एमसीसी परियोजना में मधेश को खोजना कठीन : कैलाश महतो
कैलाश महतो, पराशी | काठमाण्डौ के बानेश्वर बुधवार,२०७८ फागुन ४ के दिन रणभूमि का एक झलक रहा । प्रचण्ड और माधव नेपाल के सरकारी पार्टियों ने ही सरकार के विरोध में अपने कार्यकर्ताओं को अमेरिका द्वारा एमसीसी (MCC) परियोजना के नाम पर नेपाल के लिए बिनियोजित ५५ अरब नेपाली मुद्रा के विरुद्ध का विरोध आन्दोलन रहा ।
एमसीसी अमेरिका का एक रणनीतिक परियोजना है । यह परियोजना अमेरिका इण्डो प्यासिफिक रणनीति अन्तर्गत उन मुल्कों में लागू करता है, जहाँ से उसका सामरिक रणनीति में लाभ हो । अमेरिका यह परियोजना कोई शौक से या सहायता के भाव से किसी देश को कतई नहीं देता । वह इस परियोजना को कम से कम दो कारणों से लागू करने को बाध्य है । पहला यह कि वह कहीं न कहीं उसके समकक्ष या उसके हैसियत को भी पार कर सकने बाले मुल्कों के डर से पैसे और विकास के लालची उन देशों को अपने इस परियोजना का मोहरा बनाता है, जो और जहाँ का राजनीति, अर्थनीति, नेतृत्वनीति और जननीति सब कमजोर और बिकाउ है और जहाँ से वह अपने प्रतिद्वंदी मुल्कों पर अपने ढंग का बाधा या दबाब डाल सके । दूसरा यह कि सामरिक हैसियत के साथ ही वह अपने आर्थिक हैसिय को भी दुनियां पर लाद सके ।
वैसे अमेरिका खुद अरबों डॉलर के ऋण में डुबा हुआ मुल्क है । मगर अपने बडप्पन और सर्व शक्तिशाली होने का पारा मीटर को कायम रखने के लिए भी वह उन गरीब तथा उसके सामरिक नीति में सहयोगी दिखने बाले सम्बन्धित गरीब मुल्कों को सहयोग, सहायता और अनुदान के नाम पर अपने आर्थिक जाल में फांसता है, जो यह समझ नहीं पाता कि उसे किसी दुर्गति में फंसाया जा रहा है ।
दर असल अमेरिका के इण्डो प्यासिफिक रणनीति के अन्तर्गत एमसीसी मार्फत नेपाल लगायत जिन देशों को आर्थिक अनुदान के नाम पर रकम मुहैय्या कराया जाता है, उन सारे गरीब और आर्थिक रुप से कमजोर मुल्कों को अमेरिका, चीन, रुस, जापान, या यूरोप के विकास इतिहास को अध्ययन करना चाहिए कि क्या किसी के अनुदान, भीख, सहायता या दान के पैसों से उन्होंने अपना विकास किया है ? आज वे दूसरों को अनुदान देने में किसी ले सहयोग पर सक्षम हुए हैं ?
नि:सन्देह अमेरिका स्थापित परम्परावादी सामरिक शक्ति से सम्पन्न रा़ष्ट्र है, जबकि बिल्कुल नये ढंग से आर्थिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, प्राविधिक और सामरिक क्षेत्रों में चीन, जापान, इरान, इजरायल, उत्तर कोरिया, भारत जैसे देशों ने द्रुत गति धारण कर रही हैं । उनकी यही प्रगति अमेरिका के लिए चुनौती का विषय बन रहा है । इसी कारण अमेरिका हर उन देशों के पडोसी गरीब और कमजोर देशों में आर्थिक अनुदान के नाम पर उसले पडोस के विकसित और विलासशिल देशों पर नजर रखने ले लिए उन कमजोर देशों में अपना जासूसी सन्यन्त्र फिट करता है । वह हर उन देशों पर अनेक प्रतिबंध लगाता रहता है, जो साइन्स और टेक्नोलॉजी, हाथ हथियार या मिसाइल प्रक्षेपण करना चाहता है ।
उसी आर्थिक अनुदान के सिलसिले में अमेरिका ने नेपाल और बंगलादेश को एमसीसी अन्तर्गत का आर्थिक अनुदान सहायता रकम उपलब्ध कराना चाहता है । नेपाल में अमेरिका अपना सैन्य या जासुसी सञ्जाल बैठाकर चीन का एक्सरे करना चाहता है, वहीं बंगलादेश में अनुदान देकर भविष्य में शक्ति संचय करने के कागार पर रहे भारत समेत पर निगरानी रखने की उसकी गोप्य रणनीति हो सकता है । क्योंकि अमेरिका यह भी नहीं चाहेगा कि भारत भी कल्ह रुस, चीन, इरान और उत्तर कोरिया के तरह अमेरिका को खुल्ला चुनौती देने का हैसियत बना लें । सही में कहा जाय तो नेपाल में भी अमेरिका आ गया तो वह एक ही तीर से दो शिकार कर सकता है । नेपाल से ही चीन और भारत को एक साथ अपने निगरानी में रख सकता है, भलेही बंगलादेश ने उसके आर्थिक परियोजना को अस्वीकार कर दिये हो । बंगलादेश ने अगर स्वीकार कर लिया होता तो भारत दोनों तरफ से निगरानी का शिकार होता ।
जहाँ तक चीन और उसके आर्थिक तथा सामरिक शक्ति का विश्व के गरीब और कमजोर मुल्कों से सम्बन्ध का सवाल है, चीन अमेरिका से भी खतरनाक शक्तशाली बनिया है । सही विश्लेषण किया जाय तो अमेरिका तो अपने सामरिकता के हिसाब से दुनियां में अपना साम्राज्य फैलाना चाहता है । मगर चीन तो दुनियां के हर उन देशों को पहले आर्थिक रुप में सहयोग के नाम पर वहाँ घुसना चाहता है । बाद में उन्हें अपने सामरिक शक्ति के बल पर निगल जायेगा । लाओस, श्रीलंका, पाकिस्तान, आदि जैसे मुल्क ताजा उदाहरण हैं । चीन भी दुनियां के गरीब मुल्कों को आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक रुप में अपने बी.आर.आइ (बेल्ट ऐण्ड रोड इनोसिएटिभ) परियोजना के मार्फत अपने निगरानी और चंगुल में रखना चाहता है । सही में चीन और अमेरिका दोनों ही शक्तिशाली मुल्क गरीब और कमजोर दुनियां के देशों के लिए अभिशाप ही सावित होगा । क्योंकि वे अपने राष्ट्रगत स्वार्थ ले लिए उन गरीब और कमजोर मुल्कों को पीसकर रख देंगे ।
एमसीसी और बी.आर.आइ परियोजना से नेपाल के ही कहे जाने बाली मधेश में उसका कोई गरिमा नहीं है । उन परियोजनाओं के बारे में आम और सर्व साधारण मधेशी जनता को कुछ जानकारी तक नहीं है । परियोजना सञ्चालक देश और उसके सरकार भी सत्तायी सरकार से बात, वार्ता और सम्झौता करता है । उनके बारे में सरकार में सामेल मधेशी कहे जाने बाले पार्टी और उसके नेतृत्व तक से भी वे कोई सरोकार या जानकारी देने लेने के आवश्यकता महशुश नहीं करता है । क्योंकि मधेशी और मधेश आधारित किसी पार्टी को न तो नेपाल अपना नेता और पार्टी मानता है, न बाहरी कोई अन्य मुल्क ।
उपरोक्त हालातों पर विश्लेषण किया जाय तो हम यही कह सकते हैं कि बहुसंख्यक नेपाली शंकों को अगर सही मान लें कि एमसीसी के रणनीतिक परियोजना के साथ नेपाल में अगर अमेरिकी या बी.आर. आइ के रास्ते अमेरिकी या चीनिया सेना ही नेपाल में आ जाये तो मधॆश और मधेशियों को उससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए । कारण, न तो नेपाली सेना मधेशी के लिए अपना है, न अमेरिकन सेना । मधेश के लिए दोनों सेना और राज्य नीति समान रुप से विदेशी ही हैं और रहेंगे । नेपाली राज्य और उसके सेना तो आजतक मधेशियों अपना नागरिक मानने को तैयार नहीं है । मधेश को उन विदेशी परियोजनाओं में आधिकारिक रुप से खोजना कठीन और असंभव है ।

