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नारी दिवस

 

करुणा झा:पश्चिम के तर्ज पर हर किसी के नाम का दिवस मनाने का रिवाज नेपाल में भी प्रचलित हो चुका है । फादर्स डे, मदर्स डे, वैलेन्र्टाईन डे, और वुमन्स डे -महिला दिवस) । हम लोग इस मामले में सबसे आगे हंै कि दुनियाँ के किसी भी कोने में कुछ भी होता हुआ देखा और फौरन उसकी नकल में लग गए । ना इस बात से मतलब कि हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारे धर्म से उसका कोई ताल-मेल है कि नहीं । हमें तो बस वही लकीर पीटनी है जो विदेशों में पीटी जा रही है । मतलब और मकसद से किसी को कोई लेना देना नहीं है ।womenday
अफसोस सिर्फइस बात का है कि दिवस मनाने में तो हम किसी से पीछे नहीं रहना चाहते लेकिन मानसिकता और सांेच में कोई परिवर्तन करना हो, उसे बदलना हो तो हम छिटक कर दूर खडÞे हो जाते हंै ।
यहां बडÞे-बडÞे आयोजन होते हैं । अलग अलग क्षेत्रों से जुडÞी महिलाओं के इटरब्यू अखबारों मे प्रकाशित होते है । टी.भी. चैनल्स पर भी सुबह से शाम तक महिला दिवस सम्बन्धित खबरों की धूम मची रहती है । बडÞा ही खुशनुमा सा माहौल का अहसास दिनभर होता रहता है । ऐसा लगता है जैसे अब हमारा देश भी महिलाओं के प्रति अपनी सोच को बदलने को आतुर है । लेकिन बस दिन गुजरा और कहानी खत्म । रात गई, बात गई ।
अब अखबार उर्ठाईये तो दूसरे दिन से ही फिर वही सिलसिला शुरु होता है । क्या शहर क्या गाँव, घर से लेकर बाहर तक, मासूम बेटियों से लेकर विवाहित महिलाओं की लुटती इज्जत का बखिया उधेडÞा जाता है । कहीं पुलिस के हाथों तो कहीं अपने ही पति के हाथों बात-बात पर पीटती है औरत । दफ्तरों में अपने बाँस और सहकर्मियों की फब्तियों और शोषण का शिकार औरत दहेज के लोभी परिवारों के हाथों जलाई जानेवाली औरत की कहानी चारों ओर व्याप्त है । आँकडे गवाह हैं कि इनमें से किसी भी खबर की संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही है । ये वही महिलाएँ हंै, जिनके नाम पर हम हरसाल “अन्तर्रर्ाा्रीय महिला दिवस” मनाने को तत्पर रहते हैं । वैलेन्टाइन डे पर अपनी मोहब्बत को कैसे पाएं, क्या गिफ्ट दें, ऐसा जताते हैं । और जरा सी तकरार हो जाए तो मुँह पर एसिड फेंकने से लेकर सरेआम जलील करने तक का कोई मौका नहीं चूकते । इतना होने के बाद कहने सुनने को अब क्या बचा है ! कुछ भी मनाने से पहले अपने गिरेबान में एकबार झाँक कर देखने की जरूरत है । ये तो वही बात हर्ुइ कि – “हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और होते हैं ।”
जिस समय १६ दिसम्बर -दामिनी रेप काण्ड) के विरोध में पूरा भारत उबल रहा था, उस समय भी रोज कहीं ना कहीं से वैसी ही दरिन्दगी की खबर आती रहती थी, जो आजतक उसी तरह जारी है । जिम्मेबारियों का दोष एक दूसरे पर मढÞने का सिलसिला जारी है । कभी पुलिस के सिर तो कभी कानून व्यवस्था के सिर । विकास के नाम पर देश के कर्ण्र्ाारों द्वारा होने वाले भ्रष्टाचार और घोटालों की बढÞती संख्या ने हमे पूरे विश्व में शर्मसार ही किया है । जरूरत है अपने आप को बदलने की, सोच को बदलने की, अपने बच्चों को पैसा कमाने की मशीन बनाने के बजाय संस्कारवान बनाने की, हर रिस्ते का सम्मान करने की, परिवार में एक दूसरे पर भरोसा करने की । देश और समाज की एकता और अखण्डता को बनाये रखने की जाति और धर्म के नाम पर नफरत की दीवार को गिराकर आपसी प्रेम को बढÞाने की, निजी स्वार्थ से उपर उठकर, देश और समाज के हित की बात सोचने की । जब तक ऐसा नही होता किसी भी “दिवस” को मनाने की बात बेमानी लगती है ।
“किसकी शिकायत लव पे लाऊं
किसको दूँ इल्जाम
मुझे बरबाद करने वाले
हैं जाने पहचाने लोग तमाम

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