नेपाल के अस्तित्व पर गहराता संकट, राष्ट्रीय पुनर्जागरण के लिए ‘स्वदेशवाद’ का आह्वान

काठमांडू, 13 जुलाई। बुद्धछिरिङ मोक्तान ने नेपाल के वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संकट को देश के आधुनिक इतिहास का सबसे गंभीर “अस्तित्वगत संकट” बताते हुए राष्ट्रीय पुनर्जागरण का आह्वान किया है। राष्ट्रीय प्रेस क्लब, काठमांडू में आयोजित पत्रकार सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आज का प्रश्न किसी दल या सरकार का नहीं, बल्कि नेपाल के भविष्य और उसकी सभ्यतागत पहचान का है।
उन्होंने कहा कि लगभग तीन हजार वर्ष पुरानी सभ्यता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाला नेपाल आज राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक निर्भरता, युवाओं के बड़े पैमाने पर पलायन, संस्थाओं पर घटते जनविश्वास तथा सामाजिक निराशा जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। उनके अनुसार, यह केवल किसी एक सरकार या राजनीतिक दल की विफलता नहीं, बल्कि दीर्घकालीन राष्ट्रीय दृष्टि के अभाव का परिणाम है।
मोक्तान ने कहा कि वैश्विक शक्ति-संतुलन तेजी से बदल रहा है और एशिया विश्व राजनीति का केंद्र बनता जा रहा है। ऐसे समय में नेपाल को केवल प्रतिक्रियात्मक राजनीति नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता और राष्ट्रीय आत्मविश्वास पर आधारित स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
इसी संदर्भ में उन्होंने “स्वदेशवाद” को आधुनिक नेपाल के पुनर्निर्माण का वैचारिक आधार बताते हुए कहा कि यह कोई प्रतिक्रियावादी या संकीर्ण विचारधारा नहीं है। उनके अनुसार स्वदेशवाद नेपाल के इतिहास, भूगोल, सभ्यता, जनअनुभव और सांस्कृतिक स्मृति से विकसित एक समावेशी राष्ट्रीय दर्शन है, जिसका उद्देश्य विश्व से कटना नहीं बल्कि अपनी मौलिक पहचान के साथ विश्व समुदाय से संवाद करना है।
उन्होंने कहा कि स्वदेशवाद की वैचारिक नींव नेपाल की तीन प्रमुख सभ्यतागत परंपराओं—ब्राह्मण, श्रमण और लोकायत—पर आधारित है। उनके अनुसार ब्राह्मण परंपरा नैतिक शासन और कर्तव्यबोध का संदेश देती है, श्रमण परंपरा करुणा, आत्मानुशासन और मानवीय मुक्ति की चेतना प्रदान करती है, जबकि लोकायत परंपरा स्थानीय ज्ञान, प्रकृति के सम्मान और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता को राष्ट्र निर्माण का आधार मानती है।
मोक्तान ने कहा कि इन तीन स्रोतों से स्वदेशवाद के तीन मूल सिद्धांत विकसित होते हैं—ऋत, प्रतित्य और अनेकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऋत नैतिक राज्य, विधि के शासन और संस्थागत अनुशासन का प्रतीक है; प्रतित्य सहअस्तित्व, पारस्परिक निर्भरता और साझा समृद्धि का आधार है; जबकि अनेकता लोकतंत्र में विचारों की बहुलता, संवाद और विविधता के सम्मान का प्रतिनिधित्व करती है।
उन्होंने नेपाल के लिए एक नए राष्ट्रीय मार्ग का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि देश को ऋत पर आधारित नैतिक राज्य, प्रतित्य पर आधारित सहअस्तित्वपूर्ण समाज तथा अनेकता पर आधारित बहुलतावादी लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल को नई राष्ट्रीय सहमति की आवश्यकता है, जो राज्य क्षमता के निर्माण, उत्पादनमुखी अर्थव्यवस्था, युवाओं के सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय तथा संतुलित, स्वतंत्र और राष्ट्रीय हितों पर आधारित विदेश नीति पर केंद्रित हो।
अपने संबोधन के अंत में बुद्धछिरिङ मोक्तान ने कहा कि नेपाल किसी असफल राष्ट्र के रूप में जन्मा देश नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी जीवंत सभ्यता की अभिव्यक्ति है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि देश अपनी सभ्यतागत चेतना को पुनः जागृत कर स्वदेशवाद को आधुनिक राष्ट्र निर्माण का आधार बनाए, तो वर्तमान संकट ही नए युग की शुरुआत बन सकता है।
उन्होंने सभी नेपाली नागरिकों से दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पुनर्जागरण के साझा संकल्प में सहभागी बनने का आह्वान करते हुए कहा कि “नेपाल का पुनर्जागरण अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है।”

