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मधेश में पाकिस्तानी तब्लीगी जमात की सक्रियता: सामुदायिक सुरक्षा, समाज संदर्भ में उभरते प्रश्न

 

अनिल तिवारी, बिरगंज, नेपाल,13 अगस्त 2026 । कुछ महीने पहले बारा जिले की जीतपुरसिमरा उपमहानगरपालिका में इज्तिमा का आयोजन हुआ। आयोजकों ने प्रशासन को बताया कि यह स्थानीय इज्तिमा था। लेकिन इज्तिमा में पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए कुछ जमातों ने भी भाग लिया। हालांकि, इस तथ्य को छिपाया गया।

नेपाल के तराई–मधेश क्षेत्र में हाल के समय में तब्लीगी जमात की गतिविधियों में वृद्धि की सूचनाओं ने सुरक्षा और सामाजिक क्षेत्र में नई बहस को जन्म दिया है। विशेष रूप से पाकिस्तान से पर्यटक वीजा पर काठमांडू आने वाले जमातों की पहली पसंद पूर्वी अथवा मध्य तराई क्षेत्र होने की बात सामने आती रही है।

भारतीय मीडिया के दावों के अनुसार, सुनसरी की घटना से पहले दो जमातों ने उक्त क्षेत्र का दौरा किया था और इसकी रिपोर्ट नेपाल की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा भी किए जाने की बात कही गई है। पाकिस्तान से आया बताया जा रहा सात सदस्यीय दल विभिन्न जिलों में मुलाकातों को तेज करने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह केवल धार्मिक गतिविधि है या इसके पीछे कोई अन्य आयाम भी मौजूद हैं।

तब्लीगी जमात की स्थापना वर्ष 1927 में उत्तरी भारत में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से हुई थी। इसलिए यह जमात विश्व स्तर पर इस्लाम के प्रचार-प्रसार से संबंधित एक गैर-राजनीतिक धार्मिक आंदोलन के रूप में जानी जाती है। दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों में इसकी गतिविधियों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण पाए जाते हैं। कुछ देशों ने इसे पूरी तरह धार्मिक अभियान के रूप में स्वीकार किया है, जबकि कुछ देशों ने सुरक्षा संवेदनशीलता के आधार पर इसकी निगरानी की है। तब्लीगी जमात कई इस्लामी देशों में प्रतिबंधित संगठन होने की बात भी कही जाती है। नेपाल में हालांकि इसकी गतिविधियों के संबंध में स्पष्ट सरकारी दृष्टिकोण सार्वजनिक नहीं हुआ है। विदेशी नागरिकों को धार्मिक प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से वीजा देने की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं होने के बावजूद पाकिस्तान और बांग्लादेश से जमातों के पर्यटक वीजा पर नेपाल आने का क्रम बढ़ता दिखाई देता है।

मधेश क्षेत्र में दिखाई दे रही हालिया पाकिस्तानी सक्रियता ने स्थानीय स्तर पर दो प्रकार की प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया है। एक ओर मुस्लिम समुदाय के कुछ नेताओं ने इसे धार्मिक संदेश फैलाने वाली नियमित गतिविधि के रूप में व्याख्यायित किया है। उनके अनुसार, अशांति और हिंसा की पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों द्वारा ‘अमन और शांति’ का संदेश फैलाना स्वाभाविक है।

दूसरी ओर, कुछ हिंदू संगठनों तथा नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने इसे सतर्कता के साथ देखने की आवश्यकता बताते हुए सरकार से सावधानी बरतने का आग्रह किया है। उनका तर्क है कि अचानक बढ़ी ऐसी गतिविधियां धार्मिक संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकती हैं और सामाजिक सद्भाव पर असर डाल सकती हैं।

इसी बीच, सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी कुछ प्रश्न उठे हैं। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान से संबंधित समूहों की गतिविधियों, पिछले चुनावों तथा आगामी स्थानीय तह चुनावों में संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर सूचनाएं एकत्र किए जाने का दावा किया गया है। हालांकि, इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई आधिकारिक आधार सार्वजनिक नहीं हुआ है। नेपाल सरकार अथवा सुरक्षा निकायों की ओर से इस संबंध में औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आने के कारण सूचना और अनुमान के बीच की दूरी अभी स्पष्ट होना बाकी है।

दो उभरती महाशक्तियों के बीच स्थित शांत हिमालयी राष्ट्र नेपाल भूराजनीतिक बफर के रूप में स्थित है। नेपाल की आंतरिक स्थिरता भारत और चीन के बीच व्यापक क्षेत्रीय संतुलन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है, इसलिए इसका रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है।

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पिछले कुछ वर्षों में नेपाल को पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखे जाने को लेकर भी तीखी बहस शुरू हुई है।

भारत के साथ 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा, नेपाल और भारत के बीच सदियों पुराने सामाजिक संबंध, अपेक्षाकृत आसान आवाजाही तथा सीमा सुरक्षा की कमजोरियों का लाभ उठाकर ISI द्वारा नेपाल और विशेष रूप से मधेश को अवैध गतिविधियों के संचालन तथा सुरक्षित ठिकाने के रूप में इस्तेमाल किए जाने के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। सीमा क्षेत्रों में मौजूद कथित एजेंटों के माध्यम से पाकिस्तान द्वारा खुली आवाजाही और ट्रांजिट का उपयोग किए जाने की बात भी विभिन्न घटनाओं के संदर्भ में कही जाती रही है।

वर्ष 2011 में विकीलीक्स के माध्यम से सार्वजनिक किए गए अमेरिकी कूटनीतिक केबलों में नेपाल को वर्ष 1999 के विमान अपहरण की योजना में इस्तेमाल किए जाने और इससे नेपाल की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचने का उल्लेख होने का दावा किया गया था।

इसी प्रकार, ‘स्ट्रैटफोर’ नामक वैश्विक खुफिया एवं रणनीतिक विश्लेषण कंपनी की जून 2000 की रिपोर्ट तथा वर्ष 2001 में 16 किलोग्राम RDX के साथ गिरफ्तार किए गए पाकिस्तानी राजनयिक की घटना का हवाला देते हुए यह दावा किया गया है कि अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्कों ने नेपाल की कमजोरियों का दुरुपयोग किया।

हाल की घटनाओं ने नेपाल–भारत सीमा पर पाकिस्तानी जासूसी गतिविधियों को लेकर चिंता और बढ़ाई है। सितंबर 2025 में प्रभात कुमार चौरसिया से संबंधित जासूसी और सिमकार्ड घुसपैठ मॉड्यूल, वर्ष 2025 के मध्य में अन्सुरुल मियां अंसारी मॉड्यूल, जून 2026 में शेख सकीम की पिस्तौल के साथ गिरफ्तारी तथा अप्रैल 2026 में कपिलवस्तु सीमा क्षेत्र में उच्च मूल्य के सोने के आभूषण चोरी के मामले में हुई गिरफ्तारी जैसी घटनाओं को ISI समर्थित बताए गए पाकिस्तानी जासूसी ऑपरेटरों की विभिन्न गतिविधियों से जोड़कर देखा गया है। इन घटनाओं ने सीमा सुरक्षा को लेकर संवेदनशीलता और बढ़ा दी है।

जनजी आंदोलन के बाद गठित नई नेपाल सरकार जब अपने पड़ोसी देशों के साथ भविष्य के द्विपक्षीय संबंधों की दिशा तय कर रही है, ऐसे समय में भारत के अत्यंत संवेदनशील माने जाने वाले ‘चिकन नेक’ क्षेत्र में विदेशी खुफिया एजेंसियों की बढ़ती गतिविधियों की खबरें दोनों देशों के सुरक्षा तंत्र को संवेदनशील बनाना स्वाभाविक है।

विश्व में नेपाल और भारत के बीच मौजूद विशिष्ट संबंधों को बदनाम करने के लिए प्रॉक्सी गतिविधियों के माध्यम से नेपाली भूमि का इस्तेमाल किए जाने की आशंका काठमांडू पर नई दिल्ली की ओर से दबाव पैदा कर सकती है। भारतीय मीडिया में आ रही खबरों को देखते हुए नेपाल के लिए इस विषय पर संवेदनशील और सतर्क रहना आवश्यक दिखाई देता है।

विदेशी खुफिया एजेंसियों को नेपाल की संप्रभुता तथा आंतरिक स्थिरता को कमजोर करने से रोकना नेपाल की तत्कालीन सुरक्षा प्राथमिकता के रूप में लिया जाना उचित होगा।

एक अन्य चिंताजनक पहलू के रूप में नेपाल की धार्मिक तथा जनसांख्यिक संरचना में हो रहे क्रमिक परिवर्तन को प्रस्तुत किया गया है। आधिकारिक जनगणना के आंकड़ों के आधार पर वर्ष 2001 से 2021 के बीच मुस्लिम आबादी में 55.5 प्रतिशत वृद्धि होने और इसका लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा तराई क्षेत्र में निवास करने का दावा किया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, नेपाल में 911 पंजीकृत तथा अनुमानित 2,500 से 3,000 अपंजीकृत मदरसे होने और औसतन प्रत्येक 7 से 8 बच्चों के लिए एक मदरसा होने का भी दावा किया गया है।

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इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—इन मस्जिदों और मदरसों के निर्माण के लिए धन कहां से प्राप्त हो रहा है?

व्यापक रूप से यह दावा किया जाता है कि ऐसी आर्थिक सहायता जकात/सदकाह, परोपकारी संस्थाओं एवं ट्रस्टों, विदेशी दाताओं तथा इस्लामी परोपकारी संगठनों से प्राप्त होती है, जिनमें मुख्य रूप से सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत के स्रोतों का उल्लेख किया जाता है। इन आर्थिक प्रवाहों के नियमन और पारदर्शिता का विषय गंभीर चिंता का विषय बताया गया है।

क्या सरकार ऐसे आर्थिक स्रोतों की जांच, निगरानी और नियमन के लिए कोई नियामक तंत्र विकसित करने की योजना बना रही है, या धार्मिक बुनियादी ढांचे का यह विस्तार इसी तरह जारी रहेगा?

नेपाल में साम्प्रदायिक तनाव पैदा कर ‘हिंदू–मुस्लिम’ के बीच विभाजन को उभारकर यह दिखाने की कोशिश कि नेपाल में मुस्लिम समुदाय कमजोर है और उसके साथ व्यापक दमन हो रहा है—ऐसे कथित आख्यानों के माध्यम से विदेशों से धन प्राप्त करने वाले कुछ धार्मिक NGO/INGO की संभावित गतिविधियों के प्रति दोनों समुदायों और सरकार को सतर्क रहना चाहिए। तराई में सक्रिय ऐसे संगठनों की पारदर्शिता, वित्तीय स्रोत और गतिविधियों की कानूनी एवं निष्पक्ष निगरानी की आवश्यकता पर भी विचार किया जाना चाहिए।

तब्लीगी इज्तिमा और विदेशी जमातों की गतिविधि

नेपाली सरकार ने बड़े स्तर पर विदेशी सहभागिता वाले तब्लीगी इज्तिमा (सामूहिक धार्मिक सभा) पर प्रतिबंध लगाया हो अथवा अनुमति देने से इनकार किया हो, इसके बावजूद पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से आने वाले तब्लीगी जमात के सदस्यों के तीन से चार महीने तक नेपाल में रहने की बात कही जाती है।

उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, काठमांडू स्थित नेपाली जामे मस्जिद के मुफ्ती अबु बकर कासमी तथा इसी प्रकार की संस्थाओं से जुड़े अन्य स्थानीय सहयोगियों द्वारा विदेशी जमातों के स्वागत और प्रबंधन में भूमिका निभाने तथा नेपालगंज, रौतहट, वीरगंज, बारा और विराटनगर जैसे तराई क्षेत्रों में उनकी आवाजाही बढ़ने के आरोप लगाए गए हैं।

हाल ही में सुनसरी में दुर्भाग्यपूर्ण हिंसक साम्प्रदायिक झड़प हुई थी, जिसकी जांच के लिए सरकार ने समिति भी गठित की है। हालांकि, एक अन्य दावे के अनुसार, तुर्की में रहने वाले पाकिस्तानी धर्मगुरु मोहम्मद इलियास घुमान ने जुलाई 2026 में काठमांडू तथा नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों, विशेषकर रौतहट, सप्तरी और पूर्वी तराई का दौरा किया था।

उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर घुमान को पाकिस्तान में सुरक्षा बलों के कर्मचारियों की लक्षित हत्या में शामिल अतिवादी तथा Hizbul Mujahideen, Harkat-ul-Ansar और Harkat-ul-Mujahideen जैसे विभिन्न देशों द्वारा प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों से संबंधित व्यक्ति बताया गया है। इन दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।

इस यात्रा के बाद 26 जुलाई 2026 को कोशी तथा मधेश क्षेत्र में सुनसरी में हुई हिंसक साम्प्रदायिक झड़प में पांच लोगों की तत्काल मृत्यु की घटना के साथ उनके दौरे को जोड़कर प्रश्न उठाए गए हैं। क्या यह केवल संयोग है या इसके पीछे कोई संबंध है? नेपाल के भीतर होने वाली ऐसी घटनाओं को सुरक्षा निकायों द्वारा गंभीरता से लेकर निष्पक्ष जांच और विश्लेषण किया जाना आवश्यक है।

उपलब्ध दावे के अनुसार, घुमान ने नेपाल में मौजूद अपने संपर्कों को काठमांडू, रौतहट और नेपालगंज में नई मस्जिदों के निर्माण का निर्देश दिया था, जिससे भविष्य में विदेशी जमातों की आवाजाही को आसान बनाया जा सके। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या भविष्य में पाकिस्तान से आने वाली जमातों की आवृत्ति और बढ़ेगी?

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नेपाल की कुल मुस्लिम आबादी लगभग 6 प्रतिशत होने की स्थिति में धार्मिक बुनियादी ढांचे में असामान्य रूप से बड़े निवेश करने वाले व्यक्तियों या संस्थाओं की पहचान तथा उनके उद्देश्यों का सरकार द्वारा गंभीर अध्ययन किया जाना चाहिए। हालांकि, धार्मिक संरचनाओं की संख्या या निर्माण को अपने आप में किसी सुरक्षा खतरे का प्रमाण नहीं माना जा सकता; इसके लिए वित्तीय स्रोत, कानूनी स्थिति और वास्तविक गतिविधियों की तथ्यपरक जांच आवश्यक है।

वर्तमान सुरक्षा स्थिति ने विशेष रूप से रोहिंग्या सहित कागजातविहीन विदेशी नागरिकों के अनियमित प्रवेश की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है।

नेपाल पुलिस के पुलिस महानिरीक्षक दानबहादुर कार्की द्वारा भी इस विषय पर चिंता व्यक्त किए जाने का उल्लेख किया गया है। इसके बाद 7 अगस्त 2026 को नेपाल में अवैध रूप से रह रहे 526 रोहिंग्याओं के संबंध में समाचार प्रमुखता से सामने आने का दावा किया गया।

सीमावर्ती क्षेत्रों से नेपाल के अंदरूनी हिस्सों और राजधानी तक इस प्रकार का आवागमन एक ही रात में नहीं हो सकता। वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों द्वारा कागजातविहीन विदेशी नागरिकों की उपस्थिति को लेकर बार-बार चेतावनी दिए जाने की बात कही जाती रही है। इससे नेपाल की आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा हो सकती है तथा भविष्य में कूटनीतिक संबंधों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

भारतीय मीडिया में किए गए दावों के अनुसार, मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों, बुनियादी ढांचे के विकास, धार्मिक प्रवचन तथा अन्य गतिविधियों के माध्यम से ISI नेपाल को कम लागत में उच्च प्रभाव हासिल करने वाले प्रॉक्सी क्षेत्र के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि, ऐसे दावों को आधिकारिक रूप से प्रमाणित तथ्यों से अलग रखते हुए देखा जाना आवश्यक है।

ऐतिहासिक घटनाक्रम, संभावित कट्टरपंथीकरण, जनसांख्यिकीय परिवर्तन, धार्मिक बुनियादी ढांचे का विस्तार, अपारदर्शी वित्तीय प्रवाह तथा डिजिटल माध्यमों पर फैलने वाली अतिवादी सामग्री—इन सभी पहलुओं को समग्र रूप से देखते हुए नेपाल को अपनी सुरक्षा प्रणाली को और मजबूत तथा नियमन-आधारित बनाने की आवश्यकता दिखाई देती है।

ISI तथा अन्य विदेशी खुफिया एजेंसियों के संभावित भूमिगत नेटवर्क की पहचान के लिए प्रभावी सूचना-संग्रह प्रणाली, वित्तीय निगरानी, सीमा सुरक्षा तथा डिजिटल सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना आवश्यक हो सकता है।

सरकार को इन घटनाक्रमों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करना चाहिए, संभावित कट्टरपंथी तत्वों की गतिविधियों पर कानून के अनुसार निगरानी और कार्रवाई करनी चाहिए तथा उभरती चुनौतियों को कम करने के लिए स्पष्ट रणनीति विकसित करनी चाहिए। साथ ही, किसी भी समुदाय को सामूहिक रूप से संदेह की दृष्टि से देखने के बजाय व्यक्ति, संगठन और गतिविधि-विशेष के आधार पर कानूनी एवं तथ्यपरक जांच की जानी चाहिए।

समग्र रूप से, वर्तमान स्थिति ‘सूचना’ और ‘आधिकारिक पुष्टि’ के बीच के संक्रमणकालीन चरण में दिखाई देती है। इसलिए इस विषय को न तो अतिरंजित किया जाना चाहिए और न ही पूरी तरह सामान्य मानकर नजरअंदाज किया जाना चाहिए। तथ्य-आधारित विश्लेषण, पारदर्शी सरकारी प्रतिक्रिया और निष्पक्ष सुरक्षा निगरानी आवश्यक हैं।

नेपाल सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, सुरक्षा निकायों को पारदर्शी और कानूनसम्मत निगरानी रखनी चाहिए तथा विभिन्न समुदायों के बीच संवाद को बढ़ावा देना चाहिए।

अंततः, नेपाल जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में कोई भी धार्मिक गतिविधि अपने आप में समस्या नहीं है। लेकिन यदि किसी गतिविधि का सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय सुरक्षा या राजनीतिक स्थिरता पर संभावित प्रभाव पड़ता है, तो उसे समय रहते समझना और संविधान तथा कानून के अनुरूप संतुलित ढंग से प्रबंधित करना ही दीर्घकालीन समाधान का आधार बन सकता है।

अनिल तिवारी
बिरगंज, नेपाल

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