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नेपाल में गृहयुद्ध छेड़ने की चिनियाँ साजिश : ललित झा 

 

 

नेपाल के हिमाली क्षेत्र तथा एम सी सी परियोजना से जुड़े जिलों मे हिंसक खूनी खेल खेलकर इस परियोजना को निशाना बनाना है ताकि इसके क्रियांवयन को मुश्किल बना दिया जाय और अंततः यह परियोजना ठंढे वस्ते में डाल दिया जाय जैसा कि पूर्व में भी कई परियोजनाओं के साथ हुआ है।

ललित झा, १६ मार्च २०२२ | वैसे तो नेपाल की संसद द्वारा एम सी सी पास होने पर चीन की निराशा को समझा जा सकता है क्योंकि इसे रोकने के लिये चीन के राष्ट्रपति सी जिनपिंग से लेकर विदेश मंत्री वांग यी तथा चिनियाँ कम्युनिष्ट पार्टी के विदेश विभाग के प्रमुख तक, सभी ने क्या क्या जतन नही किया फिर भी वह इसे रोकने में कामयाब नहीं हो सके। चीन के लाख प्रयत्न के बाबजूद नेपाल की संसद से भारी राजनीतिक उथल पुथल बीच, एम सी सी का पास होना, चीन की एक बड़ी कूटनीतिक पराजय है जिसे चिनियाँ कम्यूनिष्ट पार्टी पचा नही पा रही है। उसका यह भ्रम लगभग टूट सा गया है कि बामपंथी पार्टियों के सहयोग के बदौलत नेपाल में वह राजनीतिक कूटनीतिक रूप से अपराजेय है |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हाल के कुछ ताजा राजनीतिक घटनाओ से बीजिंग का नेपाल की कम्यूनिष्ट पार्टी तथा इसके नेताओं से मोहभंग सा हो गया है, क्योंकि इन नेताओं ने सी जिनपिंग से लेकर बांग यी तक, सभी को यह भरोसा दिलाया था कि वह अमेरिकी परियोजना एम सी सी का रास्ता रोक देंगे लेकिन अंततः ये नेता ऐसा नहीं कर सके। जबकि चीन के तरफ से नेपाल के इन बामपंथी नेताओं तथा विरोध प्रदर्शन में शामिल विभिन्न संगठनो पर 200 करोड़ से अधिक राशी खर्च किया गया था। एम सी सी को लेकर अमेरिका के हाथों चीन को मिली कूटनीतिक राणनीतिक पराजय को वह पचा नही पा रहा है और अपने नेपाल नीति पर पुनर्विचार कर रहा है। क्योंकि बीजिंग मे इस बात पर गंभीर बहस हुयी है कि आखिर क्यों इतने अधिक आर्थिक निवेश तथा राजनीतिक कूटनीतिक प्रयास के बाबजूद चीन असफल रहा? बीजिंग से मिले संकेतों के अनुसार चीन अब नेपाल के इन बामपंथी नेताओं पर अपनी अत्यधिक निर्भरता कम करना चाहता है साथ ही बामपंथी नेताओं से इतर कुछ नये राजनीतिक साथी की तलाश मे है। क्योंकि बामपंथी पार्टियों पर इनकी निर्भरता विफल सावित हुयी है।

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एम सी सी प्रकरण से मिले सबक के आलोक में चीन अपनी नई नेपाल नीति पर अमल कर रहा है। इसके तहत वह अपने संपर्कों का विस्तार नेपाली कांग्रेस तथा मधेसी पार्टियों में करना आरंभ किया है। लेकिन चीन की इस नई नेपाल नीति में सबसे चौकाने वाली बात है “हिमाल सुरक्षा परिषद- नेपाल” का गठन। विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार हिमाल सुरक्षा परिषद का गठन बीजिंग के इशारे पर किया गया है और इसका प्रमुख उद्देश्य है एम सी सी के क्रियान्वयन को हर हाल में रोकना। नेपाल के सुरक्षाबलों से जुड़े सूत्रों के अनुसार हिमाल सुरक्षा परिषद का गठन और विस्तार नेपाल- तिब्बत सीमावर्ती जिला जिसे हिमाली जिला कहते हैं, में किया जा रहा है और यह संगठन सशत्र विद्रोह करने की बात कह रहा है। नेपाल के हिमाली जिले तथा एम सी सी परियोजना से जुड़े जिलों में हिंसक घटनाओ के माध्यम से नेपाल सरकार को धमकाने और रक्तपात मचाकर दवाब में लाने की तैयारी किया जा रहा है। इस हिमाली सुरक्षा परिषद का उद्देश्य नेपाल सरकार को दवाब में लाकर एम सी सी का क्रियान्वयन को रोकना है। इस आशय का संदेश इस संगठन ने अपना प्रेस बिज्ञप्ति जारी कर दे दिया है। उसका स्पष्ट धमकी है या तो नेपाल सरकार एम सी सी को रोके अन्यथा हम सशस्त्र विद्रोह करेंगे। विश्लेषकों के अनुसार इसका मतलब यह हुआ कि नेपाल पर एक नये गृहयुद्ध का खतरा मंडरा रहा है। नेपाल के हिमाली क्षेत्र तथा एम सी सी परियोजना से जुड़े जिलों मे हिंसक खूनी खेल खेलकर इस परियोजना को निशाना बनाना है ताकि इसके क्रियांवयन को मुश्किल बना दिया जाय और अंततः यह परियोजना ठंढे वस्ते में डाल दिया जाय जैसा कि पूर्व में भी कई परियोजनाओं के साथ हुआ है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नेपाल की धरती पर नेपाल के खिलाफ हो रहे इस षडयंत्र पर सुरक्षा एजेंसीओं को सतर्क हो जाना चाहिए। प्राप्त जानकारी के अनुसार नेपाल पुलिस द्वारा हिमाली सुरक्षा परिषद से जुड़े करीब एक दर्जन लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ किया जा रहा है। इस संगठन के साजिशों का जाल कितना गहरा और प्रभावशाली है, इसका पता तो अनुसंधान के बाद चलेगा मगर इसके द्वारा जारी प्रेस बिज्ञप्ति से इसके द्वारा रची जा रही गंभीर साजिशों का पता चलता है। क्योंकि जिस तरह से इसने अपने प्रेस बिज्ञप्ति में एम सी सी को रोकने की मांग किया है अन्यथा सशस्त्र विद्रोह की धमकी दिया है, उससे इसके पीछे बीजिंग का हाथ होने की प्रबल आशंका है क्योंकि चीन का एजेंडा भी यही है जो सर्वविदित है। कुछ ही दिनों पूर्व चीन के इशारे पर छः बामपंथी पार्टियों द्वारा नेपाल बंद का आयोजन किया गया था। कुछ चीन समर्थित बामपंथी पार्टियों तथा संगठनो द्वारा इसको राष्ट्रघाती समझौता बताकर इसका तीब्र विरोध किया जा रहा है ऐसे में हिमाली सुरक्षा परिषद के गठन के पीछे भी चीन का हाथ होने से इंकार नही किया जा सकता। सुरक्षा मामलों के जानकारों के अनुसार चीन पूर्व में भी ऐसा करता रहा है और अब एम सी सी परियोजना का विरोध के क्रम में नेपाल को गृहयुद्ध मे झोंकने की साजिश कर रहा है। विश्लेषकों के अनुसार इसके पीछे चीन का अपना रणनीतिक स्वार्थ है। पूर्व का इतिहास गवाह है चीन इस तरह का षड्यंत्र करने में माहिर है। कुछ वर्षों पूर्व ही चीन मालदीव में ऐसा कर चुका है। दरअसल चीन के समर्थन से मालदीव में “इंडिया आउट ” नामक अभियान का संचालन किया गया था जिसका मकसद था भारत के प्रति मैत्रीपूर्ण भाव रखने वाली सरकार को अपदस्थ करना और इस इंडिया आउट अभियान में चीन सफल भी हुआ था। नेपाल में घटित हो रहे ताजा घटनाक्रमों से यह लगता है कि चीन नेपाल में भी इसी तरह का राजनीतिक प्रयोग करने पर गंभीरता से लगी हुयी है। विशेषज्ञों के अनुसार चीन अपने राजनीतिक प्रयोग को साकार करने हेतु अपने राजनीतिक मोहरों को नेपाल के सभी मोर्चों पर तैनात कर रहा है जिसमे सबकी अलग अलग भूमिका है। प्राप्त जानकारी के अनुसार कोई मोहरा राजनीतिक खेल शुरू करेगा तो कोई बंद हड़ताल कर अपने प्रभाव का प्रदर्शन करेगा तथा समय समय पर हिमाल सुरक्षा परिषद जैसा संगठन हिंसा और बम बिस्फोट कर दहशत उत्पन्न करने की घटना को अंजाम दे सकता है। हाल के राजनीतिक घटना क्रमों से स्पष्ट है नेपाल में चीन इस राजनीतिक प्रयोग को आरम्भ कर चुका है। ऐसा भी संभव है कि हिमाली सुरक्षा परिषद जैसे संगठन तथा बिप्लव के नेतृत्ववाले अतिवादी गठबंधनों के जरिये नेपाली कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के समक्ष अस्थिरता और कठिन हालात उत्पन्न कर इस सरकार को बदनाम और अक्षम सावित करने का प्रयास हो। मीडिया में भारत विरोधी नेपाली राष्ट्रवाद का फिर उभार दिख सकता है, नेपाल के आंतरिक मामलों में भारतीय हस्तक्षेप संबंधी खबरें फिर से प्रमुखता पा सकती है। भारत नेपाल सीमा संबंधी विवाद को पुनः पुनर्जीवित किया जा सकता है क्योंकि आगे चुनाव है और चीन के सभी मोहरे अपने मोर्चे पर तैनात हो अपनी भूमिका को अंजाम देंगे। अतः नेपाल को चीन प्रायोजित इस राजनीतिक षड्यंत्र से सावधान रहना चाहिए अन्यथा नेपाल गृहयुद्ध के चपेट में फंस सकता है जो नेपाल के राजनीतिक भविष्य के घातक हो सकता है। पूर्व के माओबाद जनित गृहयुद्ध में भारी हिंसा और रक्तपात हुआ था।पंद्रह हजार से अधिक बहुमुल्य जिन्दगीयों को खोने तथा अथक राजनीतिक परिश्रम के बाद काठमांडू की सुन्दर वादियों में शांति लौटी है, लोकतंत्र का आविर्भाव हुआ है ऐसे में एक और गृहयुद्ध अथवा राजनीतिक अस्थिरता को नेपाल नही झेल सकता। अभी नेपाल की राजनीतिक सामाजिक अवस्था अत्यंत संवेदनशील और तरल है। राजनीतिक पार्टीयाँ बिखर रही है, नई राजनीतिक दलों का जन्म हो रहा है। कई राजनीतिक समीकरण ध्वस्त हो रहे हैं और नये राजनीतिक गठबंधन आकर ले रहा है। ऐसे संवेदनशील और तरल समय में जहाँ एक तरफ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है वहीं एक दूसरे के प्रति आपसी विश्वास और सद्भाव की कमी हो रही है ऐसे में भगवान बुद्ध के देश में शांति के खिलाफ किसी साजिश को बर्दास्त नही किया जा सकता। नेपाल सरकार, सभी राजनीतिक दलों तथा आम लोगों को एकजुट होकर ऐसी घृणित साजिशों के खिलाफ मिलकर मजबूती से खड़ा होना चाहिए अन्यथा देश एक और राजनीतिक गृहयुद्ध का शिकार हो सकता है।

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