समानुपातिक को लेकर कांग्रेस दल में असंतुष्टि

काठमांडू, २६ मंसिर –शनिवार की शाम तक जब समानुपातिक सदस्यो का नाम चयन कर आयोग को भेजा गया उस समय तक बहुत से नेताओं को बहुत सी उम्मीदें थी दलों से । जब नाम कुछ हद तक सार्वजनिक किया गया तब लोगों ने अपनी असंतुष्टि को बयान किया है । इसी सिलसिले में सत्तारुढ़ दल के कुछ नेताओं ने अपने क्रद नहीं होने की बातें कही हैं । सत्तारुढ दल नेपाली कांग्रेस में समानुपातिक सांसदों को चुनने के विषय में नेताओं ने घोर असन्तुष्टि दिखाई है । नेतृत्व ने समावेशी समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली के मर्म के विपरीत जाकर अपने निकट संबंधियों और परिवारवाद को प्राथमितकता में रखा है । जिससे कारण नेताओं ने नेतृत्व के प्रति अपने आक्रोश को जाहिर किया है ।
पार्टी के भीतर शक्तिशाली पद धारण किए हुए और बार बार अवसर लेने वाले, मंत्री तक बने हुए नेताओं को ही एकबार फिर समानुपातिक में नाम देने का क्या मतलब है । जिनका नाम नहीं है वे बहुत ही आक्रोश में हैं और एक दूसरे से शिकायत कर रहे हैं । कांग्रेस ने समानुपातिक में प्रतिनिधिसभा में ३२ और प्रदेशसभा की ओर से प्रदेश १ में १२, मधेश और गण्डकी में ९–९, वाग्मती प्रदेश में १२, लुम्बिनी प्रदेश में १०, कर्णाली प्रदेश में ५ और सुदूरपश्चिम प्रदेश में ७ सीट के लिए शनिवार बन्दसूची में आधारित आयोग को नाम सिफारिस किया था । बन्दसूची में होने के बाद भी निर्वाचित होने वाले सूची में नहीं आने वाले नेताओं ने अपनी असन्तुष्टि को प्रकट किया है ।
बहुत से नेताओं ने कहा कि हमारे साथ अन्याय हुआ है पूर्व उपसभापति गोपालमान श्रेष्ठ ने कहा कि –‘समानुपातिक समावेशी दलित, आदिवासी जनजाति, मधेशियों के प्रतिनिधित्व के लिए है लेकिन कानुन को आधार बनाकर पार्टी ने मुझे अलग कर दिया , पहले मेरा नाम जनजाति के पहले नम्बर में था लेकिन मुझे हटाकर मेरे साथी का नाम खस आर्य की सूची में भेज दिया है । प्रत्यक्ष में ७७ प्रतिशत खस आर्य पुरुषाें ने जीता है तो ऐसे में समानुपातिक में भी खस आर्य के लिए भी पुरुष को ही निर्वाचित करना, ये कैसे न्यायपूर्ण हो सकता है ?
फिर वही सभापति देउवा ने तीन सीट में बन्दसूची में पहले नम्बर में दलित की ओर से सहमहामन्त्री जीवन परियार, खसआर्य से प्रवक्ता प्रकाशशरण महत और मधेशी से पूर्वउपसभापति विमलेन्द्र निधि को ही चुना । ये क्या बात हुई । बार बार एक ही लोगों का चुनाव क्यों ?
चुनाव में प्रत्यक्ष से टिकट नहीं लेने वाले केन्द्रीय प्रचार परिचालन समिति के नेतृत्व करने वाले श्रेष्ठ को समानुपातिक में भी नहीं समेटा गया । ये उनकी शिकायत है । श्रेक्ष्ठ का कहना है कि सहमहामन्त्री परियार नेता शेखर कोइराला के समूह के नेता हैं इसलिए प्रत्यक्ष से एक भी दलित ने टिकट नहीं पाने के कारण देउवा पर बहुत दबाब था ।
इसी तरह देउवा ने नीधि को भी समेट लिया और जहाँ तक बात है प्रवक्ता महत की तो वे देउवा के प्रिय पात्र हैं । इस कारण से न केवल श्रेष्ठ वरन और भी बहुत से लोग अपनी पार्टी से असंतुष्ट हैं । उन्होंने कहा कि शनिवार की सुबह ९ बजे से लेकर सानेपा स्थित कार्यालय में केन्द्रीय कार्यसम्पादन समिति में चर्चा हुई लेकिन सहमति नहीं होने के बाद बैठक ने सभापति देउवा पर निर्णय लेने का अधिकार दिया था । उसके बाद देउवा ने बालुवाटार स्थित अपने निवास पर ही पार्टी के शीर्ष नेताओं को बुलाकर सूची तैयार की और आयोग को रात में सूची भेजी गई ।
हाँ मैं ये नहीं कहता कि सभी दुखी हैं जिन्होंने पाया है वो खुश हैं और जिन्होंने नहीं पाया है वो दुखी हैं । और जिसने नहीं पाया है वो तो अपनी असंतुष्टि जाहिर करेगा ही ।
हाँ ये जरुर है कि समानुपातिक का सभी फायदा उठा रहे हैं । अपने परिवारवाद, ईष्ट मित्र से बाहर नहीं निकल रहे हैं जिससे देश के साथ साथ उनकी पार्टी में भी विद्रोह हो रहा है । जहाँ असंतुष्टि होगी वहाँ दल बदल तो होगा ही । ऐसे में आप अपनी पार्टी के कई अच्छे नेताओं को खो सकते हैं । इसका ध्यान सभी पार्टियों को रखना चाहिए

