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सत्ता–सुख परम–सुख- : अंशुकुमारी झा

 

सरकारी धन नेता लोगों के लिए “लूट का धन फुवा का श्राद्ध” जैसा है

अंशुकुमारी झा, हिमालिनी, अंक फरवरी । कुर्सी छोटी हो या बड़ी, उसका आकर्षण विश्वामित्र जैसे विचार वाले नेताओं का भी मन ललचा ही देती है । कुर्सी तक पहुंचने के लिए चापलूसी, लठैतगीरी या कोई भी अनर्गल काम क्यों न हो, सब करने के लिए तैयार हो जाते हैं, नेताजी लोग । फिर जब कुर्सी मिल जाय तो उसे छोड़ने में बड़ी दिक्कतें होती हैं । यह बात सदियों से चली आ रही है । राजतन्त्र के समय में भी कुर्सी अर्थात् राजगद्दी पर बैठने के लिए साजिशें हुआ करती थी और उस दौरान बाधा विघ्न उत्पन्न होने पर खून की नदियां बहती थी । यह उन दिनों की बात है जब देश में राजाओं की हुकुमत चलती थी परन्तु अभी तो हम स्वतन्त्र हैं न ? यह प्रश्न शायद प्रश्न ही बना रहेगा क्योंकि, हमारे देश में कुर्सी का लोभ चरम सीमा पर है । जनता को झूठा आश्वासन देकर चुनाव जीतने वाले जनता को सदैव गुलाम बनाकर ही रखते हैं ।

फिलहाल नेपाल की राजनीति बड़ी उलझी हुई लग रही है । वर्तमान सरकार का गठन अत्यन्त नाटकीय ढंग से हुआ है । इसबार के चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाने कारण एक मत की सरकार नहीं बन पाई । सरकार बनने वाली थी नेपाली कांग्रेस और नेकपा माओवादी की परन्तु एक साजिश के तहत चन्द मिनटों में ही नेकपा एमाले, नेकपा माओवादी और नवागन्तुक पार्टी मिलकर सरकार बना डाले । उक्त प्रक्रिया से सम्पूर्ण राष्ट्र हक्का बक्का रह गया । नेकपा माओवादी के अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल जी प्रधानमन्त्री पद पर प्रतिस्थापित हुए और उन्होंने विभिन्न पार्टियों से अपना मन्त्री मण्डल तैयार किया । इसी क्रम में उपप्रधानमन्त्री तथा गृहमन्त्री पद पर राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने जी को नियुक्त किया गया । दुर्भाग्यवश लामिछाने जी कुछ ही दिन उक्त पद पर टिक पाए । रवि लामिछाने एक ऐसा चेहरा है जिसे जनता ने दिलोजान से पसन्द किया क्योंकि जनता को उनसे बहुत ही अपेक्षा थी । रवि जी युवा नेता के अन्तर्गत आते हैं और उन्होंने जनता को बहुत सारे सपने भी दिखाए थे । परन्तु रवि जी उस पर खरा नहीं उतर पाए । खुद मिडिया में काम करने वाले जब पदच्युत हुए तो नेपाल के विभिन्न मिडिया को गाली देने लगे जो अशोभनीय था । उनका यह कार्य उनकी अपरिपक्वता का परिचायक है । मैथिली में एक कहाबत है “खौंझायल बिलाइर धूरखूर नोचय” । जिसे देश प्रति प्रेम होता है उसे कुर्सी का मोह नहीं होता है । वैसे तो हमारे देश में जो कुर्सी पर बैठ जाता है उन्हें कुर्सी से उतरते वक्त हालात बिगड़ने लगती है क्योंकि कुर्सी पर बैठे–बैठे अपने आने वाले सात पुस्तों के लिए सम्पत्ति बटोर जो लेते है ।

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पिछले महीने कान्तिपुर दैनिक ने जनता को सूचित किया था कि सरकारी कोष से रकम निकालकर देउवा जी ने अपने आदमियों में बांटा है । नेता लोगों का काम ही तो यही है सरकारी धन पहले खुद पेट भरकर खा लेते हैं फिर थोड़ा बहुत अपने चमचों में भी बांट देते हैं । सरकारी धन नेता लोगों के लिए “लूट का धन फुवा का श्राद्ध” जैसा है । पूर्वराष्ट्रपति रामवरण यादव और पूर्वप्रधानमन्त्री झलनाथ खनाल ने भी सरकारी कोष से रकम लिया है जो सार्वजनिक हुआ है । हद तो तब हो गई जब सांप पालने के लिए झलनाथ जी ने सरकारी कोष से लाखों रकम लिया । विडम्बना तो यह है कि जब एक गरीब जनता जीविका चलाने के लिए अपने घर पर कर्जा लेते हैं और कर्जा नहीं चुका पाने के कारण उस गरीब का घर नीलाम हो जाता है परन्तु एक शासक जब चाहे तब सरकारी कोष को खाली कर सकता है । ओली जी भी अपने इलाज के नाम पर सरकारी कोष से लाखों लिए हैं और एक गरीब सिटामोल के बगैर मर रहा है । यही हमारे देश की वास्तविकता है । इसलिए तो एकबार कुर्सी पर बैठने के बाद कोई उतरना नहीं चाहता है ।
नागरिकता और पासपोर्ट विवाद के बाद रास्वपा के मन्त्रीगण सरकार से वापस चले गए हैं परन्तु सरकार को दिया समर्थन यथावत ही है । उन्हें ज्ञात है कि समर्थन वापस लेने के बाद भी सरकार को किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ेगा । इस प्रकार की प्रक्रिया विगत में भी होती आई है इसलिए यह परम्परागत संस्कार है । देश विकास का विगुल फूंकने वाले भी कुर्सी की चकाचौंध से प्रभावित हो ही जाते हैं । सच में यह राजनीतिक कुर्सी किसी जादुई कुर्सी से कम नहीं है ।

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समग्र में राजनीति में लम्बी राजनीतिक आन्दोलन का एक इतिहास होता है । समाज की आवश्यकता और मांग के अनुरूप ही किसी पार्टी का जन्म होता है । कभी भी किसी भी वक्त कोई पार्टी खोलना सर्वथा अनुचित होता है । वैसे तो पुरानी पार्टियों की अकर्मन्यता के कारण ही जनता का झुकाव नई पार्टियों के तरफ होता है क्योंकि जनता की अपेक्षा यह रहती है कि उसे अपने अधिकार से वंचित नहीं किया जाय । उसे वह सारी सुख सुविधाएं मिले जिसका वह हकदार है । सोचने वाली बात यह है कि जिस पार्टी के पास खुद का कोई राजनीतिक सिद्धान्त, विचार, एजेन्डा, कार्यक्रम, कार्यदिशा और कार्ययोजनाएं ही नहीं है और न ही आन्दोलन तथा निवेश का इतिहास ही तो वह जनता के हित के लिए क्या करेगी ? जो भी हो यहां सब को अपने अपने पद की पड़ी है, जनता के लिए कौन बोलेगा ? जनता को भी अपने हक और अधिकार का ज्ञान होना चाहिए ताकि अपने लिए स्वयं आवाज उठा सके । सत्ता और शासन सुख भोगने के लिए नहीं होता है यह तो दबे, पिछड़े और पीडि़तों के कल्याण के लिए होता है ।

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अंशु झा

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