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संस्मरण शहीद राम-लक्ष्मण दोनों भाई

 

डा. उमारानी सिंह:शहीद राम-लक्ष्मण दोनों भाई को कौन नहीं जानता । एक-से बढÞकर एक, सही माने में राम-लक्ष्मण एक साथ जन्म, एक साथ मरण । माँ ने सोच समझकर नाम रखा था, राम-लक्ष्मण । मैं तो हैरान हो जाती दोनों को देख कर, कौन राम, कौन लक्ष्मण । अर्थात् दोनों भाई जुडÞवाँ थे ।
मैंने पहले न देखा था, न सुना था । बात यह हर्ुइ कि दरभंगा डेरे पर मेरे पति एक साथ दो नवयुवकों को लेकर आए और परिचय कराते हुए बोले- यह दोनों भाई राम-लक्ष्मण हैं, कुछ दिन यहीं तुम्हारे साथ रहेंगे । बात आईर्-गई हो गई । कुछ दिन रह कर मेरे पति चले गए । मैं भी अपना कर्तव्य करती रही, दोनों भाई को खिलाती-पिलाती । कभी-कभी मजाक करती, आप दोनों भाई में कौन राम है और कौन लक्ष्मण, मैं तो पहचान ही नहीं पाती । कोई ऐसा चिन्ह बतलाएँ, जिससे मैं पहचान सकँू कि आप राम है ओर आप लक्ष्मण ! दोनों भाई ठठा कर हँस देते- “भाभी भी धोखा खा गई, इतने दिन में भी पहचान नहीं पाई” और फिर कोई निशानी मुझे बतलाई ।
करीब एक महीना दोनों भाई मेरे साथ रहे, फिर नेपाल चले गए । इस बीच दोनों भाई की सज्जनता और व्यवहारिकता से मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी । अपनी कहानी बताते हुए उन्होंने जो कहा- वह स्मरणीय है, भुलाने योग्य नहीं है । सच है, स्मृतिर् इश्वर ने अनोखी चीज बनाई है । स्मृति हमारे जीने का सहारा बन जाती है र्।र् इश्वर स्मृति नहीं बनाते तो सृष्टि का क्रम नहीं चलता । तो उन्होंने बताया- “भाभी हम जेल से भाग कर आए हैं । हमारे जीवन का क्या ठिकाना है – जेल से भागे हुए आदमी है, कब बुलावा आ जाए, कब गोली चल जाए । आपसे बहुत प्यार मिला, फिर आपसे भेंट हो अथवा नहीं । मुझे उस समय क्या पता कि उनके अन्तर की यह आवाज थी । वे गए और लौट कर नहीं आए, भगवान को प्यारे हो गए थे । मैंने उन्हें टोका था- “आप लोगों को जेल से भाग कर आने की क्या आवश्यकता थी । ” उन्होंने कहा- “भाभी हम ने देशद्रोह का काम किया था, जीवन भर जेल में रहना था, उससे अच्छा हुआ कि भाग आया । अब पार्टर्ीीा आर्डर आया है, तो जाना ही पडÞेगा । मेरे पति भी नेपाली कांग्रेस में थे, मैं उदास हो गई । ऐसे अवसर पर जब कभी मैं उदास हो जाती तो राम-लक्ष्मण दोनो भाई मुझे समझाते हुए कहते- “भाभी आप क्यों उदास होती हैं, भैया रहेंगे, मन्त्री बनेंगे, और आप लोग सत्ता का सुख भोगिएगा, नेपाली कांग्रेस में दो ग्रुप हो गया है, भैया राजा से समझौता वाले ग्रुप में हैं, और हम लोग क्रान्तिकारी गु्रप में । हम लोग तो जान हथेली पर लिए हुए हैं, मरना ही है ।
उस समय अपनी-अपनी नीति के अनुसार नेपाली कांग्रेस में ‘सुवर्ण्र्ाामशेर’ और वी.पी. कोइराला की दो पार्टर्ीीन गई थी । देश को बचाने के लिए सुवर्ण्र्ाामशेर की नीति राजा से मेल-मिलाप करने और देश में रह कर राजनीति करने की थी, तो वी.पी कोइराला की नीति आन्दोलन करने ओर मर मिटने की थी । इसी आन्दोलनकारी नीति की आशा के तहत राम-लक्ष्मण देश के अन्दर आए और मारे गए ।
मैंने सुना, मेरी आँखों की नींद उडÞ गई, दोनों भाई को मैं कभी भूल नहीं पाती । कभी लगता कि दोनों भाई को खाना खिला रही हूँ तो कभी लगता कि बातें कर रही हूँ । इस तरह मैं कुछ दिन उनकी स्मृति में जीने लगी, फिर्रर् इश्वरीय विधान के अनुसार धीरे-धीरे भूलने लगी र्।र् इश्वर ने स्मृति बनाई है, तो विस्मृति भी अनोखी ही चीज बनाई है । एक बार राम-लक्ष्मण की माँ से मिलना चाहती हूँ । देखूँ वह दिन कब आता है । अच्छा हुआ कि दोनों की शादी नहीं हर्ुइ थी । नहीं तो पत्नी होती तो बेमौत मर जाती ।
अन्त में उन अमर शहीदों को समर्पित हैं यह श्रद्धाञ्जलि-
प्रयाण-गीत
सब ओर मचाया क्यो क्रन्दन है –
मन का गीत हर कम्पन है !!
प्रजातन्त्र का सच्चा प्रहरी,
आज अचानक चला गया ।
हमें आज सत्ता के ही,
निष्ठुर हाथों छला गया ।
इसीलिए मच रहा चातर्ुर्दिक,
महाघोर, यह क्रन्दन है,
मन का गीत हर कम्पन है । ।
सत्ता को तो न्याय चाहिए,
किन्तु वही, जब अन्यायी
तो कैेसे समाज समुन्नत,
और मनुष्य, बने न्यायी ।
इसीलए मच रहा चातर्ुर्दिक,
महाघोर, यह क्रन्दन है !
मन का गीत हर कम्पन है ।
श्रद्धा में अर्पित करते हम,
अपने आँसू के दो फूल !
औ शत वार नमन करते हम,
ले चरणों के पावन धूल !
मरण सत्य है, औ स्वतन्त्र है,
जीवन तो एक बन्धन है !!
मन का गीत हर कम्पन है !
सब ओर मचा क्यों क्रन्दन है –
मन का गीत, हर कम्पन है !!

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