कैलाश महतो, पराशी। चुनाव हर क्षेत्र में आवश्यक होता है । इसके बगैर आदमी अपना पसन्द खो देता है । आदमी के ही जीवन में चुनाव नहीं, अपितु यह हर जीव जन्तु के जीवन में अपरिहार्य है । जानवर भी चुनाव से ही अपना बास स्थान, घुमना फिरना और भोजन आदि का व्यवस्था करता है । माननव के जैसा ही जानवर में भी राजनीतिक उद्यम न होने के कारण न तो वह कोई पार्टी बना पाता और ना ही आदमी के तरह जानवर ज्यादा बेहुदे हरकतों से कोई राजनीतिक चुनाव लडता है, यद्यपि संघर्ष वहाँ भी होता है ।
अल्बर्ट आइन्सटाइन ने कहा था कि संसार से अगर मधुमक्खी खत्म हो जाये तो आदमी का जीवन चार साल कम हो जायेगा । आइन्सटाइन से आगे आकर हप्किन्स ने दावा कर दिया कि विश्व में जिस प्रकार की राजनीति चल रही है, अगर इसमें सुधार न हुआ तो धरती पर आदमी छ: सौ साल से ज्यादा जीवित नहीं रह पायेगा ।
हप्किन्स ने जो बात कही है, वह सत्य प्रतित हो रहा है । आदमी विगत आठ हजार वर्षों में प्रकृति के साथ जो हरकतें की है और उसने जो जारी रखी है, उसके आधार पर हप्किन्स का भविष्यवाणी सत्य सावित होना तय है । आदमी ने विगत आठ हजार वर्षों में प्रकृति, जीवन, समाज, परिवार, सम्बन्ध और पर्यावरण के साथ इतने घिनौने ज्यादती की है, जिसके परिणाम स्वरुप संसार को बहुत बडी नुक्सानी सहनी पडी है । हप्किन्स ने अपने हिसाब में यह भी कहा है कि मानवीय कृयाकलापों में इस धरती को सबसे बडा अगर किसी मानवीय व्यवहार से प्रकृति और धरती को नुक्सान उठाना पडा है तो वह इंसानी राजनीति है ।
बांकी सारे बातों को तपसिल में रखकर राजनीति की बात करें तो सबसे ज्यादा अहंकार राजनीति ने पैदा किया है, जिसने प्राकृतिक जीवन, प्राकृतिक सम्बन्ध और प्राकृतिक संयोगों को खत्म कर राजनीतिक सम्बन्धों पर आधारित संसार का निर्माण किया है । उसका खामियाजा इतना विशाल रहा है कि सारे दु:खों का कारण भी राजनीति ही सावित हो रही है । राजनीति ने महिला और पुरुष बीच में खाइ पैदा की, जात पात की शुरुआत की, धर्म, कर्म और अधर्म का सीमा तोका और मानव को टुकड़ों में खण्डित किया । धनी और गरीब, उंच और नीच तथा क्षेत्रवाद का जन्म दिया । सारे फसादों का जड राजनीति ही है ।
निर्वाचन देश के निकास, विकास और समृद्धि के लिए होमा चाहिए था । निर्वाचन पद्धति से तयित ढांचों में देश में चुनाव होता है, जिसका उद्देश्य चुनाव के विगत के अवधि (बिते पाँच सालों में) राज्य ने जो अनुभव किया, समाज में जो बदलाव आये, जो जन आकांक्षाएँ दिखी – उसको नये ढंग से पूर्ति करने के लिए राजनीतिक चुनाव किया जाता है । दक्ष, सक्षम, सहिष्णु और समाजप्रिय लोगों को उसकी जिम्मेवारी लेनी चाहिए थी । राज्य को अपने सुन्दर और ठोस भविष्य के लिए सद्गुणी और कृपापूर्ण पात्रों ला मिर्माण करना चाहिए था ।
राजनीतिक चुनाव का मतलब ही राज्य में जन आकांक्षा के को पूर्ति हेतु नीति, नियम, विधि, विधान और सरकार बनाना होता है । जिस व्यवस्था के विरुद्ध जनता के बलिदानी पर देश में प्रजातान्त्रिक, लोकतान्त्रिक और गणतान्त्रिक व्यवस्था लाये गये, उसके अनुसार जनता को कुछ मिलना तो दूर, विगत के व्यवस्था से भी अथाह असन्तुष्टि जनता में डाल दिया गया है ।
नेपाल अपने आवधिक निर्वाचन के तैयारी में जोड तोड से लगा है । उम्मीदार छनौटों के समाचार इस तरह चारों तरफ से आ रहे हैं, मानों नेपाली राजनीति ने उम्मीदवारों की कारखाने खोल रखे हों । कल्ह और आज सुवहतक जो व्यक्ति तस्करी, गुण्डागर्दी, माफियाना हर्कत, हफ्ता वसूली, डनीय चरित्र, बदमास, दलाल, भूमि बेचूवा, जंगलखोर, हरामखोर, मानवखोर, चोरी डकैती और पालतू गुण्डे रहे हैं, उनका नाम राजनीतिक निर्वाचन के मैदान में देखा जा रहा है ।
देश की राजनीति तस्कर, मवाली, गुण्डे, उद्योगी,व्यापारी, ठेकेदार और काले धनाढ्य के पास जाने को बेताब है । राजनीति में जो स्वाभाव से गुण्डा, तस्कर, धनाढ्य और मवाली हैं, देश का राजनीति और जनता का भविष्य का क्या होगा – उसका आंकलन करना बेहद जरुरी है ।
२०४६ साल से आजतक राजनीति चाहे जैसा भी रहा हो, प्रजातान्त्रिक और गणतान्त्रिक व्यवस्था के लिए युद्ध करने बाले नेताओं के हाथों में रही थी । मगर अब राजनीति उन गुण्डों के हाथों में जाने का खतरा बढ गया है, जो कल्हतक आजके नेताओं के आगे पीछे रहकर उनके लिए मतदान केन्द्रों पर मत कब्जा करने, नदी दोहन करने, एयरपोर्ट पर तस्करी करने, गोली मारने, आतंक फैलाने, ठेक्का पट्टा करने और पार्टी तथा नेताओं को कमिशन देने के काम करते थे । अब वे खूंखार बदमाश और लखेडे लोग राजनीति में कदम डाल चुके हैं । समाजद्रोही वैसे पात्रों के राजनीति में हुए आगमन से देश, जनता और सम्पूर्ण समाज को कालजयी क्षति होना तय है ।
श्रीलंका में तो केवल एक परिवार ने देश को दिवालियापन का शिकार बनाया । नेपाल के राजनीति में तो प्रचण्ड परिवार, देउवा परिवार, माधव और झलनाथ परिवार, बाबुराम और रामचन्द्र परिवार, उपेन्द्र और राजेन्द्र परिवार, अनिल और राजकिशोर परिवार, महन्थ और सीके परिवार तथा जातों के हावी होने के साथ साथ मवाली, तस्कर, गुण्डा, हत्यारे भी हावी रहेंगे । उस अवस्था में समान्य जनता राजनीति से कोशों दूर रहकर उनके आततायी व्यवहार, भ्रष्टाचार, आर्थिक अनियमितता, दुराचार, दुश्कर्म, हत्या, बलात्कार, दोहन, शोषण और मानहानी के शिकार होते रहेंगे । देश नये नये श्रीलंका, बंगलादेश, कोसोभो, सिरिया, सूडान आदि बनना भी निश्चित प्राय: है ।
जनता को अब इस बकवास और दलिल से निकलकर सडक पर आने के सिवाय अन्य कोई विकल्प नहीं है कि वे इस मिश्रित निर्वाचन प्रणाली का विरोध कर पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली का मांग करें, ता कि जनता के बीच से, उसके अपने अपने समुदाय से उसके ही द्वारा चुने गये समानुपातिक संसद प्रतिनिधि बन सकें ।
इस व्यभिचारी और भ्रष्ट निर्वाचन से निजात पाने ले लिए एक और अन्तिम उपाय ही पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली है । इसके लिए आवाज दें, आन्दोलन करें और विद्रोह के साथ मौजूदा इस असफल निर्वाचन प्रणाली को अस्वीकार करें ।
जनता इसी तरह खामोस रही तो इसका खामियाजा यह होना तय है कि हप्किन्स का बात सही ही नहीं, उनके अनुमान से पहले ही जल्द नेपाल, नेपाली समाज और जनता का अन्त हो जाये ।


