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अच्छे और बुरे आतंकी के चक्की में पिसते मानव समुदाय : अजय कुमार झा

 
अजय कुमार झा, जलेश्वर | अमेरिकी दूरगामी योजना और तुच्छ व्यापारिक षड़यंत्र के कारण तालिबानी लड़ाकुओं को 85 अरब डालर के अमेरिकी सेना के अस्त्र-शस्त्र हाथ लग गए हैं। इनमें 75 हजार सैनिकों को ढोने वाले वाहनों समेत अनेक विमान, हेलीकाप्टर और गोला-बारूद शामिल हैं। यह ताकत इतनी बड़ी है कि तालिबान के पास दुनिया के 85 प्रतिशत देशों से कहीं ज्यादा लड़ाकू हेलीकाप्टर आ गए हैं। दुनियाभर में किसी भी चरमपंथी संगठन के पास खुद की वायुसेना नहीं है। कुछ आतंकी संगठनों की पहुंच ड्रोन तक जरूर हो गई है, लेकिन तालिबान अकेला संगठन है जिसके पास वायुसेना जैसी ताकत है। इससे साफ़ जाहिर होता है की अब पड़ोसी देशों को भी अमेरिका से हथियार खरीदने होंगे यही अमरीकी व्यापारिक संस्कार है। संपत्ति के तुलना में उसे मानवता से कुछ भी लेनादेना नहीं है।
       प्राविधिक रूप से सर्वश्रेष्ठ अमेरिका आर्थिक और सामरिक रूप में भी सर्वशक्तिशाली है। विज्ञान, धर्म, राजनीति और अनुसंधान को दूरगामी व्यापारिक प्रयोजन के लिए कुशलता पूर्वक योजनाबद्ध तरीके से विस्तार, व्यवस्थापन और संकुचन करना ही उसका राष्ट्रीय धर्म हो गया है। अपनी व्यापारिक प्रयोजन को सिद्ध करने के लिए लाखों मानव को हस्ते हस्ते बलि चढ़ा देनेवाला अमेरिका अच्छे और बुरे आतंकवाद का परिभाषा कर रहा है।
*** तालिबान के हाथ लगे अमेरिकी हथियारों के भंडार। ***
>> 8.84 लाख हथियार और सैन्य उपकरण अमेरिकी सेना युद्ध क्षेत्र में छोड़ आई।
>> 6 लाख के करीब है छोड़े गए आधुनिक सैन्य हथियारों की संख्या
>> 208 विमान और हेलीकॉप्टर अफगान में मौजूद थे काबुल पर तालिबान के कब्जे से पहले
>> 26 हेलीकॉप्टर और विमान तालिबानी अड्डे पर एकसाथ खड़े दिखे सैटेलाइट तस्वीर में
>> 05 हेलीकॉप्टर एक अन्य सैटेलाइट तस्वीर में तालिबान के ठिकानों खड़े दिखे
>> अमेरिकी सेना ने अफगान सेना को ये विमान दिए
>> 23 ए-29 लाइट अटैक विमान
>> 60 ट्रांसपोर्ट विमान जिसमें सी 130, सी-182, टी-182 और एएन-32 शामिल
>> 33 एसी-208 विमान
>> 18 पीसी-12 सर्विलांस विमान
>> 08 चालक रहित विमान
*** हेलीकॉप्टर:
>> 33 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर
>> 32 एम आई 17 हेलीकॉप्टर
>> 43 एमडी530 हेलीकॉप्टर
*** असलहा:
>> 358,530 आधुनिक रायफल
>> 3598 घातक एम-4 कार्बाइन
>> 64 हजार से अधिक मशीन गन
>> 25 हजार से अधिक ग्रेनेड लॉन्चर
>> 123295 आधुनिक पिस्टल
>> 9877 रॉकेट आधारित हथियार
>> 2306 मोर्टार और तोप
*** युद्धक वाहन:
>> 75898 युद्धक वाहन
>> 31 मोबाइल स्ट्राइक फोर्स व्हीकल
>> 3012 हमवीज युद्धक वाहन
>> 1005 क्रेन और रिकवरी वाहन
>> 928 बारूदी सुरंग से बचाने वाले एमएआरपी वाहन
>> 189 बख्तरबंद वाहन (एपीसी)
*** संचार-निगरानी उपकरण
>> 16191 इंटेलिजेंस, सर्विलांस और टोही उपकरण
>> 29681 विस्फोटक निष्क्रिय करने वाले उपकरण
>> 162643 संचार उपकरण भी गंवाए
>> 16035 नाइट विजन डिवाइस
>> 120 रेडियो मॉनिटरिंग सिस्टम
>> 06 सर्विलांस बैलून
>> 22 ग्राउंड बेस्ड सर्विलांस सिस्टम
*** प्रमुख हथियारों की कीमत :
>> 2.5 लॉख डालर मौजूदा मूल्य है एक हमवीज वाहन की
>> 15 लॉख डॉलर के करीब एक मोबाइल स्ट्राइक फोर्स व्हीकल की मौजूदा कीमत
>> 1000 डॉलर कीमत है एक एम-4 कार्बाइन की
>> 3 करोड़ डॉलर लागत है एक सी-130 हरक्यूलस विमान की
>> 59 लॉख डॉलर है एक ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर की
>> 24 लॉख डॉलर कीमत है एक एमडी-530 हेलीकॉप्टर की
>> 24.5 लॉख डॉलर है एक एसी-208 लाइट विमान की कीमत
>> 17 लॉख डॉलर है एक एमआई-17 हेलीकॉप्टर की कीमत है।
      इनमे से कुछ प्रमुख हथियार कितने खतरनाक है इसका छोटा सा विवरण देखिए: ब्लैक हॉक चार ब्लेड वाला एक बहुउद्देश्यीय हेलीकॉप्टर है। यह दुश्मन पर हवाई हमला करने और बचाव कार्य करने में कारगर है। यह अपने साथ तोप भी ले जा सकता है। इसी तरह सी-130 हरक्यूलस विमान बहुउद्देश्यीय ट्रांसपोर्ट विमान है। हमवीस युद्धक वाहन बम हमले या जैविक हमलों से सैनिकों की रक्षा करता है। मोबाइल स्ट्राइक फोर्स व्हीकल भी सैनिकों के लिए कवच का काम करता है, इस पर बारूदी सुरंग फटने का असर नहीं पड़ता। यह वाहन मशीन गन और ग्रेनेड लॉन्चर से लैस होता है। अमेरिका ने कुल 33 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर अफगान सेना को दिए थे, इनमें से कितने अब तालिबान के कब्जे में हैं इसकी पुष्टि कोई नहीं कर रहा, मगर तालिबान के पास ये हेलीकॉप्टर है इसकी पुष्टि तस्वीरें कर रही हैं। क्या यह भारत, चीन और छोटे छोटे पड़ोसी देश को वर्वाद का योजनाबद्ध षड़यंत्र नही है?
      तालिबान यदि अपने मददगार पाकिस्तान के जरिये इन हथियारों का उपयोग भारत के खिलाफ करता है तो भारत को अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका से हथियार खरीदने को मजबूर होना पड़ेगा ही। निकट भविष्य में ही नेपाल, भूटान, बांग्लादेश जैसे कमजोर राष्ट्र के लिए यह एक खतरनाक चुनौती साबित होनेवाला है। नेपाल में “एम सी सी” के लिए इतना दबाव सृजना करना आज के अफगानी आम नागरिक के स्थिति में नेपालियों को पहुंचाने की अमरीकी लम्बी साजिश तो नहीं? अब अमेरिका पर भरोसा करना अपनी वंश, परंपरा, संस्कृति और भूमि से हाथ धोने के समान है।
        अमेरिका ने तालिबान को उन लोगों की पूरी लिस्ट सौंप दी है, जिन्हें वह अफगानिस्तान से निकालना चाहता था। अमेरिकी न्यूज वेबसाइट POLITICO की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस लिस्ट में अमेरिकी नागरिकों, ग्रीन कार्ड होल्डर्स के अलावा उन अफगानियों की पहचान शामिल है, जिन्होंने पिछले 20 सालों में तालिबान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका की मदद की है। अमेरिका के इस कदम से हजारों अफगान की जान खतरे में पड़ गई है। तालिबान के कब्जे के बाद से ही ये लोग खौफ मैं हैं और जल्द से जल्द अफगानिस्तान से भाग जाना चाहते हैं। अमेरिका के इस नपुंसक और घटिया कदम पर विशेषज्ञों ने नाराजगी जाहिर की है। जिस चीन के साथ पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आर-पार की लड़ाई लड़ने की ठानी थी, उसी के समक्ष बाइडन एकाएक क्यों झुक गए? बाइडेन का यह निर्णय अमेरिका और मानवता दोनो के लिए कलंक है।
     संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत रह चुकी निक्की हेली ने कहा कि “विश्व के तमाम देश यह देख रहे हैं कि अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद से चीन उन बर्बर तालिबानियों से नजदीकी बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों की राय में इसके पीछे उसकी एक गहरी चाल है, क्योंकि चीन अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा छोड़ा बगराम एयरबेस को हर हाल में अपने नियंत्रण में इसलिए लेना चाहता है ता कि वह पाकिस्तान के सहारे भारत को लेकर अपनी कूटनीतिक साजिश पूरी कर सके। उधर पाकिस्तान अमेरिका से आतंकवाद के विरुद्ध लड़ने के लिए मोटी रकम असुलकर आतंकवाद को ही बढ़ावा देता रहा। आज इसी पाकिस्तान ने अमेरिका को अफगानिस्तान से भगाकर संसार को मुंह दिखाने के लायक तक नहीं छोड़ा है। यह अच्छे और बुरे आतंकी के अमेरिकी परिभाषा का ही ज्वलंत उदाहरण है। जिस ओशामा ने अमेरिका में  घुसकर हजारों अमेरिकी नागरिक को मारा दिया था,  वही पाकिस्तान अमेरिका से पैसा लेकर ओशामा को संरक्षण दे रहा था। क्या अमेरिका इस तथ्य वाकिफ नहीं था? या जान बूझकर नजरंदाज किए हुए था! अपनी अहंकार का पोषण और दूसरे को क्षति पहुंचाने के लिए अमेरिका, चीन और पाकिस्तान जैसे देश किसी भी हद तक गिर सकता है; इसका प्रत्यक्ष और स्पष्ट प्रमाण अफगान और तालिबान दे रहा है।
          जबतक धर्म को मानवता से ऊपर रखा जाएगा तबतक हम किसी भी समस्या से निजात नहीं पा सकते। मैं मानवता/इंसानियत से बड़ा किसी धर्म को नहीं मानता। और इंसानियत का जन्म विना शिक्षा और ध्यान के संभव नहीं। शिक्षा वह जो हमें भौतिक – आत्मिक ज्ञान के साथ सृजनशील बनने के लिए प्रेरित करे। और ध्यान वह जो हमें अपनी चेतना से विश्व चेतना को जोड़ने के काम आए। विज्ञान के बढ़ते कदम के साथ साथ व्यक्ति के निजता और व्यक्तित्व को उसके तर्कशील मष्तिष्क ने अन्ध भक्ति को उखाड़ फेंका है। अब हर व्यक्ति के मनमे हजार प्रश्न उत्पन्न हो रहे हैं, जिसका समाधान आज के मूढ धर्माधिकारी के पास नही है। अबतक धर्म के ठेकेदार लोग अशिक्षित लोगों को मृत्यु के भठ्ठी में झोंक कर अपना लक्ष्य पूरा करते रहें हैं। उन्हें पता है कि अशिक्षित व्यक्ति रुढ़िवादी और ढोंग में भरोसा करता है, अतः इन्हें आसानी से अपने लाभ के लिए स्वर्ग-नर्क का हवाला देकर प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन जब अमेरिका और यूरोप जैसे महान लोकतांत्रिक और मानवाधिकार वादी देशों के राजनेता आज के समय में मानवता को शर्मशार करनेवाली क्रूरतम षड़यंत्र को अपनी सफलता घोषित करे, अतातायियों का समर्थन करे, मानवता के हत्यारा के साथ समझौता कर वर्षों से सहयोग करते आ रहे अपनों के साथ भीषण धोखेवाजी कर उन्हें शत्रुओं के हाथों में मरने के लिए सौप दे; तो फिर आम नागरिक के जीवन का कोई ठोस आधार नहीं रहा जाता। संभवतः इतिहास और पौराणिक कथाओं में अफगानी नागरिकों के साथ किया गया विश्वासघात जैसा उदाहरण खोजना मुस्किल होगा।
       अतः तथाकथित धार्मिक कट्टरपंथी कुछ भी कहें, वह स्वतन्त्रता, समता और बन्धुता के लिए ही खतरा है। उस आधार पर वह लोकतन्त्र के साथ मेल नहीं खाता है। धर्म के नामपर ऊँच नीच और मुठ्ठीभर लोगों के द्वारा बहुमत समुदाय पर अत्याचार स्वाभाविक ही रहता है। यह धार्मिक उन्माद मानव के लिए कब संहारक बन जाएगी कोई नही जानता। ध्यातव्य हो! संसार मे सबसे ज्यादा लड़ाई और मानव का कत्लेआम धर्म के नामपर ही होता आया है। धार्मिक भावनाओं को भड़काकर राजनीति में सत्ता बचाने, व्यापार बढ़ाने तथा वोट बैंक के लिए अल्पसंख्यक को विनाश करने में आसानी से प्रयोग किया जाता है। प्रमाण अफगानिस्तान, सीरिया, पाकिस्तान, इजरायल, बांग्लादेश, भारत आदि देशों में राजनीति पूरी तरह धर्म से प्रभावित है।

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