वैचारिक दृष्टि से अपने समय से बहुत आगे थे संत रविदास : डॉ उमाशंकर यादव
नारनौल। ‘मन चंगा, तो कठौती में गंगा’ कहकर भक्ति-साधना में मन और आत्मा की शुद्धि पर बल देने वाले संत रविदास समतामूलक समाज के स्वप्नद्रष्टा भी थे। उन्होंने बेगमपुरा के रूप में अपनी इस अवधारणा को प्रस्तुत किया था। यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकार तथा मनुमुक्त ‘मानव’ मेमोरियल ट्रस्ट के चीफट्रस्टी डॉ रामनिवास ‘मानव’ का। संत रविदास की जयंती के सुअवसर पर स्थानीय सैक्टर-1, पार्ट-2 स्थित अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक केंद्र मनुमुक्त भवन में आयोजित एक विचार-गोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता उन्होंने कहा कि संत रविदास ने कार्ल मार्क्स से कई शताब्दियों पूर्व एक ऐसे समतामूलक समाज की अवधारणा प्रस्तुत की थी, जिसमें न तो अमीर-गरीब का भेद होगा और न छुआछूत की भावना; न कोई भूखा रहेगा और न कोई दुःखी होगा। उनका कथन है- ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्न। छोट-बड़ो सब सम बसै, रविदास रहे प्रसन्न।। सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) के कुलपति डॉ उमाशंकर यादव ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में स्पष्ट किया कि रविदास की जीवन-दृष्टि पूर्णतया वैज्ञानिक और समाजोन्मुख थी। वह सभी की प्रसन्नता में ही अपनी प्रसन्नता देखते थे। वैचारिक दृष्टि से वह अपने समय से बहुत आगे थे। मनुमुक्त ‘मानव’ मेमोरियल ट्रस्ट की ट्रस्टी डॉ कांता भारती ने कहा कि अपनी क्रांतिकारी वैचारिक अवधारणा, संस्कृतिक चेतना और जनकल्याण की भावना के कारण रैदास का जीवन-दर्शन और साहित्य छह सौ वर्ष बाद, आज भी प्रासंगिक है। भारत विकास परिषद् के जिला अध्यक्ष डॉ जितेंद्र भारद्वाज ने स्पष्ट किया कि रविदास ने अपने आध्यात्मिक ज्ञान से समाज को भाईचारे, एकता और आत्म-शुद्धि का संदेश दिया तथा जीवन-पर्यंत समाज में व्याप्त कुरीतियों के निवारण हेतु लोगों को जागृत करते रहे। अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के जिला महासचिव डॉ पंकज गौड़ ने संत रविदास को मानवीय मूल्यों का श्रेष्ठ संवाहक और आस्था का शिखर पुरुष बताते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा समाज के दलित-शोषित वर्ग के आध्यात्मिक और नैतिक उत्थान का प्रयास किया तथा समाज के सभी वर्गों पर उनकी सोच, शिक्षा और साहित्य का भी प्रभाव पड़ा।



