न छोड़ना अपनी डोर को कभी : निशा अग्रवाल
न छोड़ना अपनी डोर को कभी
लघुकथा
आप सभी को मकर सक्रांति की ढेर सारी बधाइयां एवं आगामी वर्ष के लिए शुभकामनाएं।
एक पतंग थी। उड़ी जा रही थी दूर आसमान में, ऊंचाइयों को छूने को तत्पर, मस्त अपनी ही धुन में, ऊपर और ऊपर बुलंदियों को छूने की चाहत ,और खुश हो रही थी अपनी सफलता पर ,अपनी उड़ान पर।
और यहां धरा पर कोई उस की डोर थामे उसकी उड़ान पर खुश हो रहा था। उसकी बुलंदियों को छूने की चाहत को पूरी होते देख उत्सव मना रहा था। पर पतंग अपनी उड़ान के धुन में डोर के महत्व को भूल गई। अपनी उड़ान का श्रेय उसने खुद को ही दे दिया।और हेय दृष्टि से उसकी ओर देख हंसी और कहा ,देख तू कहां रह गया और मैं कहां। यह देख कर डोर थामने वाले का हृदय थोड़ा व्यथित हुआ और डोर छूट गई ।पतंग अब अकेली थी पर अब वो उड़ नहीं पा रही थी, वह नीचे की ओर गिरी जा रही थी तेजी से न जाने कितने ही कांटो से उलझी, जमीन पर धूल धूसरित हो गई। हमारा जीवन भी तो ऐसा ही है हम उड़ना चाहते हैं बहुत ऊपर। लेकिन जब तक हमारी डोर ,हमारी धरती से, हमारे मूल्यों से, हमारे संस्कारों से ,हमारे अपनों से ,अपनी संस्कृति से और नैतिकता से जुड़ी रहती है तब तक हमें ऊंची उड़ान उड़ने से कोई नहीं रोक सकता ।बस जुड़े रहिए अपनी जमीन से।
सूर्य के उत्तरायण होने की आप सबको बहुत-बहुत बधाई।
जय श्री कृष्ण
निशा अग्रवा


