कांग्रेस के ‘पुनरुत्थान’ का अवसर : लिलानाथ गौतम
विशेषतः स्व. कोइराला ने पार्टी को एकल निर्णय से संचालन किया था । कोइराला प्रवृत्ति को लेकर तीव्र विरोध करनेवाले पात्र देउवा ही थे । इसीलिए एक बार उन्होंने पार्टी विभाजन भी किया, बाद में फिर पार्टी का एकीकरण किया गया । जब एकीकृत पार्टी में देउवा सभापति बन गए, तब वह कोइराला से भी एक कदम आगे निकल गए ।
लिलानाथ गौतम, हिमालिनी, अंक, सितम्बर २०२१ | अन्ततः सत्ताधारी नेपाली कांग्रेस की १४वें पार्टी महाधिवेशन की औपचारिक प्रक्रिया शुरु हो गई है । बार–बार महाधिवेशन की तिथि परिवर्तन होने के कारण लगभग दो साल से पार्टी नेतृत्व आलोचित हो रही थी । ऐसी ही परिस्थिति में आगामी मार्गशीर्ष (९ गते से १३ गते) में काठमांडू में केन्द्रीय महाधिवेशन सम्पन्न कराने का निर्णय कांग्रेस ने लिया है । निर्णय के अनुसार भाद्र १८ गते से महाधिवेशन की औपचारिक प्रक्रिया भी शुरु हो चुकी है । परिवर्तित कार्यतालिका अनुसार कांग्रेस ने भाद्र १८ गते वडा समिति से चुनाव शुरु किया है, अब क्रमशः पालिका, निर्वाचन क्षेत्र, जिला और प्रदेशसभा होते हुए मार्गशीर्ष ९ गते से केन्द्रीय कार्य समिति की चुनावी प्रक्रिया शुरु होने जा रही है ।
महाधिवेशन से कांग्रेस को नया नेतृत्व मिलने वाला है । पार्टी नेतृत्व चयन करने के लिए यह एक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया भी है । ‘नया नेतृत्व’ चयन के नाम में महाधिवेशन तो होने जा रहा है, लेकिन अनुमान भी यही है कि नेतृत्व में आने वाले संभावित अधिकांश नेता पुराने ही होनेवाले हैं, यह निश्चित है ।
कांग्रेस पार्टी के शुभचिन्तक और अलोचकों का मानना है कि कांग्रेस में लोकतान्त्रिक मूल्य–मान्यता कमजोर होती जा रही है और पार्टी का कम्युनिष्टीकरण किया जा रहा है । विशेषतः ४ साल पहले सम्पन्न स्थानीय चुनाव से कांग्रेस नेतृत्व पर यह आरोप लग रहा है । उस समय तत्कालीन माओवादी केन्द्र के साथ की गई चुनावी तालमेल के कारण उसके ऊपर यह आरोप लगा है । उसके बाद भी कई बार कांग्रेस ने कम्युनिष्ट पार्टी के साथ सहकार्य किया है । आज नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में जो सरकार बनी है, वह भी कम्युनिष्ट पार्टी के सहकार्य से ही संभव रहा है । इसीलिए आलोचकों का मानना है कि इससे कांग्रेस ने पार्टी को ही नहीं, लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था को भी कमजोर बना दिया है । ऐसी मान्यता रखनेवाले सिर्फ कांग्रेस से बाहर रहे विश्लेषक हैं, ऐसा नहीं है । स्वयम् कांग्रेस से आबद्ध कई नेता–कार्यकर्ता भी इस तरह का विश्लेषण करते हैं । उन लोगों के लिए यह महाधिवेशन पार्टी पुनरुत्थान का अवसर हो सकता है ।
विगत पाँच साल से शेरबहादुर देउवा पार्टी सभापति के रूप में पार्टी को नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं, जो वर्तमान में प्रधानमन्त्री भी हैं । उनके ही ऊपर पार्टी को अलोकतान्त्रिक बनाने का और कम्युनिष्टीकरण करने का आरोप है । ऐसे आरोप लगानेवाले कहते हैं कि खुला लोकतान्त्रिक अभ्यास में कांग्रेस को कमजोर बनाने का काम देउवा ने किया है । ऐसा आरोप होते हुए भी पहली बार १४वें महाधिवेशन मार्फत नेपाली कांग्रेस के भीतर संशोधित विधान अनुसार समावेशी नेतृत्व चयन का अभ्यास हो रहा है । दावा है कि पार्टी की सभी संरचना में जनसांख्यिक संरचना के अनुसार समावेशी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करनेवाली पहली पार्टी नेपाली कांग्रेस बननेवाली है ।
आगामी कार्यकाल के लिए पार्टी नेतृत्व में आनेवाले संभावित चेहरे को लेकर भविष्यवाणी करनेवाले बहुत सारे लोग हैं । ‘चुनावी प्रक्रिया से नेतृत्व चयन’ और ‘लोकतान्त्रिक अभ्यास’ जो भी नामा करण करें, लेकिन एक बात तो सच है कि कांग्रेस के भीतर व्यक्तिवादी सोच और संस्कार का प्रभाव अधिक है । इसमें परिवर्तन आने की संभावना कम है । कांग्रेस के भीतर ऐसे कई नेता हैं, जो कहते हैं– ‘संस्थापक नेता वीपी कोइराला और कृष्णप्रसाद भट्टराई के बाद सभी सभापतियों ने कांग्रेस में आन्तरिक लोकतन्त्र को कमजोर बनाया है ।’ विशेषतः पूर्व सभापति स्वर्गीय गिरिजाप्रसाद कोइराला और वर्तमान सभापति शेरबहादुर देउवा के ऊपर इस तरह के आरोप अधिक हैं । कांग्रेसी ही कहते हैं– ‘कहने के लिए तो कांग्रेस लोकतान्त्रिक पार्टी है, लेकिन कांग्रेस के अन्दर लोकतन्त्र नहीं है, ऐसे अभ्यास करनेवाले पात्र कोइराला और देउवा ही हैं ।’ ऐसे आरोप में बहुत हद तक सत्यता भी है । यह दोनों पात्र ऐसे हैं, जो पार्टी की ओर से होनेवाले अधिकांश निर्णय खुद करते थे÷हैं ।
विशेषतः स्व. कोइराला ने पार्टी को एकल निर्णय से संचालन किया था । कोइराला प्रवृत्ति को लेकर तीव्र विरोध करनेवाले पात्र देउवा ही थे । इसीलिए एक बार उन्होंने पार्टी विभाजन भी किया, बाद में फिर पार्टी का एकीकरण किया गया । जब एकीकृत पार्टी में देउवा सभापति बन गए, तब वह कोइराला से भी एक कदम आगे निकल गए । पार्टी पदाधिकारियों का चयन का सवाल हो या भातृ संगठनों की नेतृत्व चयन का सवाल, दोनों सभापतियों ने अलोकतान्त्रिक अभ्यास किया है । पार्टी विधान को अनदेखा करते हुए अपने कार्यकाल को बढ़ाने के सवाल में तो देउवा ने इतिहास निर्माण किया है । पार्टी नेतृत्व में पुनः निर्वाचत हो सके, इसी मूल उद्देश्य के साथ क्रियाशील सदस्यता विवाद लम्बे समय से जारी रखा गया, यह लोकतान्त्रिक संस्कार नहीं है ।
वैसे तो यह संस्कार सिर्फ कांग्रेस में है, ऐसा नहीं है । यहाँ माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ को उदाहरण के रूप में ले सकते हैं, जो विगत ३५ साल से भी अधिक समय से पार्टी के मूल नेतृत्व में है । लगता है कि वह जीवन भर पार्टी अध्यक्ष बनाना चाहते हैं । पिछली बार खुद को क्रान्तिकारी और परिवर्तनकारी शक्ति कह कर नया पार्टी खोलनेवाले कथित ‘ मधेशवादी दल के नेता’ हो या विभिन्न जातीय पहचान के नाम में पार्टी बनानेवाले नेता, सभी की हालत कुछ ऐसी ही है, जो अपने जीवन भर पार्टी नेतृत्व छोड़ना नहीं चाहते हैं । पार्टी को विभाजित कर के भी वे लोग पार्टी अध्यक्ष बनाना चाहते हैं । नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (समाजवादी) गठन कर पार्टी अध्यक्ष बननेवाले माधव कुमार नेपाल पिछले उदाहरण हैं । यह सब नेताओं की सामन्तवादी तथा अनुदारवादी चरित्र है । खुद को लोकतान्त्रिक पार्टी कहनेवाली कांग्रेस तथा इनके अधिकांश नेतागण भी इस चरित्र से मुक्त नहीं हैं । जो लोकतन्त्र के लिए खतरा का संकेत भी है । १४वें महाधिवेशन में भी इसका प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई देना स्वभाविक है । क्रियाशील सदस्यता वितरण और नवीकरण विवाद इसका उदाहरण है । इसीलिए तो मजबूत लोकतान्त्रिक अभ्यास में विश्वास करनेवाले कांग्रेसजन अपेक्षा कर रहे हैं– १४वें महाधिवेशन कांग्रेस की लोकतान्त्रिक रूपान्तरण का एक मिसाल बने । खैर ! अपेक्षाकृत ऐसी परिस्थिति निर्माण होने की सम्भावना कम है । तब भी अपेक्षा करनेवालों की इच्छा जायज है ।
हां, देखने लिए तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से ही कांग्रेस अपना नेतृत्व चयन करने जा रही है । पार्टी केन्द्रीय सभापति पद में जो भी निर्वाचित होते हैं, वह आगामी ५ साल के लिए कांग्रेस को नेतृत्व प्रदान करेंगे । आज के दिन पार्टी सभापति पद के लिए १ दर्जन से अधिक नेता आकांक्षी दिखाई दे रहे हैं, इसमें से लगभग आधा दर्जन नेता तो प्रत्यक्ष चुनाव में आने की संभावना है ।
कौन–कौन नेता हैं पार्टी सभापति की दौड़ में
१४वें महाधिवेशन में पार्टी सभापति पद में दावेदारी करनेवाले लगभग एक दर्जन नेता हैं । उनमें से ६ नेताओं की चर्चा अधिक है । बताया जाता है कि सभापति पद के लिए ४ नेताओं की उम्मीदवारी लगभग निश्चित है । प्रथम दावेदार तो वर्तमान सभापति शेरबहादुर देउवा ही है । उन्होंने अपने निकट नेताओं से स्पष्ट कहा है– ‘एक बार फिर मैं पार्टी सभापति बनना चाहता हूं, इसके लिए आप लोगों का सहयोग चाहिए ।’ गत आषाढ़ ५ गते से ही उन्होंने अपना चुनावी अभियान अघोषित रूप में शुरु किया है । देउवा ने दावा किया है कि अगर वह पार्टी सभापति बनते हैं तो आगामी प्रतिनिधिसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को प्रथम पार्टी बनाएंगे ।
यहाँ एक बात स्मरणीय है– १३वें महाधिवेशन में देउवा ने वर्तमान उप–सभापति विमलेन्द्र निधि से कहा था– ‘इस बार मुझे सहयोग कीजिए, आगामी कार्यकाल मैं आप को सभापति पद के लिए सहयोग करुंगा ।’ लेकिन जब वह अवसर आया तो देउवा खुद सभापति बनने जा रहे हैं और कह रहे एक बार फिर मुझे ही सहयोग कीजिए । इसीलिए देउवा से नाराज होकर उप–सभापति निधि ने सबसे पहले सभापति पद के लिए उम्मीदवारी घोषणा कर चुनावी प्रचार–प्रसार शुरु किया है । इसके लिए नयाँ बानेश्वर में कार्यालय भी बनाया जा चुका है । निधिजी का मानना है कि इसबार देउवा समूह से सभापति पद के लिए प्रमुख दावेदार वही है ।
अपोजिट साइड में रामचन्द्र पौडेल हैं, जो इससे पहले शेरबहादुर देउवा से ही पराजित हुए थे । पौडेल ने भी कहा है– मैं सिर्फ एक बार पार्टी सभापति बनना चाहता हूं । उनका मूल्यांकन है कि अगर निधिजी पुनः देउवा को साथ नहीं देते हैं तो मैं निश्चित रूप से सभापति बन जाऊंगा । लेकिन पौडेल समूह में ही उनको साथ देनेवाले नेता कम है । यानि कि उनके समूह से सभापति पद में अपेक्षा रखनेवाले नेताओं की संख्या अधिक है । प्रकाशमान सिंह, शशांक कोइराला, शेखर कोइराला जैसे पौडेल समूह के नेता हैं, जो खुद सभापति में उम्मीदवारी देना चाहते हैं । साथ में कृष्णप्रसाद सिटौला भी है, जो पौडेल समूह से सहयोग की अपेक्षा कर रहे हैं । सिटौला ने यह भी अनुमान किया है कि अगर पौडेल जी सभापति में उम्मीदवारी देते हैं तो सिंह और कोइराला उनके पक्ष में आनेवाले हैं और उनकी चुनावी जीत सुनिश्चित है । सिटौला का दावा है कि प्रथम चरण में तो सम्भव नहीं है, दूसरे अथवा तीसरे चरण में वह सभापति में निर्वाचित हो सकते हैं । कुछ ऐसा ही मूल्यांकन निधि और पौडेल भी कर रहे हैं ।

