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अब होली नहीं टोमेटो फेस्टिवल, पर्यटन के नाम पर संस्कृति विरुद्ध प्रहार : कंचना झा

 


कंचना झा, काठमांडू, २४ फागुन – होली आस्था, विश्वास का पर्व । जिसे न जाने हम कब से मनाते आ रहे हैं ? हम रामायण की कथा पढ़े या फिर पढ़े महाभारत को, होली वहाँ से जुड़ी है । होली जुड़ी है हिरण्याकश्यप और प्रह्लाद से । होली जुड़ी है गौरी शंकर से । होली जुड़ी है ठोलक, तबला, मृदंग से, होली जुड़ी है गीत, संगीत और जोगीरा से । होली जुड़ी है हमारे पकवान की मीठी खुशबू से, रंगअबीर,गुलाल के बौछारों से । तो अचानक से इसमे टमाटर कहाँ से आया ?
हमारी संस्कृति है हमारा त्योहार । हम बहुत आस्था से अपने हर त्योहार को मनाते हैं । और चाहते हैं कि अपने हिन्दू धर्म पर जैसे हम गर्व करते हैं हमारी आने वाली पीढ़ी भी करें । लेकिन अभी हम और हमारा देश पश्चिमी संस्कृति की ओर ज्यादा झूक रहे हैं ।
समय होली का है तो अभी होली की ही बात करते हैं जहाँ हम अपनी हिन्दू संस्कृति में स्पेन के खेल को शामिल कर रहे हैं जिसका बहुत ज्यादा लम्बा इतिहास नहीं रहा है । न किसी धार्मिक आस्था से इसकी शुरुआत हुई है । सन १९४५ को इस खेल का आरंभ हुआ । खेल का नाम ‘ टोमैटिना’ है । हर साल अगस्त महीने के अंतिम बुधवार को स्पेन में यह त्योहार मनाया जाता है । लेकिन हमारे बीच यह तब और ज्यादा लोकप्रिय हुआ जब बॉलिवुड की फिल्म आई – ‘जिंदगी न मिलेगी दुबारा’ एक नए खेल को हमने देखा सिखा और बहुत हद तक अपनाया भी ।
हम किसी भी संस्कृति को बुरा नहीं कहते । लेकिन जब प्राथमिकता में किसी बात को रखनी होगी तब तो हम अपनी संस्कृति को ही रखेंगे न । हम पहले अपनी हिन्दू संस्कृति का बचाव करें या आधुनिकता में इतना खो जाए कि अपने को भूलकर दूसरों की बात को सूने ।
जब भी कोई हिन्दू का त्योहार आता है कुछ लोग न जाने कहाँ से चले आते है विरोध में खड़े होने के लिए । पूरे साल कुछ नहीं करते । बस दशमी के समय बली प्रथा का विरोध करने लगते हैं । हम होली की बात करते हैं तो कुछ लोग ‘सेभ वाटर’ की बात को आगे बढ़ा देते हैं । समझ में नही आता कि हिन्दू धर्म में मनाएं जाने वाले हर त्योहार पर इस तरह का सवाल क्यों उठाया जाता है ?
अभी काठमांडू की अगर बात करें तो बहुत ऐसे लोग हैं जो इस मानसिक तनाव में हैं कि समय कैसे गुजरेगा ? मंहगाई बढ़ रही है लेकिन आमदनी तो बढ़ नहीं रही है । पहले जो काम ५,००० में होता था अब २५ हजार हो चुके हैं । ऐसे में बच्चों का भविष्य क्या होगा ? देश की आर्थिक अवस्था देखे तो चरमराई सी है । और यहाँ लोग टोमेटो फेस्टिवल मना रहे हैं । जिस देश के आम नागरिकों का हाल बेहाल है वहाँ इस तरह का त्योहार मनाना कुछ अजीब सा लगता है ।
कहते हैं अपने संस्कृति का प्रचार हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा ?अपनी संस्कृति को विदेशियों को समझाना है न कि उनके में खुद को शामिल करना है । हाँ उन बातों को, त्योहारों को तब जरुर अपनाना चाहिए जब हम उस अवस्था में पहुँच जाए । कहते हैं ‘अपने पास कुछ नहीं और चले विदेश यात्रा पर’ या फिर मैथिली में एक कहबी है – ‘पाए न कौड़ी बीच बजार में दौड़ा दौड़ी ’तो ऐसी अवस्था है हमारी ।
ग्लोबल टुरिजम प्रोमोसन काउन्सिल यदि इस टोमेटो फेस्टिवल के बदले में हमारे ही होली के जोगिरा या फिर देश के हर भाग में जो होली मनाने का प्रचलन है उसे दिखाता तो एक बात होती । कम से कम इतना तो होता न कि जिनकी त्योहार को हम अपना रहे हैं वो भी हमारे त्योहार को देखें और सुने । इसबार काठमांडू के लैनचौर में टोमेटो (टमाटर) की होली खेली गई । ग्लोबल टुरिजम प्रोमोसन काउन्सिल ने स्पेन में मनाई जाने वाली टोमेटो फेस्टिवल और होली को एक साथ मनाने के लिए टोमेटो होली आयोजना की थी ।
सच कहें तो हमें जरुरत है अभी अपनी ही संस्कृति को बचाने की क्योंकि हमारे ही बच्चें अब फाग, जोगिरा को समझ नहीं रहे हैं तो आनेवाले समय में यह लोप हो जाएगा । हम अपनी होली के असली रंग को भूलकर टोमेटो फेस्टिवल में उलझ रहे हैं ।
हम सभी जानते हैं कि नेपाल में रंग, अबीर और पानी के साथ खेली जाती है । हमें तो ये करना था कि जो विदेशी आते हैं, यहाँ रहते हैं, उन्हें बुलाते और दिखाते कि देखों कैसे हम होली खेलते हैं रंग, अबीर और गुलाल पानी से ।
अब स्पेन की अगर बात करेंगे तो स्पेन में टोमेटो फेस्टिवल में सहभागी लोग एक दूसरे पर टमाटर फेंकते हैं । और हम टमाटर को खाने में प्रयोग करते हैं । ऐसी बात नहीं है कि वहाँ के लोग टमाटर नहीं खाते हैं । वो भी खाते हैं लेकिन उनकी बात हमसे अलग है । नेपाल में अभी टमाटर ५० रुपैया किलो है । घर में टमाटर खाने को नहीं है तो खेलने के लिए कहाँ से आए ये टमाटर ? हाँ हैं कुछ ऐसे लोगों को टमाटर खाना नहीं खेलना पसंद है । सच्चाई तो यही है कि नेपाल का हर व्यक्ति इस अवस्था में नहीं है । हमारे देश की सरकार अपनी और अपनी कुर्सी के अलावे कही ध्यान नहीं देती है लेकिन स्पेन की सरकार अपनी जनता के लिए है । वह उसकी खुशी के लिए काम करती है । अपने देश का विकास कैसे हो ? कहाँ कैसे काम करें कि हमारी संस्कृति दूर दराज तक पहुँचे और हम हैं कि अपने ही देश के विभिन्न भागों में विभिन्न संस्कृति से अवगत नहीं हैं लेकिन विदेशी फेस्टिवल को जरुर प्रोत्साहन करेगे । ।
नकल हमेशा अच्छे के लिए करना चाहिए । जहाँ अपनी संस्कृति पर आँच आए वहाँ सिखाने की जरुरत है । ये जो हिन्दू संस्कृति पर प्रहार किया जा रहा है न उसे रोकना बहुत आवश्यक है । नहीं तो आने वाले समय में हमारे बच्चें होली नहीं टोमेटो फेस्टिवल ही खेलेंगे । शायद एक समय ऐसा भी आए कि टमाटर को हम खाने के लिए खेलने के लिए जाने ।

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कंचना झा
कार्यकारी संपादक
www.himalini.com

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