वरना तो चाहते वो भी होंगे : इन्दु तोदी
” ” वरना तो चाहते वो भी होंगे ” “
होते हैं बनाने को वो मजबुर
बचपन में औलाद को मज़दूर
वरना तो चाहते वो भी होंगे
बनाना उन्हे बड़ा मशहूर ।
हो जाया करतें है खुश
खाकर बासी भात
वरना तो चाहते वो भी होंगे
उड़ाना नित नई दावत ।
सो जाते हैं टूटे झोपड़ों में
थक हार कर चैन की निंद
वरना तो चाहते वो भी होंगे
बिश्राम,वातानुकूलित बंगलों में ।
पड़ता है हर रोज नंगे पाँव
पथरिली राह पर चलना
वरना तो चाहते वो भी होंगे
मखमली कालीन पर टहलना ।
चमकाना पड़ता है कोमल
हाथों शीशे रईसों की कारों के
वरना तो चाहते वो भी होंगे
बैठना विदेशी गाड़ियों में !
छोटे हाथों से बड़े बड़े पतीले
है रगड़ना पड़ता ,
वरना तो चाहते वो भी होंगे
चार अक्षर ज्ञान के पढना !



