उत्तरप्रदेश का चुनाव 2022, फिर आ रहें हैं योगी : प्रेमचंद्र सिंह
4 years ago
लखनऊ । उत्तरप्रदेश की 403 सीटों के लिए विधानसभा का चुनाव 10 फरवरी से 7 मार्च, 2022 तक सात चरणों मे हो रहा है, अभी तक चार चरणों मे 231 सीटों पर चुनाव हो चुका है और दिनांक 27 फरवरी को पांचवाँ चरण का चुनाव 61 सीटों के लिए हो रहा है। इसके बाद दो चरणों मे शेष 111 सीटों के लिए चुनाव होना बाकी है, 10 मार्च,2022 को चुनाव परिणाम आएगा। चुनाव मैदान में मुख्यतः भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी(बसपा) और कांग्रेस तथा उनके सहयोगी पार्टियां जोर आजमाइश कर रहे हैं। इस चुनाव में बसपा का कमजोर चुनावी प्रदर्शन तथा कांग्रेस की राजनीतिक अस्तित्व हेतु लड़खड़ाती चुनावी तेवर को देखते हुए सीधा चुनावी संघर्ष भाजपा (योगी आदित्यनाथ) और सपा (अखिलेश यादव) के बीच सिमट गया है। दो ध्रुवीय चुनाव होने का फायदा भी इन्ही दोनों पार्टियों को सीधे होगा, मसलन भाजपा के विरोधी वोट का सीधा लाभ सपा को और सपा के विरोधी वोट का सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा। त्रिकोणीय या बहुकोणीय चुनावों में इसके इतर सभी संबद्ध पार्टियों का विरोधी वोट एक से अधिक पार्टियों में बट जाया करती है, द्विकोनिय या दो पार्टियों के बीच सीधी लड़ाई के कारण ऐसी संभावना नही है।
सपा का मूल वोटर मुसलमान और यादव (एमवाई समीकरण) इस चुनाव में भी दिख रहे हैं। इन दोनों समुदायों की छवि आज भी समाज के अन्य गैर-मुस्लिम तथा गैर-यादव जातियों खासकर उनके कमजोर तबकों में आक्रांता, भयकारी और दमनकारी की बनी हुई है। इन प्रताड़ित तथा भयाकुल संवर्गों का प्रयास यही रहेगा कि किसी भी हालत में प्रदेश में सपा की सरकार न बन पाए। इसके इतर योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व वाली पिछली भाजपा सरकार ने बिना भेदभाव के प्रदेश के सभी लोगों को मजबूत सुरक्षा सुनिश्चित की है, कोई सांप्रदायिक या जातीय दंगा नही हो पाया, गुंडा राज्य समाप्त हो गया है। ऐसे में अपनी सुरक्षा के लिए इन भयभीत समुदायों का भाजपा सरकार पर विश्वास दिखना स्वाभाविक है, इसलिए इनका वोट भाजपा की ओर जाते दिख रही है। इन दंगों और असामाजिक तत्वों का सबसे अधिक शिकार महिलायें ही होती हैं, उनकी गृहस्ती उजरती है, उनका अपमान होता है, उनके साथ शारीरिक बलातकार होता है – – ऐसी घटनाओं में हिन्दू-मुस्लिम, ऊंची-नीची जाति की महिलाओं में भेदभाव नही होता है, सभी महिलायें को एक समान पीड़ा का शिकार होना पड़ता है। ऐसी स्थिति में अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए धर्म और जाति की सीमाओं के परे सभी महिलाओं में भाजपा के प्रति रुझान दिख रहा है। तभी तो पूर्वमुख्यमंत्री एवं बसपा सुप्रीमो मायावती जी को अभी कुछ दिन पूर्व यह कहना पड़ा कि विधानपरिषद की आगामी चुनाव में भाजपा के उम्मीदवारों को बसपा का समर्थन मिलेगा।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव इस बार आजमगढ़ की जगह अपने पिता मुलायम सिंह यादव के मैनपुरी जिला के करहल सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। करहल में चुनाव तीसरे चरण में हो चुका है, चुनाव से पूर्व सपा के जिलाध्यक्ष द्वारा अखिलेश यादव जी को पत्र लिखा गया, जो सार्वजनिक हो गया। इस पत्र में करहल क्षेत्र में सपा की डांवाडोल स्थिति के संबंध में चिंता व्यक्त की गई और आग्रह किया गया कि अगर मुलायम सिंह यादव चुनाव से पहले करहल में आ जाये तो स्थिति में सुधार हो सकती है। मुलायम सिंह यादव जी को स्थिति को भांपते हुए अपने ही पूर्व चुनाव क्षेत्र में अपने बेटा अखिलेश यादव के लिए वोट मांगने जाना पडा।उत्तरप्रदेश में फिरोजाबाद, मैनपुरी(करहल), शिकोहाबाद, इटावा,फरुखाबाद आदि ऐसा यादव बाहुल्य क्षेत्र है जहां यादवों की आवादी 70 से 80
प्रतिशत तक है। यादव जाति मुख्यतः दो समुदायों में बंटा हुआ है – – एक समुदाय ‘खमरिया यादव’ और दूसरी ‘घोसी यादव’ समुदाय के रूप में प्रचलित है। अखिलेश यादव जी ‘खमरिया यादव’ समूह से आते हैं, जो कुल यादव आबादी का सिर्फ 30% के आसपास है जबकि करीब 70% आबादी ‘घोसी यादव’ समुदाय की है। अखिलेश यादव जी केवल अपने ‘खमरिया यादव’ समुदाय के लोगों को ही प्रश्रय देते हैं, उन्हें ही चुनाव में टिकट देने में वरीयता देते है, ‘घोसी समुदाय’ अखिलेश यादव और उनकी सपा पार्टी द्वारा हमेशा उपेक्षित रहा है। हालत यह है कि घोसी समुदाय सपा और अखिलेश यादव के विरुद्ध खुलकर मुखर है और उनका वोट भाजपा को जाता दिख रहा है।
योगी जी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में बिना भेदभाव के सभी को योजनाओं का सामान रूप से लाभ मिला है, इन लाभार्थियों को भय है कि भाजपा के इतर अगर और कोई अन्य पार्टी सत्ता में आती है तो उन्हें जो लाभ अभी मिल रहा है उससे उन्हें बंचित होना पड़ेगा। इसलिए लगता है कि इस चुनाव में भाजपा उतनी नही लड़ रही है जितनी भाजपा की ओर से प्रदेशव्यापी लाभार्थियों का यह विशाल समुदाय लड़ रहा है, जिसमे सभी जाति और धर्म के लोग सम्मिलित है। उदाहरण के तौर पर शाहजहांपुर में सपा समर्थक यादवों और भाजपा समर्थक यादवों के बीच हिंसक संघर्ष, बदायूं में सपा समर्थक मुसलमानों और भाजपा समर्थक मुसलमानों के बीच हिंसक लड़ाई और फिरोजाबाद में भाजपा समर्थक ब्राह्मणों और सपा समर्थक यादवों के बीच खूनी भिड़ंत इस वास्तविकता का जीता-जागता गवाह है। योगी सरकार में बिना भेदभाव के जिस तरह से सबको योजनायों का लाभ मिला है, उसकी लंबी सूची है। चाहे मुफ्त राशन हो या किसान सम्मान निधि का पैसा हो या श्रम कार्ड होल्डर श्रमिकों को 1000 रुपये महीने का लाभ और पेंसन का 500 रुपये महीने का अतिरिक्त फायदा हो, ये सब जनधन एकाउंट के जरिए सीधे लोगों को मिल रहा है, इसके अलावा शौचालय, विजली, मकान, गैस चूल्हा, हर घर मे नल से पानी, सड़क आदि अनेक सुविधायों समानरूप से लोगों की जिंदगी को बदल रही है।यह सब ठोस लाभ लोगों को दिख रहा है,यह केवल अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह आश्वसन भर नही है। यह सब कोरोना के महामारी के बाबजूद घटित हुआ है। वर्णित स्थिति में आमलोग आपस मे एक-दूसरे को नमक का वास्ता देकर कसम खिलाते दिख रहे हैं कि जिस पार्टी की सरकार की नमक खाए हो उसको तो वोट देकर अपना हक अदा करो।
मोदी और योगी के बारे में तो लोग अब खुलकर बोलने लगे हैं कि जिनका कोई अपना परिवार नही है वो किनके लिए भ्रष्टाचार करके कमाई करेगें। भाजपा के विरोधी भी वोट किसी को दे, समर्थन किसी का करे, लेकिन योगी सरकार की नीतियों तथा कार्यक्रमों के खिलाफ उनके पास कोई मुद्दा नही है। इन संकेतों और संदर्भों से इस चुनाव की दशा और दिशा साफ होता दिखने लगा है। योगी जी की सत्ता में वापसी से इस प्रदेश की पिछले 36 वर्षों की चुनावी रिकॉर्ड इस बार टूटेगा, वर्ष-1985 के बाद कोई भी राजनीतिक पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में नही आ पाई है। अभी तक चुनाव में एन्टी- इनकंबेंसी फैक्टर काम करता था, इस बार का चुनाव परिणाम प्रो-इनकंबेंसी फैक्टर की ओर बढ़ता दिख रहा है। यह चुनाव कई मायनों में राजनीतिक कीर्तिमान स्थापित करेगा, चुनावी राजनीति की रणनीति और मानकों को रूपांतरित करने वाला है। बांकी 10 मार्च को चुनाव परिणाम का इंतजार सबको है। देखना दिलचस्प होगा कि कितनी वोट प्रतिशत और कितनी विधानसभा सीटों के साथ भाजपा की सत्ता में दुबारा वापसी होती है।