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जनकपुरधाम, 4 अगस्त।आज अगस्त 3 – 2022 को नेपाल हिन्दी प्रतिष्ठान के अध्यक्ष श्री राजेश्वर नेपाली जी के अध्यक्षता में तुलसी जयन्ती मनाया गया। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार श्री महेश्वर राय जी, श्री चंद्रशेखर राय चमन जी, श्री राम स्वार्थ ठाकुर, ( कलियुग के तुलसी दास) गांधी जी, वरिष्ठ अधिवक्ता तथा साहित्यकार श्री युगल किशोर लाल कर्ण जी, डा. आशा सिन्हा जी, कवि श्री मनोज प्रेमेश जी, अजय कुमार झा जी, युनुस हैदर जी जैसे महारथी लोग सक्रिय भूमिका निर्वाह किए। तुलसी दास जी के योगदान अर्थात रचनाओं पर गहन चिंतन और विश्लेषण किया गया। जिसमें श्री महेश्वर राय जी, श्री युगलाकिशोर लालकर्ण जी, डा आशा सिन्हा और रामस्वार्थ ठाकुर जी के बीच सघन एवम् ज्ञान वर्धक सुक्ष्म विश्लेषण से उपस्थित महानुभावों को लाभान्वित होने का मौका मिला। आनेवाले समय में दो ग्रंथ ही मूल प्रामाणिक माने जाएंगे, ” पहला विश्व जगत के लिए गीता और दूसरा विद्वान तथा आम नागरिकों के लिए रामचरित्र मानस” इन दोनो में मानस का दायरा ही बड़ा दिखाई देता है।मानस घर घर का आदर्श ग्रंथ बन गया है। नैतिकता, राजनीति, शिक्षा, संस्कार, धर्म, अध्यात्म, साधना, विज्ञान और मानव समाज के लिए आधार ग्रंथ के रूप में प्रमाणित होता जा रहा है। दिव्यताओं से भरी हुई यह ग्रंथ और दिव्य पुरुष तुलसी दास की जितनी प्रशंसा की जाए वह कम होगा। आवश्यकता है इस में बताए गए भौतिक अभौतिक सुक्ष्म ज्ञान को जीवन में उतारने का। फिर से सामाज के लिए अभिन्न अंग बनाने का। ढहते सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहरों को पुनः संरक्षित और संवर्धित करने का। पुनः अपनी मूल से जुड़ने का।
इस कार्यक्रम में मेरे द्वारा प्रस्तुत कविता:
मानस के तुलसी
मानस के तुलसी जो ज्ञान के भण्डार भयो,
वेद औं पुराण के है भेद वो बतवितो।
खोजी खोजी तत्व ज्ञान भागवत औं पुराण,
व्राह्मण उपनिषदो के सार वो समझब तो।।   1
हुलसी के गोद आजू धन्य राजापुर भयो,
आत्माराम आजू नाची नाची के है गावतो।
रामानन्द कुलभूषण नरहरि शिरोमणि,
गुरु ज्ञान पाई चित्रकूट है सजाबतो।।       2
संवत पंद्रह सय चौवन श्रावण शुक्ला सप्तमी के,
नन्दघर आनंद अम्बर कुशुम बरसावतो।
बतीसी देखाई शिशु रामराम बोलन लाग्यो,
माता हुलसी के हिय चिंता है जगावतो।।  3
अशुभ अमंगल हेतु पुत्र मोह त्रास परी.
चुनियाँ के गोद हुलसी प्राण है लुटाबतो।
बिना ही सिखाए गायत्री मन्त्र वो जपन लागे,
नरहरि देखि देखि प्रेम है लुटाबतो।।    4
राम से लगन एसो लाग्यो रामबोला जू को,
जित देखू तीत प्रिय रामहि दिखावतो।
शुन्य में भी राम नाम अलख दिखाई दियो,
निराकार राम भी साकार रूप धारतो।।     5
कामिनी के मोह परी काम में जो रत भए,
रत्नावली बिना फटकार कौन  लगाबतो।
हाड मॉस देह के यी प्रवल जे मोह पास,
गुरु बिना कौन माया जाल से बचाबतो।। ।    6
जय हो प्रिय रत्नावली धन्य हो तोहार वचन,
बिना वाग्देवी कौन बचन बोलाबतो।
धन्य आजू रामबोला तुलसी जीवन भयो,
बिनु ललकार कौन राम गुण गवतो।। ।      7
बिनाही संन्यास कैसे राम से लगन होई,
काक भुशुण्डि जी से मिलन न होइतो।
हनुमान जे न सुगा बनिके चेतबितो त,
कौन राम लक्ष्मण को चन्दन लगवितो।।       8
तुलसी बाबा मान सरोवर न पुगितो त, काकभुसुण्डि संग संवाद कोन

करबितो।
शेषसनातन जइसन गुरु नाही पवितो त,
वेद वेदाङ्ग को आध्यापन को करबितो।।  9
मुगल को त्रास औ संत्रास देखि क्षुब्ध भई,
कहु कौन मुरलीधर सॉं धनुष उठबितो।
सत्य,अहिंसा,प्रेम,भक्ति,आनद संग,
धर्म रक्षा हेतु कौन विगुल बजबितो।।  10
रूप के विसारि जे अरूप में हेरायल प्राणी,
कौन हमें सगुण राम तत्व को बतबितो।
जहा देखू उंहें राम राममय हरेक ठाम,
सियाराममय जग जानी कौन कहितो।।  11
सज्जन के वंदना वृहद् कैली तुलसी बाबा,
खलनायको के से हो प्रार्थना सिखबली।
सनातन संस्कार सातो खण्ड में पुगाय देली,
हमरो हिया में सियाराम के बसव्ली।।  12
योग,ध्यान,सिद्ध से भूखण्ड जे वीरान भेल,
प्रेम रसधार नवधा भगति सिखवली।
सुनसान नीरस हतास जे जीवन रहे,
सुधा सन राम रसायन पियबली।। 13
दुनु कर जोरी करी बिनती तोहार हम,
तुलसी बाबा फेनु फेनु धरती पे अवहो।
कलि के कराल रूप मानस अचेत देखि,
अनहद नाद से सचेत तू करावहो।।   14
नरहिरि नरशिंह के कृपा न होइतो त,
हुलसी के लाल कैसे रामायण गावितो।
रामचरित्र मानस जे न तुलसी रचितो त,
कहु आजू कौन तुलसी जयंती मनबितो।।      15

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