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मिथिला के लोक साहित्य को बचाने की आवश्यकता – बिक्रम यादव

 


जनकपुरधाम/मिश्री लाल मधुकर।मिथिला की लोक साहित्य विलुप्त की कगार पर हैं इसको बचाना होगा। उपरोक्त बातें रविवार को दरभंगा के मखाना अनुसंधान केन्द्र के सभागार में अखिल भारतीय साहित्य न्यास की ओर प्री लोक मंथन (हम भारत के लोग) कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि पद से वोलते हुए कमला पुत्र बिक्रम यादव ने कही। उन्होंने कहा लोक साहित्य का ही अंग है लोक कथा,लोक गाथा, किस्सा पेहानी,फखरा भी है।आज राजा सलहेस, दीनाभद्री,बंठा चमार,कारिख महाराज का नाम इतिहास में दर्ज है।,शीत बसंत,आल्हा उदल,कुंबर बृजभान नाच लोप हो रहा है। झिझिया, जट जटिन डोमकच आदि मांटी जूड़ी लोक नृत्य विलुप्त हो रहा है। प्राती,चैता महराई ,कारिक महाराज का झूमर को आज के युवा पीढ़ी इनका नाम भी नहीं जानते हैं। इसी मिथिला के बाद्य यंत्र ढोल पिपही,रसन चौकी भी विलुप्त हो रहा है।इसकी संरक्षण की आवश्यकता है।
बिक्रम यादव ने कहा कि मिथिला की नदी कमला से लोक संस्कृति तथा साहित्य जुड़ा हुआ। प्रथम सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.मनोज कुमार ने किया। विशिष्ट अतिथि फूलहर से आये सिया प्यारे शरण (संदीप जी)ने कहा कि लोक साहित्य हमारे पूर्वजों का धरोहर है इसका संरक्षण एवं संवर्धन आवश्यक है। प्रथम सत्र में आयोजित कार्यक्रम में राहुल कुमार चौधरी तथा गौतम कुमार बात्स्यान ने भी विचार रखें।
द्वितीय सत्र में कवि डॉ.विनोद कुमार हंसौड़ा की अध्यक्षता में कवि गोष्ठी आयोजित की गयी। जिसमें कवयित्री नैना साहू, स्वतंत्र शाण्डिल्य,गौरी शंकर साह, आचार्य धीरेन्द्र झा ‘माणिक्य,भारती रंजन, अनिता बाल कवि कृधा नंदिनी आदि कवियों ने अपनी अपनी कविताओं से श्रोताओं का मन मोह लिया। अखिल भारतीय साहित्य न्यास बिहार के महासचिव मीनाक्षी मीनल के संयोजकत्व में कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

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