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लावण्यवती : वसन्त लोहनी

 

वक्त गुजर चुका है
अब बचा कुछ नही
राह विलुप्त हो चुकी
लेकिन मैं ढूंढ रहा हूं
वही चाहत
जो परछाई बने चल रही है
कभी नजदीक दिखाई देती है
तो कभी बहुत दूर

बदलती धूप छाया
बदलती मेरा शरीर
लेकिन चाहत बिल्कुल बदली नहीं
अपने पेट के बल पर में चल रहा हूं
लेकिन चाहत –
वह तो और बलवान हो रही है

अब लग रहा है मुझे
सब चीज गुजरती है
लेकिन चाहत गुजरती नहीं
और लावण्यवती हो जाती है

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वसन्त लोहनी, काठमाण्डू

पानीपोखरी, काठमाण्डौ

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