भारत–नेपाल राजनीतिक रिश्तों की कमजोर होती डोर : ललित झा
ललित झा, अंक फरवरी 022, हिमालिनी पत्रिका ।भारत नेपाल संबंध का सबसे कमजोर पहलु यही मालूम पड़ता है कि आज दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध बहुत कमजोर हो गया है । दोनों देशों के शीर्ष राजनेताओं के बीच कोई व्यक्तिगत राजनीतिक संबंध नहीं के बराबर है । जानकारों के अनुसार ऐसी स्थिति, हमेशा से नही रही है बल्कि दोनों देश के संबंधों में एक ऐसा भी दौर था जब दोनों देशों के प्रमुख नेताओं के बीच व्यक्तिगत स्तर पर बहुत प्रगाढ़ और आत्मीय संबंध हुआ करते थे । चाहे राजशाही का दौर रहा हो या फिर राणाशाही का या फिर लोकतंत्र स्थापना हेतु राजनीतिक संघर्षों का, नेपाल के हर सुख–दुख में, भारत की आत्मीय सहभागिता रही है ।
भारत के कई नेताओं यथा पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, डॉ कर्ण सिंह, शहीद सूरज नारायण सिंह, लोकनायक जय प्रकाश नारायण, डी पी त्रिपाठी, सीताराम येचुरी जैसे कई प्रबुद्ध नेताओं का नेपाल के प्रायः सभी नेताओं से घनिष्ठ राजनीतिक संबंध रहा है । जिस कारण नेपाल का शायद ही ऐसा कोई राजनीतिक आंदोलन अथवा परिवर्तन हुआ हो जिसमें इन नेताओं का महत्त्वपूर्ण योगदान न रहा हो । भारत के ये सभी नेता नेपाल के लगभग सभी प्रमुख जनआंदोलन में न सिर्फ सहयोग करते थे बल्कि उसमें सहभागी भी होते थे । ठीक वैसे ही भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर संपूर्णक्रांति जैसे राजनीतिक आंदोलन तक प्रायः सभी में नेपाल के नेताओं का अमूल्य योगदान रहा है । चाहे नेपाल के महान लोकतांत्रिक नेता वी पी कोइराला हो या सप्तरी के रामेश्वर सिंह, भारत को स्वतंत्रता दिलाने में इनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता ।
भारत को स्वतंत्रता दिलाने में नेपाल के लोगों और नेताओं के महान योगदान को रेखांकित करते हुये नेपाल में भारत के राजदूत रहे मंजीव सिंह पूरी ने कहा था– भारत को स्वतंत्रता दिलाने में नेपाल की जनता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और इनका योगदान भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा है । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कहानी नेपाल के नेताओं के अप्रतिम सहयोग के बिना अधूरी होगी । यानी यह कहा जा सकता है कि अतीत में दोनों देश के नेताओं के बीच राजनीतिक काफी आत्मीय और प्रगाढ़ रहा है लेकिन प्रगाढ़ राजनीतिक संबंधों की यह डोर अब धीरे–धीरे कमजोर होती जा रही हैं, । अभी आलम यह है कि राजनीतिक रूप से प्रगाढ़ और आत्मीय संबंध की तो बात छोडि़ये, यह बेहद औपचारिक और रस्मी होकर रह गया है जो दोनों देश के कूटनीतिक पदाधिकारियों की इच्छाओं, आकांक्षाओं पर निर्भर करता है । जिसका परिणाम हम सबके सामने दिख रहा है । भारत नेपाल संबंध पर नजर रखने वाले जानकारों की माने तो दोनों देश के बीच मधुर राजनीतिक संबंध होने का सबसे बड़ा फायदा ये था कि जब भी दोनों देशों के बीच कोई विवाद उत्पन्न होता था तो दोनों देशों के नेता मिलकर राजनीतिक स्तर पर विवाद को सुलझा लेते थे, लेकिन कुछ राजनीतिक कूटनीतिक कारणों से दुर्भाग्यवश अब ऐसी स्थिति नही है । अब जो संबंध है वह सरकार के स्तर पर कूटनीतिक पदाधिकारीयों के द्वारा संचालित राजनीतिक संबंध है जो काफी सतही दिखता है । अभी के राजनीतिक संबंधों में न तो आत्मीयता झलकती है और न ही प्रगाढ़ता ।
कमजोर होते राजनीतिक संबंध का कारण–
विश्लेषकों की माने तो विभिन्न कारणों से आज भारत और नेपाल के राजनीतिक स्थिति परिस्थिति में काफी परिवर्तन हुआ है जिस कारण नेताओं के बीच व्यक्तिगत स्तर का राजनीतिक संबंध लगभग खत्म सा हो गया है । जिसके कारण छोटा–छोटा सा लगनेवाला विवाद, अब बड़ा विवाद का रूप ले लेता है और दोनों देशों की सरकारें सिर्फ एक दूसरे का मुँह देखती रह जाती हैं, कुछ कर नही पाती । पूर्व में ऐसी स्थिति नही थी, प्रगाढ़ राजनीतिक संबंधों के कारण गंभीर से गंभीर विवाद को वार्ता के टेबल पर सरल और सहजता से सुलझा लिया जाता था । भारत नेपाल के बीच सभी विवादों अथवा असहमतियों का हल सिर्फ कूटनीति के भरोसे नही हो सकता हैं लेकिन दुर्भाग्य से आजकल कूटनीति के अलावे और कोई राजनीतिक चैनल काम नही कर रहा है । वाकई मे छोटे–छोटे राजनीतिक विवादों के कारण कई महीनों तक दोनों देशों के बीच बातचीत बंद रहती है, । यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है ।
यह स्थिति अचानक नहीं उत्पन्न हुई है बल्कि, इसके लिए दोनों देशों की सरकारी नीतियाँ जिम्मेवार हैं । कहने के लिए तो भारत नेपाल संबंध को बहुस्तरीय और बहुआयामी बता दिया जाता है लेकिन व्यवहारिक रूप से ऐसा रह नही गया है । राजनीतिक सामाजिक सांस्कृतिक एवम धार्मिक स्तर के संबंध को हमारे नीति निर्माताओं ने निष्प्राण सा कर दिया है । आज स्थिति यह है कि कूटनीति के अलावे अन्य सभी संबंध महत्वपूर्ण होते हुए भी प्रभावहीन जैसे हो गये हैं । दोनों देशों को राजनीतिक सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से जोड़नेवाली दर्जनों संगठन अस्तित्व में है लेकिन बेबकूफाना नीतियों के चलते सभी महत्त्वहीन होकर अप्रासंगिक हो गए हैं । जबकि जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक पार्टियों, नेताओं, और धार्मिक सांस्कृतिक संस्थाओ के स्तर पर संबंध को प्रगाढ़ और आत्मीय बनाया जाय । जनता समाजवादी पार्टी के नेता तथा मधेस प्रदेश के सांसद राम आशीश यादव का मानना है कि यदि दोनों देश के बीच प्रगाढ़ राजनीतिक संबंध होता तो कालापानी लिपुलेक् जैसा सीमा विवाद इतना गंभीर राजनीतिक विवाद का रूप नही लेता ।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दोनों देशों में विगत के चंद वर्षों में हुये राजनीतिक परिवर्तनों ने भी हमारे राजनीतिक संबंध को नाकारात्मक रूप से प्रभावित किया है । नेपाल में चीन प्रेरित बामपंथी राजनीति का उभार और भारत में दक्षिणपंथी हिंदुत्त्व् से प्रेरित राजनीति का उदय– इन दोनों घटनाओ ने भारत नेपाल के बीच सदियों से कायम प्रगाढ़ राजनीतिक संबंध को किसी हद तक असहज कर दिया है । भारत को, नेपाली राजनीतिक नेतृत्व् के मन में उत्पन्न असहजता और आशंका को दूर करने का प्रयास होना चाहिए ताकि दोनों देशों के बीच आत्मीय राजनीतिक संबंध को फिर से पुनर्स्थापित किया जा सके । दोनों देशों के बीच प्रगाढ़ और आत्मीय राजनीतिक संबंध, वक्त की जरूरत है, इसके लिये राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर प्रयास होना चाहिए ।
ताकि सभी तरह के विवादों का हल राजनीतिक स्तर पर सहज सरल तरीके से किया जा सके अन्यथा नेपाल की राजनीति में चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण, भारत के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं ।

