स्थानीय चुनाव और गरीब जनता: अंशुकुमारी झा

अंशुकुमारी झा, (हिमालिनी मासिक, अप्रिल २०२२ अंक से)
चुनाव और नेता शब्द परापूर्व काल से ही सम्बन्धित है । जब हमारे पूर्वज जंगली जीवन जी रहे थे तब भी उस समुदाय की जनता एक व्यक्ति को नेता चुनकर उसे अपने हक हित के लिए प्रमुख के रूप में नियुक्त करती थी जो उस कबीले का सरदार कहलाता था । सरदार को अपने समुदाय की बड़ी चिन्ता होती थी । वह हर प्रकार की समस्या से अपनी जनता को सुरक्षित रखने के लिए हमेशा तत्पर रहता था । जनता के लिए अपना तन–मन और समय पड़ने पर धन भी खर्च करने वाले नेता होते हैं परन्तु यहां तो नेता बनने का मतलब है किसी भी प्रकार से धन बटोरना ।
स्थानीय तह के दूसरे कार्यकाल के लिए विक्रम संवत २०७९ वैशाख ३० गते को नेपाल सरकार ने निर्वाचन की घोषणा की है । उक्त चुनावी अभियान में एक सौ से अधिक राजनीतिक दल हिस्सा ले रहे हैं । हमारे देश में गणतन्त्र के बाद राष्ट्र को स्पष्ट, सहज और सरल ढंग से चलाने के लिए तीन स्तर में बांटा गया संघ, प्रदेश और स्थानीय निकाय । स्थानीय सरकार जनता के साथ अत्यधिक समीप होने के कारण जनता उससे बहुत आशा रखती है ।
स्थानीय तह में इससे पहले जो चुनाव हुआ था उसमें उम्मीदवारी देने वाले हर उम्मीदवार गरीब जनता की गरीबी दूर करने के लिए प्रतिबद्ध हुए थे । जनता को ठगकर जनप्रतिनिधि बनें । भोलीभाली जनता को विभिन्न प्रलोभन देकर, गरीबी मुक्त क्षेत्र बनाने की बात की, भूमिहीन को भूमि, निर्वस्त्र को वस्त्र, अनपढ़ को शिक्षा, बेरोजगार को रोजगारी इत्यादि बड़े–बड़े वादे कर गरीब जनता को आश्वासन दिया था, परन्तु वो सारी बातें प्रतिबद्धता में ही सीमित रहीं । जनप्रतिनिधियों ने जैसा कहा वैसा कुछ किया नहीं । वो अपने ही ऐशो आराम में लगे रहे । जब भी चुनाव का समय आता तब–तब गरीबी निवारण की बातें बहुत उठती है परन्तु कार्यान्वयन के समय खुद की थैली भरने में मशगूल हो जाते हैं ।
हमारे यहां लगभग २५ लाख से भी अधिक घर परिवार गरीबी रेखा के नीचे है । गरीबी दर का क्रम बढ़ता ही जा रहा है । जीवनयापन कठिन हो रहा है । युवा वर्ग परिवार से गरीबी हटाने के लिए विदेश जाने के लिए मजबूर हैं । युवाओं का खाड़ी देश जाने का क्रम बढ़ता ही जा रहा है । गरीब परिवार कठिन श्रम और दिहारी मजदूरी करने के लिए बाध्य हैं । १५ लाख से अधिक घर परिवार भूमिहीन अर्थात् सुकुमबासी हैं । वे लोग अव्यवस्थित रूप में कहीं नदी के किनार में तो कहीं जंगल झाड़ी में रह रहे हैं । गरीब जनता गरीब ही है और नेता लोग उसी गरीब के वोट से जनप्रतिनिधि बनकर अमीर बन गए हैं ।
हमारे समाज में, जनता में भी चेतना की कमी है । उन्हें यह ज्ञात ही नहीं होता की हम अपना नेतृत्व किस प्रकार के व्यक्ति को दें । कुछ जो खुद को बुद्धिजीवी कहते हैं, अपनी प्रतिष्ठा का खयाल रखने में ही लगे रहते हैं और अधिकांश गरीब व विपन्न जनता लोभ में आकर अपना वोट बेच देती हैं । परिणामस्वरूप वो ठगे जाते हैं । गरीब जनता करे भी तो क्या करे ? उन्हें एक दिन भी पेटभर खाना मिल जाय और हाथ में हजार रुपैया आ जाय उसी में मगन हो जाते हैं । सच में गरीबी तो अभिशाप ही है न । ताज्जुब तो तब होता है जब जनप्रतिनिधि गण गरीब जनता का शोषण करते हैं । आवाज विहीन का और गला दबाता है । विकास के नाम पर बजट लाता है और अपने नातेदार में सीमित रखता है । जिससे गरीब जीविकोपार्जन के लिए मजदूर बनने के लिए विवश हैं । इसका प्रत्यक्ष कारण गरीब समुदाय में शिक्षा की कमी दिख रही है ।
नेपाल के संविधान–२०७२ भाग ३ के मौलिक हक के धारा ३७ में आवास का हक उल्लेख है जिसमें लिखा है कि देश के प्रत्येक नागरिक को आवास का हक है । परन्तु हमारे देश में बहुत लोगों के पास घर नहीं है । घर बनाने के लिए खुद की जमीन नहीं है । राज्य के निकाय में जिसकी पहुंच नहीं है वह भूमिहीन में ही सीमित हैं । जिसके पास सम्पति है उसे राज्यशक्ति में सहज ही स्थान मिल जाता है । आज जो भी राज्यशक्ति में है अधिकांशतः पुँजीपति वर्ग के ही प्रतिनिधित्व करते हैं । बड़े व्यापारी, बड़े राजनीतिज्ञ, बड़े–बड़े शासक–प्रशासक सब पुंजीपति होने के कारण ही वहां तक पहुंच पाए हंै । जिसके पास पैसा है वह बड़े विद्यालय में पढ़कर सरकारी नौकरी पाते है । सांसद और मन्त्री बनते हैं । गरीब तो दूर–दूर तक कहीं है ही नहीं । न उसके लिए कोई आवाज उठाने वाला है ।
समग्र में स्थानीय तह का निर्वाचन नजदीक आ गया है । पाँच वर्ष के लिए फिर से जनप्रतिनिधि चुने जायेंगे । वो जनप्रतिनिधि हमारे लिए कितना विकास करेंगे यह निर्णय करना हम जनता का दायित्व है । स्थानीय स्तर पर पार्टी से भी महत्वपूर्ण व्यक्ति होता है । अगर हम भले आदमी का चयन कर स्थानीय सरकार में भेजेंगे तो वह हमारे लिए अवश्य अच्छा करेगा । क्योंकि स्थानीय स्तर पर जनता और सरकार बीच सामीप्य कराने का दायित्व जनप्रतिनिधि का ही होता है । भ्रष्ट और लोभी जनप्रतिनिधि कभी गरीबी दूर नहीं कर सकता है । यह गरीबी सिर्फ कमजोर वर्ग का ही सवाल नहीं है अपितु यह समस्या सभी समुदाय, पालिका और समग्र देश का है । इसका निदान जड़ से ही करना अनिवार्य है । अब फिर से नेता लोग घर–घर मत मांगने पहुंचेंगे उस समय हमें सतर्कता अपनानी होगी । हमें अपनी समस्या उसके समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक है । उसके लोभ में हमें नहीं फंसना चाहिए । बुद्धि और विवेक से असल जनप्रतिनिधि को चुनना चाहिए । तो ही हमें गरीबी से कमोवेश छुटकारा मिल सकती है । (हिमालिनी मासिक, अप्रिल २०२२ अंक से)

