से गलतफहमी को दूर करने की पहल भी हुई. योगी आदित्यनाथ जानते हैं कि उनके कार्य शैली को उत्तर प्रदेश की जनता सराहती है. उत्तर प्रदेश की 22 करोड़ जनता को अपने परिवार के रूप में देखने वाले योगी ने 11 लाख वाले कि. मी. लंबी सड़क को नये पथ पर ले गए हैं. विगत सन्दर्भ को देखें तो 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का परचम तो लहराया है. भाजपा पूरे भारत में केवल अपना ही कद साबित करना चाहती है.2014 के बाद देश के ज्यादातर राज्यों में भाजपा की सरकारें बन गईलेकिन भाजपा के मोह की डोर टूटने लगी है.2019 में सपा बसपा के गठबंधन को अस्वीकार करते हुए भाजपा को जीत की परचम थमा दी गई थी. फिल वक्त केन्द्रीय नेत्तृत्व और प्रदेश नेत्तृत्व की बैठकों का दौर लगातार जारी ही रहता है. उत्तर प्रदेश ऐसा राज्य है जहाँ से सत्ता के दरवाजे मजबूती से आगे बढ़ते है. बरहाल उत्तर प्रदेश में 300 सीटों का लक्ष्य भाजपा ने रखा है. बंगाल जैसा खेल भाजपा नहीं होने देना चाहती. बंगाल में जनाधार था लेकिन वोट बैंक क्यों ऐसा कर बैठी उसे भी कलान्तर में समक्ष ना होगा. फिलहाल राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी.नड्डा लगातार राज्यों का दौरा करके जायजा ले रहे हैं.उधर गृहमंत्री अमित शाह भी अपनी चाणक्य नीति को अमलीजामा पहनाने के लिए नये ब्लूप्रिंट भी तैयार करने में लगे हैं. मजे की बात है कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी की कार्य शैली ने यूपी की छवि एवं दिशा दोनों को बदल डाला है. असली परीक्षा कोरोना काल में योगी सरकार ने कोरोना की दूसरी लहर को जिस तरीके से रोकने के प्रयास किये वह तारीफें काबिल है.25 करोड़ वाली यूपी की आबादी में कोरोना संक्रमण को रोकना आसान नहीं था. आर्थिक रूप से आत्म निर्भरता की ओर बढ़ता उत्तर प्रदेश योगी के बल पर ही है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर मोदी यह भी बखूबी जानते हैं कि यदि उन्होंने अपने सेनापति योगीको साथ लेकर विश्वास करके नहीं चले तो कहीं 2022 का विधान सभा का चुनावी ग्राफ को निचे आते देर नही लगेगी.अतः सारे गिले शिकवे को मिटा कर मोदी ने बनारस दौरे में योगी के कार्यो की जमकर तारीफ करते हुए योगी को ऐसे मंच पर खड़ा कर दिया है कि अब उनकी ही अगुवाई में उत्तर प्रदेश में चुनाव का नगाड़ा बजेगा. मोदी की पहल के चलते केन्द्र और लखनऊ के बीच के तनाव तल्ख़ी पर भी पूर्णतः विराम लग गया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुनावी सेना पति बन कर यूपी की राजनीति की छवि को बदलने की पूरजोर कोशिश करेगे.फिल वक्त समाज वादी पार्टी बसपाई अन्य पार्टीयों ने कंधे से कंधा मिलाकर भाजपा को शिकस्त करने की योजना क्यों ना बनाली हो? पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से एन. सी. पी. के शरद पवार के साथ गठबंधन की तैयारी क्यों ना कर ले भाजपा को शिक्सत देना आसान नहीं होगा. हालांकि समाजवादी पार्टी बसपा कांग्रेस अन्य पार्टीयो के साथ मिलकर आनेवाले विधानसभा चुनावों के लिए अपने अपने कार्यकर्ताओं के लिए बेशक तैयारी कर ली हो.ऐ से प्लान की रूप रेखा बना कर वह केवल छक्के का ही प्लान क्यों ना कर ले होगा वही जो योगी की सरकार नेअपने अपने कार्य क्षेत्र में आम जनता के लिए जो कार्य किया है.वह काबिलियत की शुरुआत है ्जिसे नकारा नहीं जा सकता हैं. आदित्यनाथ योगी शब्दों की राजनीति से परे होकर अपने कार्यो को अंजाम देते आए हैं. फिल वक्त चुनावी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है? भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह और योगी आदित्यनाथ की रणनीति के मोहरे ऐसी चालों को अंजाम देगे कि जीत का परचम लहरा कर उनकी ही झोली में गिरने का वक्त आ रहा है. यदि ऐसा हुआ तो योगी उ. प्र. के राजनीतिक के महराज के रूप में भी स्थापित होने में देर नहीं लगेगी. सवाल यह पैदा होता है कि क्या अन्य दल अपनी अपनी रणनीति का उपयोग कर के योगी के रास्ते में थोड़ा नहीं लगायेंगे.बर हाल यह तो होना ही है.2022 का चुनाव बेहद दिलचस्प होगा. काबिलेगौर है कि कहीं यह चुनाव बसपा के लिए अपना अस्तित्व बचाने का मौका न साबित हो. राजनीतिक शब्दों के भ्रमजाल से जनता को कोईभी सरोकार नहीं होता है.वह किसी भी शासन सत्ता को सत्ता पर काबिज नहीं होने देतीं हैं जो उसकी कसौटी पर खरा नहीं उतरता है.ब रहा मोदी के द्वारा दिए गए इस मौके का दोहन योगी किस तरह से उपयोग करने का ब्लूप्रिंट तैयार कर के 2022 का चुनावी शंखनाद करते है? आगे गोरखनाथ ही जाने कि यूपी का चुनावी घोड़ा किस करवट बैठता है.?

रूचि सिंह वरिष्ठ पत्रकार

