घर घर में पनपते आतंकी ! : अजय कुमार झा
अजय कुमार झा, जलेश्वर | सर्वप्रथम हमें आतंकी या आतंकवादी किसे कहते हैं यह जानना चाहिए। क्योंकि आम नागरिकों को प्रत्यक्ष सामना इन्हीं लोगों से होता है। आतंकवाद के सिद्धान्त का विश्लेषण और परिभाषा तो वाद में किया जाता है, वह भी मुठ्ठीभर तथाकथित शासक द्वारा संरक्षित और पोषित विद्वानों के द्वारा। आम नागरिक को तो न्याय-अन्याय का जन्मजात बोध होता है। उसमे मानवीय संवेदनाओं को समझने का प्रकृति प्रदत्त प्रज्ञा होता है। लेकिन, जब राज्य संचालन के क्रम मे राजा तथा अधिकारी अथवा आज के भाषा में नेता और कर्मचारी, सरकार और प्रशासन के व्यक्तिगत और सामूहिक लोभ, अहंकार और भ्रष्ट आचार के कारण आम नागरिक के अधिकार और जीवन कष्टकर होने लगता है, जब न्याय के मंदिर आम नागरिक के लिए उपहास का आलय बन जाता है, देश और जनता के रक्षक प्रशासन जब आम नागरिक के वर्तमान और भविष्य का भक्षक बन जाते हैं, देश के सेना जब विभिन्न दबाव के कारण अताताईयो के आगे घुटने टेक देते हैं, तब क्षुब्ध होकर आम नागरिक भी अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए आतंक के विभिन्न आयामों को अपनाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इसतरह आतंकवादी बनाने को बाध्य करने के लिए जितना जिम्मेवार सरकार है उतनी ही परिवार और समाज भी। सरेआम भाई को भाई बेईमानी कर कंगाल बना देता है; और समाज तथा सरकार मुस्कुराती रहती है। गरीब और दलित को षड़यंत्रपूर्ण सामाजिक और प्रशासनिक विभेद को सहना पड़ता है और सरकार मौन साधे रहती है। कही राजनीतिक रूप से हावी होने के लिए धार्मिक, जातीय और सांस्कृतिक संघर्ष का दुष्चक्र सृजना कर वातावरण को आतंकित किया जाता है, तो कहीं धमकी और त्रास पैदा कर जनता के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है तब यहीं से विद्रोह के ज्वालामुखी फूटने लगते हैं, प्रतिशोध की अग्नि प्रज्वलित होने लगती है जो हिंसात्मक या कहें आतंकी व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है। अर्थात्; हमारा लोभ, मोह और अहंकार ही भ्रष्टाचार को जन्म देता है और भ्रष्टाचार को संरक्षण तथा पोषण के लिए अत्याचार को संगठित रूपसे व्यवस्थित किया जाता हा जो महा विनाशकारी आतंकवाद का बीजारोपण है। देवासुर संग्राम, राम रावण युद्ध तथा महाभारत इस तथ्य को परिपुष्ट करता है।
समाज बिखर रहा है, परिवार टूट रहा है, भाई से भाई फुट रहा है, अभिभावक से संतान रूठ रहा है, ऐसे में मानसिक शांति और वैचारिक सद्भाव बढ़ने के बजाय ईर्ष्या, द्वेष और कटुता बढ़ रहा है। जो धीरे धीरे विक्षिप्तता और उद्दंडता में परिणत हो रहा है। यहीं से असंतोष और तीव्र महत्वकांक्षा बढ़ने के कारण आतंकवादी विचार के अंतरधाराएं पनपने लगते हैं। बस, इसी घड़ी का इंतजार राजनीतिज्ञों और धार्मिक कट्टरपंथियों को रहता है। इसका अगला कदम आतंकवाद ही है; जहां से मानवता शर्मसार होती है।
धर्म और राजनीति का अविष्कार लोगों को असभ्य कबिलाई संस्कृति से बाहर निकालकर सभ्य बनाने के लिए हुआ था लेकिन हालात यह है कि यही धर्म और राजनीति आज हमें फिर से असभ्य तथा जंगली होने के लिए मजबूर कर रहा है। यही हमारा अभिशाप भी है। आज सब तरह के अंधे लोगों के हाथों में बम हैं। और वे अंधाधुंध फेंक रहे हैं, अयोग्य के हाथों में सत्ता है, भ्रष्टों के हाथों में न्याय है, अत्याचारियों के हाथों में धार्मिक संगठन है, षडयंत्रकारियों के हाथों में सामाजिक संस्थाएं है, जबकि सभ्य, सृजनशील और योग्यतम लोग भयाक्रांत हैं। उन्हें कभी भी किसी भी जगह कोई भी बिना किसी कसूर के छुरा, गोली या बम से प्रहार कर सकता है। और उस आतंकी का साथ देने के लिए हजारों लोग, पत्र – पत्रिका, संघ – संस्था तथा अभियानी उपस्थित हो जाएंगे। और हम मूक दर्शक बनकर अपनी भाग्य को कोसने पर मजबूर हो जाएंगे।
युगद्रष्टा ओशो कहते हैं,” राजनीति के जिंदा रहने का आधार ही समाज में फूट डालना और लोगों को भयभीत करना हैं। यदि आप लोगों को जब तक किसी दूसरे धर्म या राष्ट्र के खतरे के प्रति भयभीत नहीं करोगे, तब तक लोग आपके समर्थन में नहीं होंगे। किसी भी देश का राजनीतिक दल हो या धर्म, वह आज भी इसी आधार पर समर्थन जुटाता है कि तुम असुरक्षित हो। मुल्क या धर्म खतरे में है।” फिर मुढो के द्वारा धार्मिक युद्ध का शंखनाद किया जाता है जिसमे चेतनशील, सभ्य और सुसंस्कृत लोगों की बलि दी जाती है। कुत्ते और सियार तो हमेशा दाव पे रहते हैं। वो विपक्षी के साथ जुड़े रहते हैं परंतु सच्चे और ईमानदार लोग राष्ट्र के नाम पर भावनात्मक जुड़ाव होने के कारण अपनी कुर्बानी दे देते हैं। फिर उनके लाशों पर मधेश आंदोलन, माओवादी क्रांति और भारत छोड़ो आन्दोलन को सफल बनाकर सियार और कौवे सत्तासीन हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में विकास और जनकल्याण का कोई आभास तक नजर नहीं आता।
परिवार द्वारा बच्चों का सहज और संतुलित लालन-पालन हेतु सम्यक तथा सुरम्य वातावरण का निर्माण कर उनकी चेतना को खिलने के लिए प्रेमापूर्ण माहौल तथा तनावरहित शिक्षण प्रणाली का निर्माण पर पर्याप्त ध्यान देना होगा। साथही परिवारिक सामंजस्य हेतु पति पत्नी के बीच सृजनात्मक तालमेल, विश्वास और सुमधुर समझदारी के साथ साथ समर्पण के भाव होना संतान में दिव्यता लाने के लिए आवश्यक है। पारिवारिक मनोविज्ञान ही बच्चों के अवचेतन मन में संस्कार स्वरूप सशक्त स्थान बना लेता है, जिसको वह जिंदगी भर ढोते फिरता है। वही संस्कार दूसरों पर लादना चाहता है; जो खूनी संघर्ष में बदल जाता है। तलाक के दुष्परिणाम, महिला के प्रति तालिबानी फरमान, काफिर के प्रति कुरान का आह्वान, जातीय भेदभाव, छुवाछूत तथा अपमान, आदि कसंस्कारों से बच्चों में अपराधिक और अहंकारी कुसंस्कारों का बीजारोपण होने लगता है जो जल्द ही भीषण आतंकी के रूप में समाज के सामने उपस्थित हो जाता है। अत: माता – पिता, परिवार, समाज और राष्ट्र को विशेष मानवीय कर्तव्य निर्वहन हेतु सर्वधर्म सद्भाव, सांस्कृतिक सामंजस्य, व्यहारिक कुशलता और भावनात्मक सहिष्णुता को फलित करने के लिए विहंगम तथा दूरगामी योजना पर ध्यान दे।
प्रशासन के द्वारा किया गया अत्याचार, अपराधिक शिक्षा का खुलेआम प्रचार और स्नेह शून्य हिंसात्मक पारिवारिक संस्कार समाज और मानवता को आतंकवाद की ओर झुकने के लिए राजपथ का निर्माण कर देता है। लोकतांत्रिक सरकार में विभिन्न सोच तथा उद्देश्य को फलित करने के लिए सक्रिय राजनीतिक पार्टियों को सत्ता से मतलब होता है न की जनता के समृद्धि और ऐश्वर्यशाली जीवन से। यहीं पर मौलिक भूलें होती आ रही है। एक राजा को उच्च मानवीय मूल्यों के लिए संस्कारित करना जितना आसान है उतना ही जटिल है इन पार्टियों को संस्कारित कर मानवीय संवेदनाओं को समझने के लिए बाध्य करना। वल्कि इससे उल्टा होने की संभावना ही अधिक रहता है। अतः विश्व मानवता को गौरवशाली बनानें के लिए जीवन मूल्यों और चेतना के उत्थान हेतु आज वैश्विक पयासों की आवश्यकता है, जिसका अगुवाई भारत, चीन, अमेरिका, रूस, जापान, अरब, अष्ट्रेलिया और अफ्रीका को करना चाहिए।


