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सन्यास की उम्र में सत्ता की भूख : लिलानाथ गौतम

 

लिलानाथ गौतम, काठमांडू, अंक फरवरी, हिमालिनी।दो साल पहले (वि.सं. २०७६ साल फाल्गुन २७ गते) तत्कालीन राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी (राप्रपा) और राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी (राप्रपा संयुक्त) के बीच पार्टी एकता हो रही थी । पार्टी एकता घोषणासभा को सम्बोधन कर रहे थे– तत्कालीन राप्रपा अध्यक्ष कमल थापा । सम्बोधन के दौरान उन्होंने अपने जेब में हाथ ड़ाला और एक छोटी–सी पुस्तक निकाली । वह पुस्तक थी– हिन्दू धर्मावलम्बियों का पवित्र ग्रन्थ ‘श्रीमद्भगवतगीता’ । गीता हाथ में लेकर अध्यक्ष थापा ने कहा कि अब इसके उपरान्त वह कभी भी पार्टी विभाजन नहीं करेंगे ।

उस समय उन्होंने पार्टी के अन्य दो अध्यक्ष पशुपति शमशेर जबरा और प्रकाशचन्द्र लोहनी को भी गीता को साक्षी रखकर पार्टी विभाजन ना करने के लिए शपथ खिलाई थी । उस समय उन्होंने कहा था– ‘पार्टी को प्रेम करनेवाले साथियों को साक्षी रखकर मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब मैं कभी भी पार्टी विभाजन नहीं करुंगा । क्या आप लोग मुझे विश्वास नहीं करेंगे ? मैं (जेब से गीता निकालते हुए) गीता भी साथ में लाया हूँ, इस गीता के ऊपर हाथ रखकर मैं कहता हूँ– अब राप्रपा कभी भी विभाजित नहीं होगी ।’

थापा वही व्यक्ति हैं, जो नेपाल के धर्मनिरपेक्ष घोषणा के बाद नेपाल को पुनः हिन्दू–राष्ट्र बनाने का मूल मुद्दा लेकर राजनीति में क्रियाशील हैं । इस अर्थ में उनके लिए सनातन धर्म का पवित्र ग्रन्थ ‘गीता’ सिर्फ पुस्तक ही नहीं, आस्था और सत्य का प्रतीक भी है । लेकिन आज वही थापा गीता की शपथ तोड़ कर नयी राजनीतिक पार्टी घोषणा कर रहे हैं ।

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यहाँ एक बात स्मरणीय है– श्रीमद्भगवतगीता सिर्फ पुस्तक और आस्था ही नहीं, सत्य का प्रतीक है । हिन्दू धर्म गीता–दर्शन पर ही आधारित है । कहा जाता है कि गीता विज्ञान सम्मत भी है । परापूर्वकाल में आज की तरह लिखित संविधान नहीं था, अदालत भी नहीं थी । उस समय सत्य बोलना ही धर्म कहा जाता था । हिन्दू धर्म में विश्वास करनेवाले लोग गीता को छू कर अगर कुछ बोलते हैं तो विश्वास किया जाता है कि वह शत–प्रतिशत सत्य बोल रहे हैं और वह उसके विपरित जानेवाले भी नहीं हैं । आम विश्वास है कि अगर कोई गीता को छूकर कुछ प्रतिबद्धता (शपथ) कर उसके विपरित जाते हैं तो उसका नरक में वास हो जाना निश्चित है । ज्योतिष शास्त्री भी कहते हैं कि इस तरह गीता को साक्षी रखकर की गई शपथ को अगर तोड़ा जाता है सत्य का नाश हो जाता है ।

अब यहां एक प्रश्न उठता है– हिन्दू धर्म के नाम से राजनीति करनेवाले कमल थापा क्या इस सच्चाई अर्थात् धार्मिक विश्वास से अनभिज्ञ हैं ? यह तो हो ही नहीं सकता । ऐसा है तो उन्होंने क्यों राप्रपा को विभाजन कर नयी राजनीतिक पार्टी निर्माण किया ? सरल उत्तर है– थापा के लिए धार्मिक आस्था, विश्वास और प्रतिबद्धता से अधिक शक्तिशाली राजनीतिक पद और सत्ता । धर्म के नाम पर राजनीति करनेवाले थापा को ही नहीं, प्रायः सभी राजनीतिक पार्टी के नेताओं के लिए सत्ता और शक्ति ही सब कुछ है । यह हमारे नेताओं का आम चरित्र है ।
इसी चरित्र के अन्तर्गत कमल थापा ने वि.सं. २०७६ फाल्गुन २८ गते गीता को साक्षी रखकर की गई प्रतिबद्धता को दो साल के बाद अर्थात् वि.सं. २०७८ माघ २५ गते तोड़ दिया । इसके पीछे एक ही कारण है– पार्टी महाधिवेशन में पराजय होना । हरदम सत्ता राजनीति से करीब रहनेवाले थापा को लगा कि यह हार उनके लिए भारी पड़ सकता है, सत्ता से दूर ले जा सकता है । इसीलिए उन्होंने नयी पार्टी निर्माण कर पुनः पार्टी प्रमुख बनने का ठान लिया । संभवत सार्वजनिक रूप में गीता की शपथ खाकर उसको तोड़नेवाले नेता भी थापा हैं, जो हिन्दू धर्म में आस्थावान के लिए एक दुर्लभ घटना भी है । हिन्दू धर्म के नाम से राजनीति करनेवाले नेता गीता के नाम में ही इस हद तक गिर जाएंगें, गीता–प्रेमियों ने शायद ही सोचा होगा ।

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खैर ! कमल थापा तथा उनके समकक्षी अन्य किसी भी नेताओं के प्रति आम जनता में कोई आकर्षण नहीं है । राजनीतिक विचार और उन लोगों की व्यक्तिगत उम्र के दृष्टिकोण से भी वे लोग अब रिटायर्ड (सन्यासी) जीवन के लायक हो चुके हैं । सिर्फ कमल थापा ही नहीं, वर्तमान प्रधानमन्त्री शेरबहादुर देउवा से लेकर केपीशर्मा ओली, पुष्पकमल दाहाल, माधव नेपाल हो या जातीय तथा क्षेत्रीय मुद्दा को लेकर राजनीतिक शक्ति हासिल करनेवाले महन्थ ठाकुर, राजेन्द्र महतो तथा उपेन्द्र यादव ही क्यों न हो, इनके प्रति आम जनता का विश्वास कमजोर हो चुका है । फिर भी राजनीतिक शक्ति केन्द्र में इन्हीं नेताओं का बोलवाला हैं । उल्लेखित सभी नेता ऐसे हैं, जो हरदम पार्टी प्रमुख होकर रहना चाहते हैं । जिसके चलते पार्टी विभाजन कर भी वे लोग अपनी चाहत पूरी करते रहते हैं ।

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कमल थापा ने भी यही किया है । उनकी नयी पार्टी तो पिछली घटना एवं उदाहरण है । इससे पहले नेकपा विभाजन होकर निर्मित प्रचण्ड नेतृत्व की माओवादी केन्द्र हो या माधव कुमार नेपाल नेतृत्व की नेकपा समाजवादी, उपेन्द्र नेतृत्व में रहे जनता समाजवादी हो या महन्थ ठाकुर नेतृत्व में रहे लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी, सभी पार्टियों की निर्माण के पीछे नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सत्ता–लालच ही प्रमुख कारण है । इन लोगों के लिए राजनीतिक नीति, दर्शन और मुद्दा तो सिर्फ दिखावे के लिए है । बार–बार पार्टी प्रमुख, प्रधानमन्त्री और मन्त्री होकर परीक्षण में आ चुके इन नेताओं में अब कोई भी आकर्षण नहीं है, फिर भी इन्ही नेताओं के हाथ में देश की राजनीतिक शक्ति है, जिसके चलते आज युवाओं में राजनीति के प्रति वितृष्णा बढ़ती जा रही है । क्या यह लोग सत्ता–भूख को त्याग कर एवं राजनीतिक जीवन से सन्यास लेकर युवाओं में राजनीति के प्रति आशा, विश्वास और भरोसा दिला नहीं सकते हैं ?

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