उपेंद्र यादव व सीके राउत बारा-2 का उपचुनाव : जय प्रकाश गुप्ता के विचार
3 years ago
मुरलीमनोहर तिवारी (सीपू) प्रस्तुत कर्ता, बीरगंज ।
बारा विधानसभा क्षेत्र संख्या 2, आप दूसरे उपचुनाव को कैसे देख रहे हैं?
– किसी भी लोकतांत्रिक देश में इस तरह के उपचुनाव का कोई राष्ट्रीय महत्व नहीं होता है। इसका महत्व केवल इस अर्थ में है कि लोगों ने वर्तमान सत्ताधारी दल को किस रूप में देखा है। एक अर्थ में, यह एक आवधिक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। यह उपचुनाव चाहे भारत का हो, बांग्लादेश का हो या कहीं का हो। लेकिन अब तीन संसदीय क्षेत्रों में चुनाव होने जा रहे हैं, जिसके परिणाम से लोगों की राय सामने नहीं आ सकती है। सही राय भी नहीं बता पाते। इस चुनाव के परिणामों को देखते हुए, प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार कितनी लोकप्रिय है, या यदि उपेंद्र यादव जीतते हैं तो उनकी पार्टी कितनी लोकप्रिय है, या नेपाली कांग्रेस तनहु में जीतती है तो कांग्रेस की लोकप्रियता की स्थिति क्या है, यह सटीक रूप से नहीं कहा जा सकता है अनुमानित मात्र हो सकता है क्योंकि एक कॉकस गठबंधन बनाकर इस चुनाव को कराया जा रहा है। बारा में अगर उपेंद्र यादव जीतते है तो नैतिक या तथ्यात्मक रूप से वे यह दावा नहीं कर सकते कि यह उनकी लोकप्रियता है।
उपेंद्र यादव अगर बारामा जीत जाते हैं तो क्या यह उनकी या उनकी पार्टी की लोकप्रियता नहीं मानी जाएगी ?
– उनकी विरोधी ताकतों ने भी उनका साथ दिया है। जसपा के दस्तावेज में एमाले, माओवादियों और नेपाली कांग्रेस के विचारों को देखें तो उन्होंने नेपाली कांग्रेस को सबसे घटिया पार्टी बताया है। मैंने जसपा के अधिवेशन द्वारा पारित दस्तावेज़ के बारे में बात की। लेकिन अब कांग्रेस उग्र है और उसने उपेंद्र यादव को जिताने के लिए उर्दी जारी कर दी है। उन्होंने कहा है कि अगर उनका कोई कार्यकर्ता कुछ भी गलत करता है तो उसे बाहर कर दिया जाएगा। उपेंद्र यादव जिस एमाले को अपने दस्तावेज में अच्छा बताते हैं, वह एमाले उनके खिलाफ है। ऐसे में अगर उपेंद्र यादव जीतते हैं तो जसपा की लोकप्रियता का पैमाना इस चुनाव से नहीं आंका जा सकेगा।
बारा 2 में आप उपेंद्र यादव की हालत को कैसे देखते हैं?
– इस चुनाव में उपेंद्र यादव निरीह पात्र के रूप में नजर आ रहे हैं। यदि तालाब की मछली को तालाब का पानी न मिले तो उसके जीवन का कोई अर्थ नहीं है, वह जल्दी मर जाती है। उपेंद्र यादव 2064 साल के बाद नेपाल की संसदीय राजनीति में एक मजबूत खिलाड़ी बन गए हैं। इसलिए उपेंद्र यादव की मंजिल सत्ता और संसदीय राजनीति है। जब उपेंद्र यादव पांच महीने के लिए संसद से बाहर होने से आकुल-ब्याकुल हो गए है। उन्होंने अपनी पार्टी के एक होनहार व्यक्ति रामसहाय यादव को उपराष्ट्रपति बनाने के लिए काफी प्रयास किए और उस रिक्त पद पर चुनाव लड़ने गए। कहा कि संसदीय राजनीति उनका अभिष्ट है और उस अभिष्ट को पूरा करने का ठिकाना बारा 2 है।
वह बारा 2 में कितने सहज हैं?
– यह वहां के मतदाताओं के लिए सहज-असहज होने की बजाय सोचने की बात है। पिछले चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो यह बहुत आसान नहीं लग रहा है। लेकिन उपेंद्र यादव ने इस चुनाव में चुनावी राजनीति में जीतने के लिए हर हथकंडा अपनाया है। बारा में उन्होंने अपने आपको इस तरह पेश किया है कि अगर वे संसद में नहीं जाएंगे तो संघवाद खत्म हो जाएगा, संसद में मधेश का अस्तित्व नहीं रहेगा, उन्होंने खुद को एक अपरिहार्य व्यक्ति के रूप में पेश किया है। इसका सही आकलन बारा 2 के वोटर करेंगे।
आपने 4 नवंबर को आम चुनाव की पूर्व संध्या पर कहा था कि उपेंद्र यादव की हार मधेश की बड़ी जीत होगी. इस हिसाब से उन्हें दोगुने से ज्यादा वोटों से हार मिली थी। क्या मधेश जीत गया?
– यह मेरी अपेक्षा थी। मुझे उम्मीद थी कि अगर वे संसद से बाहर रहकर मधेश के मुद्दों को नेतृत्व देंगे और दोबारा ईमानदारी से राजनीति करेंगे तो मधेश को फायदा होगा, लेकिन इन पांच महीनों में उन्होंने ऐसा कोई व्यवहार नहीं दिखाया। मैंने सप्तरी के मतदाताओं से उन्हें चुनाव में हराने का अनुरोध किया। यदि वह हार जाते है, तो कृप्या मधेश आंदोलन के लिए फिर से काम करें। सप्तरी के मतदाताओं ने उन्हें हरा दिया। जिस मकसद से सप्तरी के मतदाताओं ने उन्हें मात दी, उपेंद्र यादव उस मकसद के लिए काम करते नजर नहीं आए। अब मैं बारा के बारे में नहीं कह सकता। मैं सुन रहा हूं कि उन्होंने बारा में दो जातियों का समीकरण बना लिया है। उन्होंने निर्णायक शक्तियों को भी अपने अनुकूल बनाने का प्रयास किया है। उन्होंने उस पार्टी के सामने घुटने टेक दिए हैं जिसके साथ उनका पानी बराबर था। मैंने यहां तक सुना है कि कांग्रेस का समर्थन हासिल करने के लिए उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि वे इस चुनाव के बाद मधेश प्रदेश की सरकार का नेतृत्व कांग्रेस को सौंप देंगे। वह ऐसे कई तिकड़म और पहल कर चुनाव मैदान में हैं। मुझे नहीं पता कि इसका परिणाम क्या होगा। क्योंकि मैं सप्तरी के मतदाताओं के मन की बात समझ सकता हूं, बारा के मन की बात अभी तक समझ में नहीं आई।
जब उपेंद्र यादव सप्तरी में चुनाव हार गए, तो उन्होंने शिकायत की कि राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय ताकतों ने उन्हें हरा दिया है। क्या सप्तरी में राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय ताकतों का प्रभाव था?
उपेंद्र यादव का अपनी हार में यह कहना कि मैं स्थानीय और विदेशी ताकतों से हार गया, बहुत अनैतिक होगा। एक बार फिर, उन्हें सप्तरी के लोगों के प्रति अनास्था और अपमानजनक माना जा सकता है। नवंबर को अभी पांच महीने ही हुए हैं। अगर कोई विदेशी ताकत सप्तरी में उपेंद्र यादव को हराने जा रही थी और उपेंद्र यादव को हारना नहीं चाहिए था, तो क्या अब राजनीति में ऐसा बदलाव आ गया है कि वे ताकतें बारा में उपेंद्र यादव को हराने वाली नहीं हैं ? उपेंद्र अब कहते हैं कि बारा में वह शक्ति भी पहुंच गई है। अगर उपेंद्र ने भारत की ओर इशारा किया होता तो उन्हें अब बाराबासी को बता देना चाहिए था। हारकर कल फिर यही कहेंगे। हाल ही में उपेंद्र यादव ने भारतीय राजदूत और प्रमुख कर्मचारियों से मुलाकात की, मदद मांगी और उन्होंने उन्हें आश्वासन भी दिया। इसलिए उपेंद्र यादव ने सप्तरी में जो कहा, उस पर विश्वास करने का कोई आधार नहीं है। उन्होंने मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए ऐसी बातें कहीं। ऐसी स्थिति सप्तरी में नहीं थी। सप्तरी के मतदाताओं ने उन्हें वोट नहीं दिया।
संसद में उपेंद्र यादव की मौजूदगी जरूरी है या नहीं?
देखिए, हाल ही में माधव नेपालजी बारा 2 गए थे। उन्होंने कहा कि संसद में उपेंद्र यादव जैसे नेतृत्व की जरूरत है। उन्होंने कहा कि मधेश के लिए संसद में उपेंद्र जैसा व्यक्तित्व चाहिए, इसलिए बारा के मतदाता उपेंद्र को जिताएं। उपेंद्र यादव 2064 से लगातार संसद में हैं। उन्होंने सभी दलों को सहयोग किया और सरकार में बैठे। उसके बाद कल संसद में उपेंद्र यादव ने मधेश या देश के लिए क्या भूमिका निभाई ? वे रात तक केपी ओली की सरकार में मंत्री रहे और सुबह होते ही प्रचंड की सरकार में मंत्री बन गए। संसद में रहते हुए उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में क्या भूमिका निभाई ? उपेंद्र यादव उन चंद लोगों में से एक हैं जो 2064 साल बाद लगातार संसद में बैठे हैं। संसदीय उपस्थिति पर नजर डालें तो उपेंद्र यादव की संसद में उपस्थिति पार्टी के तमाम नेताओं से कम है। वह संसद में कभी-कभार ही बोलते थे। अब उन्होंने अपनी अहमियत दिखाने के लिए माधव नेपाल से आग्रह करके कहवाया। इस बीच भले ही वे पांच महीने से संसद में नहीं बैठे हैं, लेकिन तमाम संसदीय खेलों में हिस्सा ले रहे हैं। उन्होंने प्रदीप यादव को मंत्री बनने से रोकने के लिए अशोक राय को मंत्री बनाया। उन्होंने बारा जिले में चुनाव लड़ने के लिए रामसहाय यादव को उपराष्ट्रपति बनाया। अशोक राय को संसदीय दल का नेता न बनाने के लिए रामसहाय यादव को उस समय पार्टी का नेता बनाया था। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष के तौर पर संसदीय दल की बैठक में हिस्सा लिया है। इसलिए जब उपेंद्र यादव संसद जाएंगे तो आसमान उल्टा हो जाएगा, कल से मधेश की जय-जयकार होगी, ऐसी कोई स्थिति नहीं है। इसलिए यह सामान्य उपचुनाव है, उपेंद्र के जीतकर संसद में जाने से कोई बड़ा बदलाव या बड़ी उथल-पुथल नहीं होने वाली है।
क्या संघवाद, गणतंत्र और मधेश के एजेंडे की रक्षा के लिए उपेंद्र यादव संसद में अपरिहार्य हैं?
अगर संघवाद और गणतंत्रवाद को कोई चुनौती है तो वह चुनौती आज अचानक पैदा नहीं हुई है। पांच महीने पहले जब उपेंद्र यादव संसद में थे तब भी वह एक चुनौती थी। गणतंत्र-विरोधी और संघीय-विरोधी ताकतें उस समय भी संसद में थीं और उन्होंने संसद को प्रभावित किया। इसलिए यह भ्रम मात्र है कि यदि उपेंद्र यादव आज संसद में जाते हैं तो संघवाद और गणतंत्र पर से संकट समाप्त हो जाएगा। अगर उपेंद्र यादव संसद भी चले जाएं तो भी कोई सुधार नहीं होगा। अगर उपेंद्र यादव संसद पहुंचे तो उपेक्षित मधेश के मुद्दे रातों-रात जाग जाएंगे और शेर बहादुर देउबा, प्रचंड, माधव नेपाल, केपी ओली मधेश के मुद्दों को उठाएंगे। मधेश मुद्दे को नजरअंदाज करने वाली ताकतें कांग्रेस, माओवादी और एमाले हैं। चुनाव से कुछ समय पहले उपेंद्र यादव ने एमाले अध्यक्ष केपी ओली से मुलाकात की और उनका समर्थन मांगा। अगर वे जीत जाते है तो ऐसी कोई स्थिति नहीं है जहां वे कह सके कि वे अपने बल पर जीते है। उन्हें कांग्रेस और माओवादियों के सामने सिर झुकाना होगा। उसके बाद उपेंद्र यादव के संसद जाने से कोई उम्मीद नहीं है। उपेंद्र यादव खुद को संघवाद के पिता के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। ऐसी कोई स्थिति नहीं है जहां उपेंद्र यादव संसद जाएंगे और कोई बदलाव होगा, संघवाद टलेगा या खतरा टल जाएगा। बात सिर्फ इतनी है कि उपेंद्र यादव मधेश के वोटरों को ऐसे लॉलीपॉप खिलाने की कोशिश कर रहे हैं जैसे किसी बच्चे को लॉलीपॉप खिलाया जाता है।
डॉ. सीके राउत की पांच महीने की संसदीय यात्रा को आपने कैसे देखा है?
सीके राउत भी मौजूदा सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा हैं। उन्होंने उपेंद्र यादव के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा है। यह स्वाभाविक है। क्योंकि सीके राउत अब मधेश में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस साल लोसपा ने उपेंद्र यादव का समर्थन किया है। इसलिए ऐसा लगता है कि सीके राउत मधेश की राजनीति को उपेंद्र यादव के पक्ष में और विपक्ष में ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रहे हैं। यह भी सीके राउत की सोची समझी रणनीति है। अब वह इसमें सफल हो गए हैं। उपेंद्र यादव बनाम सीके राउत बारा उपचुनाव में चल रहा है। शिवचंद्र कुशवाहा चरित्र के तौर पर केवल प्रत्याशी हैं। पूरा खेमा उपेंद्र यादव के पक्ष में है, जातिवादी सत्ता, पैसा, पूरी सत्ता गठजोड़ उपेंद्र यादव के पक्ष में है। दूसरी ओर सीके राउत कुछ नए नारों के साथ चुनावी मैदान में हैं, यह सोचकर कि उपेंद्र यादव को हराकर मधेश में मेरा स्थान बढ़ जाएगा। यह एक स्वाभाविक प्रतियोगिता है। उपेंद्र यादव के साथ चुनाव लड़ना आसान नहीं है। इसलिए उपेंद्र को चुनाव में हराने के लिए सीके राउत द्वारा कही गई कुछ बातें गलत और अनुचित रही हैं। हालांकि, उन चीजों को किए बिना उपेंद्र यादव को हराया नहीं जा सकता।
मधेश की राजनीति में उपेंद्र यादव और सीके राउत को एक दूसरे के कट्टर विरोधी के तौर पर देखा जाता है। यह मधेश की राजनीति को कहां ले जाता है?
– जहां मधेश की राजनीति खत्म होगी, वह दूसरी जगह है। लेकिन सीके राउत ने उपेंद्र यादव से बहुत कुछ सीखा है। सीके राउत उपेंद्र यादव की राजनीति से सीख रहे हैं। उपेंद्र यादव ने लोसपा का अंत किया। क्योंकि उपेंद्र यादव अच्छी तरह जानते थे कि लोसपा के इस रूप में रहने तक उनकी पार्टी मजबूत नहीं होगी। इसलिए वे एक ओर विभिन्न आंदोलनों में मोर्चा बनाते थे और दूसरी ओर नेताओं और कार्यकर्ताओं की चोरी करते थे। उपेंद्र यादव की रणनीति थी लोसपा को कमजोर करना। इससे उपेंद्र यादव और मजबूत हो गए। सीके राउत ने अब वही रणनीति अपनाई है। सीके राउत ने भी हिसाब लगा लिया है कि उपेंद्र यादव को कमजोर किए बिना मेरी पार्टी मजबूत नहीं होगी। लोसपा उपेंद्र यादव के साथ डंडे के दम पर भी कमजोर रही, लेकिन सीके राउत ने एक छोटा उग्र दल भी बनाया है। उपेंद्र यादव के लोगों में सीके राउत के लोगों पर हमला करने की हिम्मत नहीं है। सीके राउत उपेंद्र के घर गए और उन पर हमला किया। इसलिए सीके राउत उपेंद्र से सीख रहे हैं कि मधेश में किस तरह की राजनीति की जाती है। बारा के चुनाव से ज्यादा उथल-पुथल नहीं होगी लेकिन मधेश की राजनीति इसी तरह आगे बढ़ती रहेगी।
बारा 2 में अगर उपेंद्र यादव की हार हुई तो उनके राजनीतिक जीवन में क्या झटका लगेगा? क्या संन्यास लेने की स्थिति होगी?
-उपेंद्र यादव राजनीति से क्यों सन्यास लेंगे ? आज चुनाव हार गए, अब उपचुनाव हार गए तो रिटायर होने का सवाल ही नहीं होगा। वह कहेंगें कि मैं मैथिली व्यक्ति हूं, मैं वहां गया था जहां भोजपुरी भाषा है और बारावासी मेरी भाषा नहीं समझते थे। वह यह भी कह सकते है कि विदेशी शक्ति ने सप्तरी से मेरा पीछा किया और बारा में भी मेरा साथ नहीं छोड़ा। वे यह भी कह सकते हैं कि सीके राउत ने यूरोप से पैसे लाकर मुझे हरा दिया। वे चतुर आदमी है, कोई कारण बना लेंगे लेकिन उनकी पार्टी उनकी बनी हुई है। उनकी पार्टी में ऐसा कोई नहीं है जो उनके नेतृत्व को चुनौती दे सके। सब उसके आदमी हैं। इसलिए उपेंद्र यादव भले ही सांसद न बनें, लेकिन वह जैसे हैं वैसे ही रहेंगे, थोड़ा मनोबल गिराना, बस इतना ही हो सकता है।

