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आज चौरचन और तीज एक ही दिन मनाया जा रहा है

 


काठमांडू, ३० अगस्त । एक ओर चारों तरफ तीज की हरियाली लाल लाल साड़ी कपड़ों में सजी हमारी सखियां सहेली भगवान शंकर और पार्वति की पूजा अराधना कर रही हैं वहीं काठमांडू के बहुत से घरों में और पूरे मिथिलांचल में तैयारी हो रही है चौठचन्द्र की । चौठचन्द्र को मैथिली में चौरचन भी कहते है । इसमें चन्द्रमा के साथ साथ भगवान गणेश की पूजा अर्चना की जाती हैं । एक तरफ शीव पार्वति की आराधना और दूसरी ओर भगवान गणेश की पूजा अर्चना ।
शास्त्र,साहित्य और विज्ञान इन सभी दृष्टिकोण से हम सभी जुड़े हैं चन्द्रमा से । हम बात करें चन्द्रमा की तो हमारे शास्त्र में चन्द्रमा के ईश्वरीय रुप,और साहित्य में सौंदर्य या शीतलता का रुप या बात करें विज्ञान की तो पृथ्वी का एक उपग्रह है चन्द्रमा । उपमाएं कितना भी दें सच्चाई यही है कि हम और आप जुड़े हैं चन्द्रमा से । हिन्दू धर्म शास्त्र में जितने तरह के पूजा पाठ होते हैं तो इन सबके साथ साथ बहुत से लोक कथा और किंदवती जुड़ी हुए है । किसी भी पूजा पाठ में हम वहीं करते हैं जो हमने अपनी दादी नानी को करते देखा है । हम जल्दी उसे बदलना पसंद नहीं करते । हमें आशंका रहती है कि कहीं कोई अनिष्ट न हो जाए । चौरचन के साथ भी कुछ कथा कहानी जुड़ी है । कहा जाता है कि चंद्रमा को अपने सौंदर्य पर बड़ा घमंड था । एकबार गणेश जी कहीं से आ रहे थे तो चंद्रमा की उनपर नजर पड़ गई और वो गणेश को देखकर जोर जोर से हंसने लगे । गणेश जी को बहुत बुरा लगा और वो नाराज हो गए, नाराजगी में उन्होंने चन्द्रमा को श्राप दे दिया कि जो आपको देखेगा उसे श्राप लग जाएगा । बस फिर क्या था चंद्रमा बेचारे सबसे छिपने लगे । एक बार डरते डरते वो बह्मा जी के पास पहुँचे और अपनी मु्क्ति का उपाय पूछने लगे । बह्मा जी ने उन्हें गणेश की पूजा अर्चना करने को कहा । उनकी बात मानकर चंद्रमा ने गणेश की पूजा अराधना की । अपने पूजा ध्यान से चन्द्रमा ने गणेश का मन जीत लिया । उन्होंने अपने श्राप से चन्द्रमा को मुक्त कर दिया और कहा कि भादव मास शुक्ल चतुर्थी को जो कोई भी आपको देखेगा उसे कलंक लगेगा लेकिन जब कोई भादव मास के शुक्ल चतुर्थी को विधि पूर्वक पूजा कर जल फूल लेकर आपको देखेगा उसे कलंक नहीं लगेगा और उसे मनोवांछित फल मिलेगा ।
चौरचन में जो महलिा हाथ उठाती हैं वो पूरे दिन व्रत करतीं हैं और शाम के समय में जलफूल , मिष्ठान तथा फलफूल लेकर चन्द्रमा का दर्शन करतीं हैं । घर के बाकी सदस्य भी फलफूल ,मिष्ठान हाथ में लें चन्द्रमा का दर्शन करते हैं ।
चौरचन में बहुत तरह के पकवान भी बनाए जाते हैं और कहा जाता है कि जबतक चन्द्रमा को देख न लें इन पकवानों को खाया नहीं जाता है । शाम में चन्द्रमा के दर्शन होने के बाद ही उसे खाया जाता है । इस दिन के विशेष पकवान में टिकरी,पुरुकिया,दही, खीर, ओल का चटनी,झिमनी का भुजिया,दाल पुरी और साग अनिवार्य रुप से बनाया जाता है । समय के साथ इसमें भी बहुत परिवर्तन आया है जो स्वाभाविक ही है जहाँ हम रहते हैं वहाँ बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो नहीं पाई जाती है फिर भी प्रयास रहता है कि हम वो सब वो उपलब्ध करें जिससे हमारे पूर्वज जिस तरह मनाते आए हैं हम भी मनाए । इस पर्व को मनाने वाले विदेशों में भी हैं तो हम कहीं भी रहें अपनी सभ्यता अपने संस्कार अपने खानपान , पहनावें से नहीं भटके ।
कुछ आधुनिकता जो आई है उसे हम नकार नहीं सकते हैं । आज हमारे बच्चे उन पकवानों को खाना नहीं चाहते हैं जिन्हें हम समय लगाकर और खर्चकर बनाते हैं उन्हें पसंद आती है तो वह है बाहरी खाना । जैसे दाल पुरी के बदले में वो पिज्जा और खीर की जगह पर आइसक्रिम खाना पसंद करते हैं । लेकिन जिस मिट्टी में हम पले बढ़े उस मिट्टी से जुड़ना जरुरी है । बेहतर होगा हम कहाँ से आते हैं उसे न भूलें । कंचना झा

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