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पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डोगरी भाषा की पहली आधुनिक कवयित्री पद्मा सचदेव का निधन

 

 

Padma Sachdev awarded 2015 Saraswati Samman

पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डोगरी भाषा की पहली आधुनिक कवयित्री पद्मा सचदेव (81) का बुधवार को मुंबई के एक अस्पताल में निधन हो गया। उन्हें बीमार होने के बाद मंगलवार शाम को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह एक बेहतरीन कवयित्री थीं, लिखने पढ़ने वालों की चहेती लेखिका थीं, दूसरों की चिंता करने वाली साहित्यकार थीं और दिल से जितनी नरम थीं, उतनी ही साहसी भी।

बड़े गर्व से उल्लेख करती थीं कि वे जम्मू के राजपुरोहितों की बेटी हैं। आत्मविश्वास इतना कि चाहे कोई कितना भी बड़ा आदमी हो, उससे बेबाक होकर और बराबरी से बात करने में कभी नहीं हिचकती थीं। डोगरी और हिंदी साहित्य अपने जिन रचनाकारों पर गर्व करता रहेगा, उनमें पद्मा सचदेव का नाम भी हमेशा शरीक रहेगा। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के लिए एक लंबा संघर्ष भी रहा उनकी जिंदगी में। उनकी आत्मकथा ‘बूंद बावड़ी’ पढ़कर उनके संघर्ष और साहस का अंदाजा लगाया जा सकता है।

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जम्मू के पुरमंडल गांव में 1940 में उनका जन्म हुआ था । 1947 में भारत के विभाजन का शिकार बने संस्कृत के विद्वान शिक्षक जयदेव बादु की तीन संतानों में सबसे बड़ी पद्मा सचदेव ने अपनी शिक्षा की शुरुआत पवित्र नदी  ‘देवका’ के तट पर  स्थित अपने पैतृक गांव के प्राथमिक विद्यालय से की थी।  पहले उन्होंने डोगरी कवयित्री के रूप में ख्याति प्राप्त की और लोकगीतों से प्रभावित होकर कविता और गीत लिखे। बाद में हिंदी और गद्य में भी साधिकार लिखा। हालांकि वह डोगरी लोकगीतों से हमेशा चमत्कृत रहतीं…उनके मन में हमेशा उन अज्ञात लोकगीतकारों के प्रति सम्मान रहता, जिनके नाम गीतों में नहीं रहते।

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कहती थीं- “कितने महान होंगे वे लोग, जिन्हें अपने लिए नाम की चिंता नहीं।” उन्होंने कुछ बरस जम्मू रेडियो के अलावा दिल्ली में डोगरी समाचार विभाग में भी काम किया था। 1966 में उनकी शादी ‘सिंह बंधू’ नाम से प्रचलित सांगीतिक जोड़ी के गायक ‘सुरिंदर सिंह’ से हुई थी। वह मुंबई में भी लंबे समय तक रहीं। उनकी किताब ‘जम्मू जो कभी शहर था’ को अपार लोकप्रियता मिली थी। उन्होंने 1973 की हिंदी फिल्म ‘प्रेम पर्वत’ और ‘मेरा छोटा सा घर बार’ के गीत भी लिखे।

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उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘अमराई’, ‘भटको नहीं धनंजय’, ‘नौशीन’, अक्खरकुंड’, ‘बूंद बावड़ी’ (आत्मकथा), ‘तवी ते चन्हान’, ‘नेहरियां गलियां’, ‘पोता पोता निम्बल’, ‘उत्तरबैहनी’, ‘तैथियां’, ‘गोद भरी’ तथा हिंदी में ‘उपन्यास ‘अब न बनेगी देहरी’ प्रमुख हैं।

साहित्य अकादमी समेत कई पुरस्कार
उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1970), सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1987), हिंदी अकादमी पुरस्कार (1987-88), उत्तर प्रदेश हिंदी अकादमी के सौहार्द पुरस्कार (1989) से सम्मानित किया गया था। जम्मू-कश्मीर सरकार के ‘रोब ऑफ ऑनर’ तथा राजा राममोहन राय पुरस्कार भी उन्हें मिले थे।

 

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