Wed. Jun 24th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

महंगाई और मंदी की चपेट में दुनियाँ : प्रेमचंद्र सिंह

 

प्रेम चन्द्र सिंह, लखनऊ ६ अगस्त ०२२ | अमेरिका में महंगाई दर 8.5 फीसदी से ऊपर और ब्रिटेन में महंगाई दर 11 फीसदी से ऊपर पहुंच गई है,जो पिछले 41 सालों का उच्‍च स्‍तर है। जर्मनी में महंगाई दर 8 फीसदी से अधिक और फ्रांस में 7 फीसदी के आसपास है। भारत में भी महंगाई दर 7 प्रतिशत के आसपास ही है। वैश्विक महंगाई दरों की बढ़ती रफ्तार को रोकने के लिए दुनियां की करीब-करीब सभी देशों की केंद्रीय बैंकें वैश्विक बाजार में धन की आमद और मौद्रिक परिसंचरण से मुद्राओं को कम करने की भरसक प्रयास कर रहे हैं, ताकि महंगाई को नियंत्रण में रखा जा सके। कमोवेश इसी आर्थिक पेशोपेश से पूरी दुनियां गुजर रही है। ऐसी मंदी और महंगाई की विचित्र गठजोड़ सरकारों तथा बैंकों को भी किंकर्तव्य विमुढ की स्थिति में ला खड़ा कर दिया है। वर्णित स्थिति में वैश्विक महंगाई पर काबू पाने के लिए दुनियां के करीब-करीब हर देश की केंद्रीय बैंक व्याज दर (रेपो रेट) बढ़ा रही है, चाहे बात अमेरिका की हो, यूरोप की हो, भारत, चीन, जापान या ऑस्ट्रेलिया की हो। व्याज दरें बढ़ने से मांग गिरती हैं और मांग के गिरने पर अर्थव्यवस्थायें मंदी की चपेट में आ जाती हैं। आमतौर पर बैंकैं मंदी से अर्थव्यवस्थाओं को बचाने के लिए व्याज दरों को गिराती है ताकि मांग बढ़े और आर्थिक लेनदेन की रफ्तार में इजाफा हो। अभी पूरी दुनियां के समक्ष आर्थिक मंदी और महंगाई सरीखे परस्पर विरोधी आर्थिक स्थितियाँ एक साथ खड़ी हो गई हैं जिनमे एक को नियंत्रित करने का प्रयास दूसरे को अनियंत्रित कर देती हैं। इन आर्थिक पहेलियों और मौद्रिक उलझनों से निकलने की छटपटाहट दुनियाँ भर में आर्थिक प्रबंधकों के बीच देखी जा रही है। जाहिर है वैश्विक समुदाय को पहले कोरोना, फिर महंगाई और अब आर्थिक मंदी की दस्तक की मार को एक के बाद एक  झेलना पड़ रहा है। इस दौर में अधिकांश देशों ने अपने लोगों की आर्थिक परेशानियों को कम करने की जद्दोजहद में राजस्व प्रोत्साहन (फिस्कल स्टीमुलस) देने के तहत बड़ी-बड़ी धनराशियां मौद्रिक परिसंचरण (मनी सर्कुलेशन) में लाने का जोखिम उठाया, जिससे मुद्रास्फृति की खतरा के साथ ही अनेकों देशों की आर्थिक व्यवस्थाओं में कर्ज का भार भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है।

दुनियां भर की सार्वजनिक और व्यक्तिगत कर्ज की सम्मिलित आंकड़ों के हिसाब से पूरी दुनियां की अर्थव्यवस्था पर समेकित कर्ज उसकी कुल जीडीपी का 225% से बढ़कर अब 350% तक पहुंच गया है अर्थात पूरी दुनियां आकंठ कर्ज में डूब चुकी है। विश्व की विकसित देश अमेरिका और ब्रिटेन की सरकारों के ऊपर उसके कुल जीडीपी का करीब 125% कर्ज है, यूरोप के कई देशों में सरकारों के ऊपर कर्ज का स्तर उन देशों की जीडीपी का 150% तक पहुंच गया है और जापान की सरकार पर उस देश की जीडीपी का 225% कर्ज हो गया है। लेकिन इस वैश्विक हालात के बाबजूद भारत में जीडीपी-कर्ज का अनुपात वर्ष 2019-20 में 65% था जो बढ़कर अब 87% के आसपास है, इस लिहाज से भारत की स्थिति विकसित देशों से काफी बेहतर है। अमेरिका में इस वर्ष की पिछले दो तिमाही में लगातार विकास दर में गिरावट रहा है, जनवरी से मार्च की तिमाही में विकास दर 1.6% गिरा है तथा अप्रैल से जून तक की तिमाही में अनुमानित विकास दर 0.9% तक गिरने की संभावना है। आर्थिक सूचकांक के आधार पर अगर अर्थव्यवस्था में विकास दर लगातार दो तिमाही में निगेटिव होता है, तो यह मंदी का सूचक है। परिभाषिक रूप से अमेरिका आर्थिक मंदी की चपेट में आ चुका है, लेकिन अमेरिका के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जबतक अमेरिकी नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च (एनबीइआर) द्वारा मंदी की औपचारिक घोषणा नही होती है तबतक अमेरिका में मंदी नही है। सवाल केवल यह है कि अमेरिकी मंदी की दुनियां पर असर कैसा होगा? पिछले अनुभवों को मानें तो अमेरिकी आर्थिक गिरावट का दुष्प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और इसकी चपेट में कमोवेश सभी देशों में आर्थिक परेशानियां बढ़ने लगती है।

यह भी पढें   जयप्रकाश आनन्द द्वारा नेपाल की राजनीति और न्याय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न

ऊपर से कोरोना की महामारी, चीन में लंबा लॉकडाउन और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पिछले करीब दो वर्षों से अधिक समय से दुनियां की आपूर्ति व्यवस्था (सप्लाई चेन) छिन्न-भिन्न हो चुकी है। फलस्वरूप पूरी दुनियां खासकर पूरे यूरोप में ईंधन और खाद्य संकट गहराता जा रहा है। भारत के पड़ोस में श्रीलंका, पाकिस्तान, बंगलादेश आदि देशों की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है। यह सब आर्थिक दुर्दशा वैश्विक महंगाई और आर्थिक मंदी के कारण ही है, जिसके दुष्प्रभाव में कोई अधिक तो कोई कम हर देश है। इस बार की वैश्विक आर्थिक मंदी केवल मांग कम होने के कारण ही नहीं होने बाली है बल्कि इसके उलट अपेक्षित स्तर से बहुत कम ईंधन और खाद्य पदार्थों सहित अन्य आवश्यक कच्चा माल एवं तैयार माल की आपूर्ति होने के कारण हो रही है। पिछले दो-तीन वर्षों में वैश्विक आपूर्ति प्रणालियों (सप्लाई चेन) को तरह-तरह की मार झेलनी पड़ी है। आर्थिक परेशानियों की जड़ में ईंधन की बहुत बड़ी भूमिका है, चाहे वो क्रूड ऑयल के रूप में हो या गैस (एलएनजी और पीएनजी) हो। केवल क्रूड ऑयल की ही आपूर्ति- विघटन को देखा जाए, तो वैश्विक बाजार में एक समय क्रूड ऑयल की मांग इतनी गिर गई कि वर्ष-2019 में क्रूड ऑयल की कीमत थी 68 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल, वर्ष-2020 में कोरोना महामारी के दौरान प्रति बैरल क्रूड ऑयल की कीमत गिरकर आ गई सिर्फ 14 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तथा उसी साल के बाद के महीनों में प्रति बैरल क्रूड ऑयल की कीमत गिरकर माइनस 37अमेरिकी डॉलर (-37डॉलर) पहुंच गई। इसका मतलब यह हुआ कि उत्पादक देशों के बंदरगाहों पर जहाजों में भरा क्रूड ऑयल को खरीदने वाला कोई नहीं था जिसे मजबूरी में निकालने के लिए उत्पादक देशों ने क्रेता देशों की ऑयल कंपनियों को कहा कि तेल से भरा जहाज मुफ्त में ले जाओ और इंश्योरेंस का खर्च तथा तेल की ढुलाई आदि का खर्च भी उत्पादक देशों ने ही दिया। कारण कि इतनी जल्दी उत्पादन क्षमता को कम कर पाना उत्पादक कंपनियों के लिए मुश्किल था। इसलिए उत्पादक देशों ने घाटा सहकर भी अपना स्टॉक खाली किया, वरना निर्यातक देशों द्वारा तेल के स्टॉक का रखरखाव भी मुश्किल हो जाता। अभी कुछ हफ्ते पहले क्रूड ऑयल की कीमत उछलकर चली गई थी 135 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल। इसी तर्ज पर विश्व के सामने बदतर स्थिति प्राकृतिक गैस के उत्पादन और आपूर्ति की भी है। प्राकृतिक गैस की कमी से जूझते यूरोप के देशों की बदहाली बयां करना बहुत ही दुखद  है, भारत में ही पिछले वर्षों में करीब 18% की बढ़ोत्तरी प्राकृतिक गैस की रिटेल कीमतों में हुई है। दो साल के अन्दर क्रूड ऑयल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में अप्रत्याशित उठापटक के मद्देनजर दुनियां की कोई भी अर्थव्यवस्था या किसी भी देश की सरकार के लिए ऐसी अनिश्चितता के माहौल से निकलने के लिए कोई भी प्रभावी योजना तैयार करना संभव नहीं है।

यह भी पढें   जनकपुरधाम में वना भव्य सूर्य मंदिर,आज शाम होगा उद्घाटन

अमरीकी संसद की प्रतिनिधि सभा की अध्यक्षा नैंसी पेलोसी की हालिया ताइवान यात्रा के बाद चीन-ताइवान के बीच बढ़ते संघर्ष वैश्विक आर्थिक दुश्वारियों को और अधिक बढ़ाने बाला है। चीन और ताइवान सेमीकंडक्टर चिप्स का सबसे बड़ा उत्पादक तथा निर्यातक देश हैं, जिसका बड़े पैमाने पर उपयोग मोबाइल उद्योग, ऑटो उद्योग सहित अनेक इलेक्ट्रॉनिक उद्पादों में किया जाता है। इनके बीच संघर्ष के बढ़ते तापमान व्यापार युद्ध को बढ़ावा देने जा रहा है जिसकी शुरुआत चीन ने ताइवान को चीन से जाने वाली बालू की निर्यात और ताइवान से चीन को आने बाली खाद्य-पदार्थों के आयात को रोककर प्रारंभ कर दिया है। व्यापार-युद्ध के मामलों में चीन की ख्याति सर्वविदित है, चाहे चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध की बात हो, चीन-ऑस्ट्रेलिया व्यापार युद्ध की समस्या हो या फिर चीन-जापान व्यापार संघर्ष हो। साउथ चाइना समुद्र और पश्चिम प्रशांत महासागर में किसी तरह की सामरिक किलाबंदी उस क्षेत्र के देशों के व्यापार पर विपरीत असर डालेगा, हालांकि इस दुष्प्रभाव से चीन का व्यापार भी अछूता नहीं रहेगा। उम्मीद है कि चीन इतना बड़ा व्यापारिक जोखिम लेने की हिम्मत नही जुटा पाएगा।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक मंदी के आने पर क्रूड ऑयल की मांग गिरेगी और मांग गिरेगी तो निश्चय ही क्रूड ऑयल की कीमतें गिरेंगी। पिछले मंदी वर्ष-2008 में आई थी और उस समय भी क्रूड ऑयल की कीमत में काफी गिरावट देखने को मिला था। अगर ऐसा होता है कि आने वाले दिनों में क्रूड ऑयल की वैश्विक कीमतों में गिरावट आती है, चाहे गिरावट ब्रेंट क्रूड ऑयल की हो, डब्लूटीआई क्रूड आयल की हो या नाइन एक्स क्रूड ऑयल की हो, इसका गुणन प्रभाव (मल्टीप्लाइंग इफेक्ट) महंगाई को कम करने पर दिखना शुरू हो जाएगा। महंगाई को कम करने के लिए वित्तीय जमा और उधारी के लेनदेन में व्याज दरों को बढ़ाना, लुभावने दरों पर वित्तीय बाजारों में बॉन्ड को बेचना तथा टैक्स की दरों को बढ़ाना आदि सरीखे वित्तीय उपायों का प्रयोग वैश्विक स्तर पर आर्थिक प्रबंधन की अबतक सामान्य प्रक्रिया रही है, लेकिन इन सब उपायों का गुणन दुष्प्रभावो से आमलोगों का दो चार होना भी उतना ही असाधारण और असह्य परिस्थितियां पैदा करती हैं।

Recession ahead – road sign warning concept

भारत की कर्ज-जीडीपी अनुपात विकसित देशों से काफी कम है, लेकिन भारत के लोगों की टैक्स अदा करने की क्षमता भी विश्व की विकसित अर्थव्यवस्थाओं में रहने वाले लोगों से बहुत कम है। मिशाल के तौर पर टैक्स-जीडीपी अनुपात को देखा जाए तो अभी अमेरिका में जीडीपी का 40% टैक्स अमेरिकी लोगों को देना होता है, यूरोप में यह अनुपात 45 से  50 प्रतिशत है और भारत में यह अनुपात अभी केवल 17% के आसपास ही है। किसी अर्थव्यवस्था या देश में टैक्स- जीडीपी अनुपात कम होने का सीधा मतलब है उस देश का राजकोषीय घाटा (फिसकल डेफिसिट) हर हालत में बढ़ेगा। राजकोषीय घाटा के बढ़े रहने पर अगर कर्ज बढ़ता है तो स्थिति की बदतर होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। विश्वबैंक के ग्लोबल इकोनॉमिक प्रॉस्पेक्ट, जून,2022 के अनुसार वर्ष-2022 में अमेरिका की विकास दर 2.5%, यूरोप की 2.5%, जापान की 1.7% और भारत की 7.4% होगी। अन्य देशों के सापेक्ष भारत में बढ़ते हुए विकास दर भारत की सरकार और यहां के लोगों को अपेक्षाकृत अधिक वित्तीय मजबूती की गुंजाइश देता है।

यह भी पढें   आज का पंचांग: आज दिनांक 20 जुन 2026 शनिवार शुभसंवत् 2083

विकास दर को बढ़ाने के लिए पूंजी और तकनीक की सबसे अधिक अवयश्यकता किसी भी देश को होती है। फिलहाल पूंजी और तकनीक विकसित देशों के पास में ही है। अमेरिका में अभी महंगाई दर 8.5% और ब्रिटेन में 11% है। इस बढ़ते महंगाई को रोकने के लिए अमेरिका का फेडरल रिजर्व व्याज दर को बढ़ाकर 3.5% तक ले जाने वाला है, इसका मतलब है कि अमेरिकी बैंकें जमा धनराशि पर 3.5% व्याज देगी और बांड पर करीब 5% व्याज देने वाली है। ऐसे में दुनियां भर के देशों से पूंजी का प्रवाह अमेरिका की ओर ही होगा। बताते चले कि आर्थिक क्षेत्र में तकनीकी के हस्तक्षेप से किफायती उत्पाद के निर्माण, उसके घरेलू विपणन तथा निर्यात की स्पर्धा में  बढ़त तो अवश्य मिलती है, लेकिन तकनीकी हस्तक्षेप से पूरी दुनियां में बेरोजगारी की दर भी बढ़ रही है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश तथा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की प्रवृति हमेशा अधिक मुनाफा अर्जित करने की वैश्विक स्पर्धा पर निर्भर रहती है, इसलिए भारत सरीखे उभरती अर्थव्यवस्थाओं को सार्वजनिक घरेलू पूंजी निवेश तथा घरेलू निजी बचत के निवेश को बढ़ावा देने की संभावनाओं पर विचार करना होगा। साथ ही इन देशों की बढ़ते व्यापार-घाटा के कारण अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मुद्रा अवमूल्यन की स्थिति बनती जा रही है, यह स्थिति निर्यात को बढ़ाने के लिए उपयोगी होता है। लेकिन मंदी की दस्तक से गिरती वैश्विक मांग और चरमराती वैश्विक आपूर्ति तंत्र के कारण निर्यात को बढ़ाना टेढ़ी खीर लगने लगी है। मुद्रा अवमूल्यन के फायदे के तौर पर इस विकट महंगाई और मंदी के वैश्विक माहौल में भारत से खाद्य सामग्रियों, सामरिक आयुधों और दवाओं सरीखे अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्यात की बढ़ती संभावनाओं से भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलेगा।
“महंगाई के राग से, बिगड़ गए सुरताल,
सिर पर चढ़कर नाचती, झड़ते जायें बाल;
महंगाई के दौर में, कटुता का अहसास,
बदल दिया है दौलत ने, वर्तमान इतिहास।”

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *