अजय कुमार झा, जलेश्वर ।
वर्तमान में होने जा रहे उपचुनाव में जिस प्रकार से जातीय और क्षेत्रीय दबाव बनाया जा रहा है; इससे कुछ बिंदु पर विचार विमर्श करने की आवश्यकता दिख रही है। नेपाल के लोकतंत्र का सबसे दुखद पक्ष यह है कि यहां के राजनीतिक दल का ढांचा प्रारंभ से ही अलोकतांत्रिक रहा है। जिस प्रकार यूरोप मे हिटलर, मुसोलिनी, लेनिन अधिनायकवादी थे उसी प्रकार नेपाल में कांग्रेस, एमाले, राप्रपा, माओवादी, मधेसावादी दल के सभी नेताओं का चरित्र तानाशाही और शक्ति केंद्रित देखा गया है। हर हाल में पार्टी और सरकार को अपना कब्जा रखना ही इनका उद्देश्य है। व्यक्तिगत सत्ता से बढ़कर इनके लिए न देश है न देशवासी। राजनीतिक दल एक परिवार जैसा होता है। जब हम अपने परिवार में ही प्रजातांत्रिक नही हैं तब सरकार और समाज में कैसे प्रजातांत्रिक रह सकते हैं।
नेपाली लोकतंत्र की दूसरी कमजोरी यह है कि जब राजा के विरुद्ध आंदोलन चला तब तानाशाही रवैया, देश को राजा द्वारा लूटे जाने की बात, कानून को अपने अधीन कर भ्रष्टाचार की बात ; यह जनभावना के केंद्र में थी। लेकिन उससे भी बदतर हालात में इन नेताओं ने जनता को जीने के लिए मजबूर कर दिया है। सर्वसहमति के आधार पर खुलेआम भ्रष्टाचार करना, न्यायालय को अपने अधीन रहने को मजबूर करना अब आम बात हो गयी है। न कांग्रेस का समाजवाद कहीं दिखता है न वामपंथियों का साम्यवाद। न मधेसियों का मधेसवाद जिंदा है न राप्रपा का हिंदुत्व और न राष्ट्रीयता कही दिखती है।
नेपाली लोकतंत्र की तीसरी कमजोरी यह है कि यहां के तथाकथित लोकतांत्रिक नेताओं ने अंग्रेजों द्वारा प्रतिपादित ‘ फूट डालो राज करो के सिद्धांत ‘ को कभी पहाड़ी – मधेसी के नाम से, कभी जातीयता के नाम से तो कभी भाषा और संस्कृति के नाम से गांव से लेकर राजधानी तक के मानवीय संवेदना और सामाजिक सद्भाव को तोड़ने में सफल रहे हैं। आज देश इस तरह टूट गया है कि यहां की सरकार विदेशी के हाथों की कठपुतली बनकर रह गई है।
नेपाली प्रजातंत्र की चौथी कमजोरी के रूप में ज्वलंत विषय कण कण में व्याप्त भ्रष्टाचार है। पहले भी सभी दल सेठ और उद्योगपतियों से पैसे लेते थे और आज भी यह प्रचलन है। साथ ही सर्वदलीय समझदारी के तहत खुलेआम भ्रष्टाचार करने के नयी परिपाटी का आविष्कार विश्व राजनीति में नेपाली नेताओं ने ही किया है। जिसमे आम नागरिक के अलावा देश के सभी पक्ष एकमत से सक्रिय भूमिका निर्वाह करते हुए राष्ट्र की गरिमा को और शहीदों के महिमा को शोभायमान करते रहते हैं।
नेपाली लोकतंत्र की पांचवी दुर्घटना है सत्ता का केंद्रीयकरण। प्रधानमंत्री अपने मंत्रीमंडल से ज्यादा ताकतवर दिखाई देना। यही हाल मुख्यमंत्री का है। संसद और विधानसभा व्यक्ति के आगे बौना हो गया है। प्रशासनिक पद भी इसी प्रकार केंद्रीयकृत है। पालिका में प्रमुख सब पर हावी है। पार्टी के अध्यक्ष बाकी लोगों पर हावी हैं। पहाड़ी लोग मधेसी पर हावी हैं। इस तरह तानाशाही व्यवहार के भीतर गौरवशाली लोकतंत्र संस्कारित हो रहा है।
नेपाली लोकतंत्र की छठवीं समस्या है हमारा समाज, नागरिक समाज को जिस मजबूती के साथ सक्रिय भूमिका निर्वाह करना चाहिए था वो नहीं हो पाया है। हम जातीय और क्षेत्रीय घेरा के कारण अन्याय का विरोध करने में असफल रहे हैं। जातीय, क्षेत्रीय और सांस्कृतिक समीकरण और अंध उन्माद के कारण हमने कभी उत्तम विचार को अपने भीतर पनपने ही नहीं दिया। अच्छे लोगों को सम्मान करने और मजबूत बनाने में हमने सदा कंजूसी की है। हमने बौद्धिकता का गला घोटने में ही अपनी बहादुरी समझी है। जिसका खामियाजा अब तीसरी पीढ़ी भुगतने को मजबूर है। अरब के रेगिस्तानों में अपनी जवानी को खाक करने को विवश है।
नेपाली लोकतंत्र की सातवीं कमजोरी यह है कि हम मूढ़ रूढिवादी हैं। जो देश और जनता के समृद्धि और स्वाभिमान के लिए बलिदान हुए उनकी स्मृति और सम्मान में जो कार्य होना चाहिए था वह देश बेचुवा, भ्रष्ट और षडयंत्रकारियों के लिए किया जा रहा है। कुछ लोग भारत विरोधी धार में बहे जा रहे हैं तो कुछ लोग चीन विरोधी धार में। कुछ लोग बिना अध्ययन किए अपनी संस्कृति और इतिहास को गाली देते हैं तो कुछ लोग माओ, मार्क्स, लेलीन, लोहिया, गांधी आदि को अपना आदर्श मान बैठे हैं। इनमे कहीं भी नेपालीपन नही है; लेकिन इनकी मूढ़ता और रूढ़िबादिता पर सब के सब मौन है। इन्हें मंदिर के घंटी से कान में दर्द होता है, जबकि होली वाइन से प्रज्ञा चक्षु खुलता है।
नेपाली लोकतंत्र की आठवीं कमजोरी यह है कि ज्ञान गुण की देवी सरस्वती और बुद्धि के देवता गणेश को भी किसी ने नहीं छोडा है । सब के सब लक्ष्मी के प्यारे हो गए हैं। आत्म स्वाभिमान, पारिवारिक संस्कार, सामाजिक आचार और राष्ट्रीय गरिमा को भी हम लक्ष्मी के आगे गर्व के साथ बेचने को तैयार रहते हैं। विदेश पलायन होना उच्चतम उपलब्धि का द्योतक बनते जा रहा है। लक्ष्मी के लोभ में दुष्ट के हाथों अपनी मताधिकार को बेचने में शर्म तक नहीं होता है हमें। मुफ्त के दारू मांस में हम अपनी अस्तित्व को गिरबी रखने से नही कतराते हैं। और देश में, समाज में सुव्यवाथ खोजते हैं। शायद इससे बड़ी मूढ़ता और क्या हो सकती है!


