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“गर्भानुभूति” 😊 व्यंग्य:- बिम्मी कालिन्दी शर्मा,

 

व्यंग्य-लेख:- बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बहुत लोगो को गर्भानुभूति होती है । गर्भ खालि है फिर भी होती है वह भी पुरुषों को । अब गर्व करने के दिन गए अब तो महसुस करना है वह भी गर्भ से । बेचारे पुरुष नौं महिने भ्रुण या बच्चे को अपने पेट में पाल नही सकते । ईसी लिए गलती से ही सही लिखते हुए गर्भानुभूति कर लेते है । और यह गर्भानुभूति सीना चौठा कर के बातों में उत्साह लबरेज हो कर आंख खुशी के आंसु से भिगो कर गर्भानुभूति करते है ।
असल में यह गर्भानुभूति है क्या । वास्तव में लिखना और कहना तो गर्वानुभूति करना चाहते थे । पर कम्प्यूटर के किबोर्ड में हात फिसल गया और कापी में पेन से स्याही बिखर गयी ईसी लिए गर्वानुभूति गर्भानुभूति में बदल गई । सिर्फ गर्भानुभूति ही नहीं हमारे यहां बुढा ‘बुडा’ हो गया और बुढी ‘बुडी’ बन गई । ईतना ही शहीद को हमने सच मे ‘सहिद’ कर दिया कि बेचारा घिसते-घिसते अब आर्यघाट ही पहुंच गया । हमें कोई व्यक्ति पसंद नहीं है ईसी लिए हम उस से चिढ कर उसे ‘ब्याक्ति’ या ‘बेक्ति’ बना चूके हैं । ईंसान को तो ईंसान से तो जन्मजात वैर था ही अब अक्षर या शब्द से भी वैर हो गयी है । भूख लगी कुछ खाने को नहीं मिला ईसी लिए हिंदी या नेपाली वर्णमाला के सभी रुढ अक्षर को खा कर हमेशा के लिए निगल गए ।
बेचारे ‘ढक्कन’ के ढ ने हमारा क्या बिगाडा था ? वह तो बेचारा ढकने के ही काम आता था और हमारी गल्तियों को भी यदा कदा ढक देता था । पर हम ईतने बेईमान हैं कि उस सीधेसादे ढक्कन के ढ को ड बना कर उसके जाति को ही बदल दिया । ईतने से भी हमारा मन नही भरा और हम व पर भी टूट पडे । बेचारा ‘वाराणसी’ का व काशी में बैठ कर धर्म कर्म कर रहा था । उस बेचारे व को भी उसकी जाति से निष्कासित कर के ‘बँदर’ का बना दिया । और तालू से जुडा हुआ तालव्य ‘श’ को भी उसकी जाति से लात मार के भगा दिया और पडोसी ‘स’ से मेल कर लिया । आखिर मे यह निर्दयी समाज स से ही बनता है । पानी में रह कर मगरमच्छ से वैर करने कि बजाय बेचारे श को ही बहिष्कृत कर दिया । ईस के लिए हमें शर्मानुभूति नहीं होती.है बल्कि गर्भानुभूति होती है ।
कितनी.मजेदार बात है न कि पुरुषों को गर्भ नहीं ठहरता फिर भी जब उनकी पत्नियां बच्चे जन्माती है तब वह खुशी से उन्मत्त हो कर गर्भानुभूति करने लगते है । और कभी-कभी पुरुषों को ही.नहीं. महिलाओं को भी गर्भानुभूति हो जाती है । तब वह शर्म से पानी-पानी नहीं होती । अब आंख मे पानी बचा हो तब न । यह शोसल मीडिया का जमाना है । सब को कुछ न कुछ लिखते ही रहना है । और ऐसे लिखते हैं कि जैसे लगाम से छूटा हुआ घोडा हो वैसे ही किबोर्ड पर सरपट भागने लगते है । भाषा की शुद्धता कि ऐसी कि तैसी । जब शरीर और मन ही शुद्ध नही है तो वंही से उपजने वाली भाषा कि रचनात्मकता शुद्ध कैसे होगी ?
लेखक.और.साहित्यकार बननेवाली कि अंधी दौड में.हम ईतने फिसल गए कि अपनी भाषा की शुद्धता पर भी हमारा वश नही रहा । हम वश को भी ‘बस’ बना देते है और नो-ईन्ट्री में भी उस बस को सिग्नल तोड कर घुसा देश ते हैं । सभी को चर्चित होना है जल्दी नाम कमाना है । ईसके लिए अनाप-शनाप लिख कर भी छा जाना है । किस वाक्य को कंहा लिखना है वाक्य गठन प्रक्रिया मालूम है नहीं पर बनना है बडा लेखक । और ईसके लिए भाषा को ही शहीद बना कर उसकी शुद्धता को ही वलिदान कर देते है । यदि दुनिया में सब से ज्यादा वलिदान किसी ने दिया है तो वह है भाषा और शब्दों ने । ईन बेचारों कि क्या गलती है भई ? यह तो बेचारे वर्णमाला में चूपचाप पडे हुए थे । वंहा से आप ईनको उधार में ले आए । और ईनका उधार भी चूक्ता नहीं किया और उल्टे ईनकी बखिया उधेड दी । आप जैसे बेयक्ति ही ‘वानर’ को बानर बना कर भालू कि तरह नचाते है और नाले का ढक्कन नही ‘डक्कन’ खोल देते है ताकि.कोई ‘बुडाबुडी’ उस में गीर कर ‘सहिद’ हो जाए । हम तो सुधरने वाले हैं नहीं ईसी लिए हमको कभी शर्मानुभूति नहीं हमेशा गर्भानुभूति होती है । ☺️😊

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