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क्या प्रेम किसी खास दिन या महीने का मुहताज है ? : कंचना झा

 

कंचना झा, हिमालिनी अंक फरवरी । आज रिया (परिवर्तित नाम) बहुत उदास और नाराज है और जोर जोर से अपनी नाराजगी व्यक्त कर रही है कि, उफ कैसे मोहल्ले में हम रहते हैं जहाँ एक भी गुलाब का फूल नहीं मिला । दरअसल वह अपने प्रेमी को आज गुलाब देना चाहती थी । आज वैलेंटाइन डे का पहला दिन है जिसे रोज डे कहकर मनाया जाता है लेकिन गुलाब नहीं मिला । रिया कहती हैं कि – प्रेम को दर्शाने का आज अच्छा अवसर मिला था लेकिन नहीं दर्शा पाई, गुलाब ही नहीं मिला ।

ये एक रिया की बात नहीं है अभी यह एक नये फैशन के रूप में आ गया है कि कोई नाराज हो या फिर अपने प्रेम का इजहार करना है तो उसे गुलाब का फूल दें । ये नया रूप है वैलेंटाइन डे का । कुछ समय पहले की बात करें तो एक दिन वैलेंटाइन डे के रूप में मनाया जाता था मगर अब तो यह प्रेम विक के रूप में मनाया जाता है ।
छोटे–छोटे दुकानों में भी गुलाब फूल की खरीददारी बढ़ गई है । लम्बी कतार है फूल खरीदने वालों की । बहुतों को तो फूल मिला भी नहीं । भीड़ है दुकानों में । युवाओं की भीड़ है होटल रेस्टोरेंट में । कहीं भी पैर रखने की जगह नहीं है । पिछले कुछ दिनों से बाजार का माहौल ही कुछ अलग–अलग सा है । कहते हैं कि वैलेंटाइन विक चल रहा है ।

वैलेंटाइन डे कहाँ से इसकी शुरुआत हुई ?
कहते हैं २७० ईसवी रोम में एक संत वैलेंटाइन नामक व्यक्ति थे, जो प्रेम को बहुत बढ़ावा देते थे । उस समय रोम के राजा क्लाउडियस को प्यार और प्रेम संबंधों से सख्त नफरत थी और वो इसका जमकर विरोध करते थे । इस कारण संत वैलेंटाइन से उनकी नहीं बनती थी । रोम के राजा को लगता था कि प्यार या प्रेम संबंध रोम या किसी के प्रति झुकाव के चलते ही सैनिकों का ध्यान भंग होता है । इसलिए रोम के लोग सेना में भर्ती नहीं होना चाहते हैं ।

इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए राजा क्लाउडियस ने रोम में सैनिकों की शादी और सगाई पर पाबंदी लगा दी । इस बात की जानकारी जब संत वैलेंटाइन को हुई तो उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई और इसका विरोध भी किया । इतना ही नहीं, संत वैलेंटाइन ने रोम के राजा के निर्णय के विरुद्ध जाकर शादियां भी करवाई ।
ये सभी शादियां १४ फरवरी को सामुहिक विवाह के रूप में की जाती थी । इसी वजह से १४ फरवरी के ही दिन संत वैलेंटाइन को फांसी पर चढ़ा दिया गया था । तब से संत वैलेंटाइन की याद में १४फरवरी को वैलेंटाइन डे के रूप में मनाया जाने लगा ।

बहुत जगहों पर यह भी लिखा मिला है कि जब संत वैलेंटाइन जेल में बंद थे, तब उन्होंने वहां से जेलर की बेटी को एक पत्र लिखा था, जेलर की बेटी देख नहीं सकती थी और उन्हें बहुत मानती थी । इस पत्र के आखिर में संत ने ‘फ्रॉम योर वैलेंटाइन’ भी लिखा था । कहते हैं कि संत वैलेंटाइन की प्रार्थना से जेलर की बेटी की आंखों में रोशनी आ गई थी । ये था प्रेम ।
प्रेम एक शाश्वत भाव, ये कल भी था आज भी है और कल भी रहेगा । इसके लिए किसी विशेष दिन की आवश्यकता नहीं है । प्रकृति के कण–कण में प्रेम समाया है ।
दांङ्ग के सुरेश गुप्ता कहते हैं कि – ‘मुझे तो इसका कोई औचित्य ही नजर नहीं आता है । हमारे लिए तो पुरानी रीति रिवाज ही अच्छे । हमारी संस्कृति तो दिखावे की है ही नहीं । क्योंकि हम महसूस करना जानते हैं, अहसास करना जानते हैं । हमें चार लोगों को दिखाना नहीं है कि हम प्रेम में हैं । वो आगे कहते हैं कि अब प्रेम दिखाने का हो गया है । आधुनिकता ने हमारी नई पीढ़ी को कुछ इस तरह से छू लिया है कि इससे बाहर निकलना थोड़ा मुश्किल ही होगा ।’

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लेकिन वासुदेव यादव जो कपिलवस्तु से हैं वो बिल्कुल अलग मत रखते हैं सुरेश गुप्ता से । उनका कहना है कि वैलेंटाइन डे मनाना ही चाहिए । विदेशी कल्चर कहकर लोग इसे मनाने से डरते हैं । मेरा तो मानना है कि कोई भी कल्चर विदेशी नहीं होता है । जिस तरह हम नए टेक्नॉलोजी से जुड़ते हैं उसी तरह नए कल्चर से भी जुड़ना चाहिए । हमारा समाज बहुत ही रुढि़वादी है । हम अभी भी पुरानी ही रीति रिवाजों को ही ढो रहे हैं । इसमें बदलाव की आवश्यकता है ।
रही बात शिवरात्रि और जन्माष्टमी मनाने की तो वो सनातन धर्म से जुड़ी हुई बातें हैं हम उसी तरीके से मनाए जैसे मनाते आए हैं । हम इस बात की गहराई में जाएँ कि पहले लोगों को जानकारी नहीं थी तो लोग वैलेंटाइन डे नहीं मनाते थे अब है तो जरूर मनाना चाहिए । जिससे समाज में प्रेम बढ़े उसे मनाने में कोई हर्ज नहीं है ।’
लेकिन बदलते वक्त के साथ प्रेम भी बदल रहा है । प्रेम करने वाले भी बदल रहे हैं । अगर अभी की बात करूँ तो ये फरवरी का महीना यानी प्रेम का महीना है । वैसे तो प्रेम का कोई महीना कोई दिन नहीं होता है मगर हम और आप अभी आधुनिकता की दौड़ में रेस लगा रहे हैं तो पूरे फरवरी महीने को प्रेम का महीना बना दिया ।
इसकी सुन्दरता कभी दिखाने से नहीं बढ़ती है, ये हम और आप सभी जानते हैं, मगर फिर भी जो दिखता है, वो बिकता है । आज सभी बिकने को और खरीदने को तैयार हैं ।
पाल्पा की सुदामा का कहना है कि – ‘ये हमारा रिवाज नहीं है तो हम क्यों इसे मनाए ? प्रेम को साबित करने के लिए हमें किसी वैलेंटाइन डे की आवश्यकता नहीं है । मैं तो कहती हूँ कि ये सब दिखावा है इसलिए तो जो केवल एक दिन का था उसे सप्ताह का रूप दे दिया गया है ।’
सभी जानते हैं कि प्रेम सबके लिए है मगर फिर भी इसे प्रेमी–प्रेमिका के लिए खास बना दिया गया है । फिर आज के समय में इसे फूल से जोड़ दिया गया है । जानी हुई बात है कि गुलाब का फूल देने और लेने से प्रेम नहीं बढ़ता है लेकिन लोग लेते और देते हैं । चलिए गुलाब तक तो ठीक था लेकिन अब का प्रेम तो बड़ा मंहगा हो गया है । प्रेम में १४ फरवरी के दिन पे्रमी प्रेमिका को मंहगे गिफ्ट न दे तो वो प्रेम फिर कहाँ चला जाता है ये सभी जानते हैं ।’
दरअसल आज प्रेम को मंहगे गिफ्ट से जोड़ दिया है । जबकि प्रेम युगो युगो से लोगों के दिलो में पलता रहा है । सच कहें तो इसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता । इसे किसी बंधन या रिश्ते का नाम नहीं दिया जा सकता । जिसकी कोई परिभाषा नहीं है ।
काठमांडू के सविन सिंह का कहना है कि – ‘मैं बहुत ज्यादा नहीं जानता । केवल इतना जानता हूँ कि प्रेम को दर्शाने का यह एक बहाना है वैलेंटाइन डे तो क्यों न इस दिन दर्शाया जाए । प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार करने के एक दिन तय किया गया है तो मना लें । लेकिन हाँ फिर इसमें फिजुलखर्ची नहीं हो । मंहगे गिफ्ट देने लेने को ही प्रेम न माने । उपहार के नाम पर कोई पैसा बर्बाद नहीं करें । अपने पॉकेट का ध्यान रखें ।
आजकल के युवा अगर इससे खुश हैं तो हमारा क्या जाता है । वो स्पेशल फिल करता है तो करने दें । प्रेम अंदर की बात है । अपना विचार है खुलकर जीने दें । हाँ एक और बात वैलेंटाइन डे को हमने जो बांध दिया है प्रेमी प्रेमिका में तो ये गलत है । वैलेंटाइन तो माता पिता भी, भाई बहन भी, पति पत्नी भी हो सकते हैं । दुनिया में जितने भी रिश्ते हैं, बंधन है वो आपके वैलेंटाइन हैं ।’
नवलपरासी के अनील कुर्मी का कहना है कि – ‘सभी मानते हैं कि प्रेम अहसास है । ये अपने आप हो जाता है । और खासियत यह की यह कोई नहीं कह सकता कि मुझे कभी किसी से प्रेम नहीं हुआ है । और जो कहते हैं वो झूठ बोलते हैं । आगे वो कहते हैं कि मेरा वश चले तो मैं तो अरेंज मैरेज ही हटा दूँ । सभी सबसे प्रेम करें । अपने तरीके से जीवन व्यतीत करें । प्रेम महिला पुरूष दोनों में एकात्मकता लाती है । दोनों एक दूसरे को एक नजर से देखते है । सदियों से जो एक बेड़ी लगी है महिलाओं के पैर में उससे यह प्रेम दिवस ही निजात दिला पाएगा । लोग खुलकर प्रेम करेंगे तो भविष्य में एक दूसरे को सकारात्मक नजर से देखेंगे ।
जहाँ तक आप विकृति की बात करते हैं तो वो कहाँ नहीं है । वैसे भी जिंदगी सीखने का नाम है । अच्छाई और बुराई साथ ही चलती है । यह तो आप पर निर्भर करता है कि आप क्या लेते हैं ? प्रेम के लिए एक दिन या एक सप्ताह भी हम ले या दे रहे हैं तो क्यों नहीं मनाएं । विकृति तो हर जगह है न ।’
सच तो यही है कि प्रेम को एक दिन एक सप्ताह में नहीं बांटा जा सकता है । हर दिन प्रेम का दिन है । इस प्रेम को अनादिकाल से संत, महात्मा, लेखक, कवि, मनोवैज्ञानिक एवं कलाकार इसकी व्याख्या करते रहे हैं । वे अपनी रचना में, अपने सृजन में गीत, कविता, कहानी, उपन्यास तो कभी कलाकृतियों में प्रेम को व्यक्त करने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन प्रेम की सटीक परिभाषा कोई नहीं दे पाए ।
यूँ तो प्रेम को लेकर सबके अपने–अपने मायने हैं । प्रेम को लेकर सबकी अपनी सोच है । माना जाता है कि प्रेम का संबंध आत्मा से होता है। प्रेम में समर्पण, विश्वास और वचनबद्धता की दरकार होती है, लेकिन आज समय बदल रहा है । ‘ग्लोबलाइजेशन’ ने दुनिया को मुट्ठी में भर दिया है । इस बदलते युग में प्रेम भी बदल रहा है, युवक–युवतियों का साथ में घूमना, प्रेम का प्रदर्शन सरेआम करना अब फैशन कहलाने लगा । प्रेम में पहले बरसों इंतजार में गुजार दिए जाते थे, लेकिन अब कोई इंतजार में वक्त जाया नहीं करता ।
समय के साथ अब प्रेम के स्वरूप, स्थायित्व और उसे अभिव्यक्त करने के माध्यमों में भी बदलाव आ रहा है । अब कबूतर बहुत काम नहीं कर सकते क्योंकि ‘मोबाइल’ और ‘इंटरनेट’ के जरिए हम प्रेम का पैगाम भेज रहे हैं । मैसेनजर पर बातें कर रहे हैं और सरेआम फेसबुक पर फोटो रख रहे हैं ।
प्रेम की भी अपनी मर्यादा है । यह अभी के समय में लोग नहीं सोच रहे हैं । आज प्रेम को लेकर लोगों की सोच बदल गई है । सामाजिक मूल्यों में बदलाव आ रहा है । अब प्रेम में भी युवा बहुत ‘प्रेक्टिकल’ हो चला है । मौसमों के बदलने की तरह उसके ‘ब्रेक अप’ और ‘पैच अप’ होते हैं । वह मानता है कि बिना गर्ल फ्रेंड के कॉलेज लाइफ में मजा नहीं है । लेकिन जब शादी की बात आती है तो वह घरवालों से बैर लेने के ‘मूड’ में नहीं होता और उनकी मर्जी को प्राथमिकता देता है ।
प्रेम को कोई सामान्य व्यक्ति परिभाषित कर ही नहीं सकता जब स्वयं भगवान श्री कृष्ण भी नहीं कर पाए । उन्होंने भी इसका अर्थ बतलाया है कि प्रेम का असली अर्थ है– समर्पण । निःस्वार्थ समर्पण और जो बिना कामना के, बिना लालच के किया जाए वो हैं प्रेम ।

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