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हिंदी के प्रति सांसदों की प्रतिबद्धता, नेपाल की राजनीति में हिंदी का अंत:सम्बन्ध, परिचर्चा

 

 

डिल्लीराम शर्मा, काठमांडू, २९ वैशाख । आज दिनांक १२ -०५-२०२३ हिंदी केंद्रीय विभाग, त्रिभुवन विश्वविद्यालय कीर्तिपुर के सिनास हॉल में ‘नेपाल की राजनीति में हिंदी का अंतरसंबंध’ विषय में परिचर्चा का कार्यक्रम संपन्न हुआ । कार्यक्रम में हिंदी केंद्रीय विभागाध्यक्ष डॉ. संजीता वर्मा ने ‘नेपाल की राजनीति में हिंदी का अंतरसंबंध ः एक विहंगम दृष्टि’ शीर्षक पर कार्य पत्र प्रस्तुत किया । प्रस्तुत कार्य पत्र में डॉ. वर्मा ने हिंदी की विगत की स्थिति और वर्तमान स्थिति के बारे में सबको अवगत कराया । उन्होंने बताया कि – हिंदी का कल सुखद था नेपाल के राजाओं ने भी हिंदी भाषा को महत्व दिया था और हिंदी भाषा में रचनाएं की थीं । उसके बाद आधुनिक काल के नेपाली कवियों ने भी हिंदी को सम्मान दी थी । इस तरह अभिलेख, प्रशासन, व्यापार, संचार, मनोरंजन, शिक्षा आदि में हिंदी की स्थिति सम्मानजनक थी । यहां तक कि आज से करीब ६० – ७० साल पहले तक नेपाल में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक हिंदी माध्यम से शिक्षा दी जाती थी । हिंदी को लेकर कोई विवाद व समस्या नहीं थी । परंतु राजनीतिक परिवर्तन के बाद राष्ट्रीय शिक्षा योजना आयोग की स्थापना हुई तब से हिंदी की स्थिति दयनीय बनती गई । डॉ. वर्मा ने हिंदी से संबंधित कुछ समस्याओं को इस प्रकार से उजागर किया था –
स्कूलों में हिंदी भाषा का पठन पाठन न होना,
– विशेषकर तराई मधेश के स्कूल–कॉलेजों में विद्यार्थियों का अभाव,
– हिंदी भाषा को विदेशी भाषा समझने की भूल और हेय दृष्टि से देखना,
– हिंदी पढ़ने वालों के लिए नेपाल में रोजगारों का अभाव,
– भारत के अनेक विद्यालयों में अंग्रेजी की मान्यता नहीं है, विशेषकर बिहार, यू.पी के विश्वविद्यालयों में, जबकि टी.यू में उस विश्वविद्यालय की मान्यता है लेकिन अंग्रेजी नहीं होने के कारण वहां से आने वाली बेटियां यहां पढ़ना नहीं चाहती और यदि पढ़ती भी है तो अंग्रेजी नहीं होने के कारण इक्विवेलेंट करवाने और सर्टिफिकेट लेने में उन्हें अधिक परेशानी होती है,
– सुनने में आता है कि ‘हिंदी में बच्चे नहीं हैं तो इसे बंद कर देना चाहिए’ आदि, इत्यादि, जबकि मानविकी के १÷ २ विभागों को छोड़कर अनेक विभागों का कुछ बहुत यही हाल है,
– हिंदी केंद्रीय विभाग में भवन की आवश्यकता तो है ही लेकिन वर्तमान की आवश्यकता एक बाथरूम और लाइब्रेरी की है,
– छात्रवृत्ति, मोटिवेशनल टूर एवं अन्य शैक्षणिक गतिविधियों के लिए भारतीय दूतावास में प्रपोजल सहित पहल किया जा चुका है, लेकिन अभी तक कोई जानकारी नहीं आई है,
– विश्वविद्यालय की तरफ से भवन निर्माण हेतु जमीन उपलब्ध किया जा चुका है लेकिन बजट अभाव की वजह से काम आगे नहीं बढ़ पाता है‘ ।

कार्यक्रम में नेपाल के विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के सांसद एवं उनके प्रतिनिधि, साहित्यकार, विद्वानवर्ग आदि की सराहनीय उपस्थिति थी ।
डॉ. वर्मा ने सभी महानुभावों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्यों के बारे में बताया कि हिंदी भाषा के प्रति मतभेद न करके इसे सम्मानजनक स्थान प्राप्त हो । भाषा और साहित्य में राजनीति से संबंध होता है और संसद में हिंदी के महत्व को बताते हुए इसे सम्मानजनक स्थिति उपलब्ध प्राप्त हो, जैसे भाव को सभी सांसदों के बीच प्रस्तुत किया था ।
अपने विचारों को व्यक्त करते हुए स्वतंत्र सांसद अमरेश सिंह ने कहा कि साहित्य समाज का आईना है । साहित्य के माध्यम से ही साहित्यकार समाज का दिशानिर्देश करते हैं । उन्होंने आगे कहा कि समाज के साथ राजनीति का अटूट संबंध है । इसलिए राजनीति कर्मी अगर सच्चे मन से आगे आए तो हिंदी के प्रति बहुत काम किया जा सकता है । ‘एक हाथ से ताली नहीं बजती’ कहावत का प्रयोग करते हुए यह भी स्पष्ट करने का प्रयास किया कि कहीं न कहीं हम हिंदी भाषी या प्रयोगकर्ताओं भी की गलती है । हमें भी कुछ त्याग करना चाहिए, केवल दूसरों पर आरोप लगाकर हम भाग नहीं सकते । वैसे दलीय भागबंडा के ऊपर भी उन्होंने इंगित किया । अंत में उन्होंने सभी दलों के नेताओं को मिलकर हिंदी के विकास में कार्य करने के लिए अनुरोध किया । उन्होंने कहा कि मैं वचन देता हूं कि सरकार से अवश्य इसके संबंध में पहल करूंगा और हिंदी के विकास के लिए सहयोग करूंगा ।
दूसरे वक्ता जीवछ शाह, मधेशी आयोग ने कहा कि कार्यक्रम में कार्य पत्र के श्रवण से यह ज्ञात हुआ कि हिंदी के साथ ठीक वैसा ही व्यवहार किया जा रहा है जैसे कि बच्चे को जन्म देकर उसे खाने और पहनने के लिए कुछ न दिया हो । त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग खोलना और सुविधा की दृष्टि से कुछ भी उपलब्ध न करना, यह राज्य की हिंदी भाषा के प्रति अवहेलना है । वैसे भी नेपाली संविधान में सभी भाषाओं को सम्मान करने की बात लिखी गई है । पर हिंदी के साथ ऐसा नहीं दिखता है । उन्होंने आगे बताया कि इस कार्यक्रम में त्रिभुवन विश्वविद्यालय के पदाधिकारी भी होते तो कार्यक्रम आकर्षक होता । वहां उपस्थित सभी पार्टी के सांसदों की उपस्थिति पर खुशी व्यक्त करते हुए उन से अनुरोध किया कि राजनीति ही सभी समस्याओं का समाधान करती है । अतः आप लोग इस विषय को अपनी अपनी ओर से अवश्य विचार कीजिएगा ।
तृतीय वक्ता विनीता यादव (जसपा) ने कहा कि नेपाल में हिंदी भाषा लोप होने की अवस्था में है । विश्व में यह भाषा प्रसिद्धि पा रही है, परंतु नेपाल में इसके महत्व को अनदेखा किया जा रहा है । हमें हिंदी की रक्षा करनी चाहिए, इसके बारे में लिखना चाहिए क्योंकि तलवार से कलम ताकतवर होती है । उन्होंने ऐक्यबद्धता जाहिर की कि वे अपनी पार्टी में इस विषय को अवश्य रखेंगी और यह भी कहेंगी कि हिंदी संपर्क भाषा अवश्य होनी चाहिए । पाठ्यक्रम में भी कक्षा एक से एम.ए तक होनी चाहिए । यह एक प्राचीन भाषा है, इसकी उत्पत्ति पुरानी है ।
चतुर्थ वक्ता माधव सापकोटा ‘सुबोध’ (माओवादी) ने कहा कि विकिपीडिया से मुझे अवगत हुआ कि हिंदी भाषा विश्व में चतुर्थ स्थान में है । ऐसी महत्वपूर्ण भाषा वैसे भी अपने आप में काबिलेतारीफ है । हिंदी भाषा के प्रति आप लोगों के मर्म, गंभीरता और चुनौती का मैं महसूस करते हुए ऐक्यबद्धता जाहिर करता हूं । मेरा सुझाव यह भी है कि भाषा आयोग को भी इस विषय में अवगत कराया जाए । हिंदी पठन–पाठन में राज्य की ओर से ध्यान न देना यह बड़ी दुख की बात है और हम इस बात को अपनी पार्टी में अवश्य रखेंगे । स्थानीय तह से भी सहकार्य होना आवश्यक प्रतीत होता है । उन्होंने विद्यार्थी संख्या के लिए सामुदायिक कॉलेज के साथ संपर्क करने का सुझाव दिया । हिंदी और नेपाली एक दूसरे परिपूरक हैं । उन्होंने हिंदी के पठन–पाठन में अपना साथ और सहयोग होने की बात कही ।
सांसद मंगल प्रसाद गुप्ता ने अपने मंतव्य में कहा कि हिंदी भाषा के विकास में भारत के राजदूतावास को भी इंटरेस्ट लेना चाहिए । जिस प्रकार से भारतीय राजदूतावास नेपाल के विभिन्न संघ–संस्थाओं को बस व अन्य सामान देकर सहयोग करता है, तो हिंदी के लिए भी करना चाहिए । उन्होंने नेपाल में हिंदी का विकास पर्याप्त न होने का कारण रोजगार से भी जोड़ा । रोजगार हिंदी भाषा से संबंध हो तो फिर हिंदी अपने–आप ताकतवर हो जाएगी । उन्होंने हिंदी सांसदों से भी अनुरोध किया कि हिंदी कोई विदेशी भाषा नहीं है यह नेपाल की ही भाषा है । अतः हिंदी के प्रति हम सबको सद्भाव रखना चाहिए ।
छठे वक्ता थे किरण कुमार शाह (माओवादी) । उन्होंने कहा कि भाषा ज्ञान का भंडार है । हिंदी भाषा का अंतरसंबंध आज से नहीं प्राचीन समय से है । लोगों ने इसे हाशिए पर रखा है जो सांदर्भिक नहीं है । उन्होंने उपराष्ट्रपति परमानंद झा द्वारा हिंदी भाषा में शपथ ग्रहण की बात को भी उठाई कि किस प्रकार से लोगों ने हिंदी भाषा के प्रति हंगामा किया था । नेपाल में हिंदी भाषा के प्रति सम्मान होना चाहिए क्योंकि रोटी और बेटी ने भी इसे सुदृढ़ बनाया है । हिंदी भाषा को आगे बढ़ाना चाहिए, स्कूलों में पढ़ाई न होना बड़ी दुख की बात है । हिंदी के टीचरों को भी रखा जाना चाहिए और इसे ज्ञान के हिसाब से भी आगे बढ़ाया जाए ।
सातवें वक्ता थे ज्ञानू बस्नेत सुवेदी (माओवादी) । उन्होंने कहा – डॉक्टर संजीता वर्मा द्वारा प्रस्तुत कार्य पत्र ने मुझे गंभीर बनाया है । आप लोगों की जटिलता को समाधान करने के लिए मैं अपने स्थान से आवाज उठाऊंगा । त्रिभुवन विश्वविद्यालय में आरंभ से ही हिंदी का होना गर्व का विषय है ।
आठवें वक्ता थे राम प्रकाश चौधरी (लोसपा) । उनका कहना था कि हिंदी की समस्या से अवगत होकर बहुत दुख लगा । आज तो हिंदी ही क्या नेपाली भी घर में बच्चे नहीं बोलने लगे हैं । स्कूल में केवल अंग्रेजी की पढ़ाई होती है यह एक चिंता का विषय है । हम अपनी पार्टी में हिंदी में ही बात करते हैं और दूसरों से भी अनुरोध करते हैं कि हिंदी में ही बात करें । हमारा हिंदी के प्रति लगाव है । वैसे भी आज तो सब लोग हिंदी जानते हैं । टीवी, रेडियो में अक्सर हिंदी को ही सुना जाता है । पहले तो संसद में सांसद हिंदी में बोलते थे परंतु आजकल किसी से ऐसा नहीं सुना गया है । हम भी अपनी पार्टी में हिंदी के विकास के लिए आवाज उठाएंगे ।
नवें वक्ता थीं मंजू शर्मा अंसारी (जसपा) । उनका कहना था कि नेपाल में हिंदी बोलने वालों की कमी नहीं है । हुमला, जुमला के लोग भी हिंदी बोलते हैं । मुझे आश्चर्य और दुख इस बात की है कि नेपाल में कल तक विकसित हिंदी आज क्यों लुप्त हो रही है ? हमें कमी कमजोरियों की जड़ में जाकर समाधान की ओर बढ़ना होगा । वैसे भी हिंदी बहुत ही सरल और मीठी भाषा है, इस भाषा को क्यों नजरअंदाज किया जा रहा है ? अपने को हिंदीभाषी कहने वाले प्रदेश के उच्च अधिकारियों की भी गलती है क्योंकि वे हिंदी में बात न करके नेपाली में बात करते हैं । उन्हें तो हिंदी में ही बोलना चाहिए । मैं भी संसद में हिंदी के विकास के प्रति अवश्य आवाज उठाऊंगी ।
दसवें वक्ता थे अमर बहादुर थापा (एमाले) । उनका कहना था कि संविधान में किसी भी भाषा के प्रति प्रतिबंध नहीं है, सभी भाषा को महत्व दिया गया है । यह तो केवल पूर्वाग्रह जैसा प्रतीत हो रहा है । संविधान द्वारा स्वतंत्रता होते हुए भी हम क्यों कह रहे हैं कि हिंदी के प्रति अन्याय हो रहा है ? इसका कारण समझना जरूरी है । भाषा को प्रतिबंध नहीं लगाना चाहिए, हमें संविधान के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए । मुझे समझ में नहीं आता कि हिंदी विभाग को राज्य क्यों अन्याय कर रहा है ? हम प्रधानमंत्री को अवगत कराएंगे कि हिंदी विभाग के ऊपर अन्याय हो रहा है । हम समाधान की ओर अवश्य काम करेंगे ।
ग्यारवीं वक्ता थीं रेखा यादव (जसपा) । इन्होंने कहा कि मैं हिंदी भाषा के विकास के लिए संघर्ष करती आई हूं । वैसे भी हिंदी भाषा के प्रति संसद में षड़यंत्र होता है । यहां के लोग हिंदी अच्छी तरह से जानते और समझते हैं फिर भी ये लोग हिंदी को नजरअंदाज करते हैं । हम संपर्क भाषा के लिए आवाज उठाते हैं, पर संसद में रिकॉर्ड तक नहीं होता है । मैं हिंदी के लिए संघर्ष करते समय गिरफ्तार भी हुई थी । मुझे दुख एवं आश्चर्य तब लगता है जब अपने को हिंदी शिक्षक कहने वाले भी नेपाली भाषा में परिचय दे रहे हैं । हिंदी विकास के संदर्भ में राजदूतावास को भी जोड़ना चाहिए । मैं एक हिंदी सेवी होने के नाते हिंदी के विकास के प्रति संसद में अवश्य आवाज उठाऊंगी ।
बारहवें वक्ता थे मीन बहादुर शाह (नेपाली कांग्रेस) । उन्होंने कहा कि आप लोगों की समस्याओं को हम लोगों ने ध्यानपूर्वक सुना । हमारा संबंध हिंदी भाषा के साथ बहुत अच्छा है । बीपी कोइराला ने भारत में रहकर संघर्ष किया था और उन्होंने नेपाल में लोकतंत्र के लिए बहुत कार्य किया। वे हिंदी बोलते थे और हिंदी में लिखते भी थे । भाषा बोलना सबका अधिकार है और सभी लोगों को भाषा को समान दृष्टि से देखना चाहिए । हम नेपाली कांग्रेस पार्टी में हिंदी के प्रति आवाज उठाएंगे और बजट में भी हिन्दी विभाग को ध्यान में रखने की बात रखेंगे ।
तेरहवीं वक्ता थीं नगीना यादव (नेपाली कांग्रेस) । उन्होंने कहा कि नेपाल में हिंदी भाषियों के प्रति भेदभाव होता है, ऐसा मुझे नहीं लगता है । हां, किसी संकुचित सोच वाले ने किया हो तो अलग बात है । भारत में भी वैसे सभी जगह पर हिंदी का वर्चस्व है, ऐसी बात नहीं है । लेकिन हम नेपाल की अभी बात कर रहे हैं तो मै हिंदी भाषा के लिए सहयोग करुँगी और आप लोग भी अपनी ओर से क्रियाशील रहिएगा ।
कार्यक्रम के अंत में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. संगीता वर्मा ने कहा कि हमारा उद्देश्य केवल इतना है कि नेपाल में हिंदी के प्रति मतभेद न हो, इसके साथ सौतेला व्यवहार न हो । हम कई दिनों से आप लोगों से मिलना चाहते थे और आप लोगों का सहयोग चाहते थे । आज आप लोगों की हिंदी के प्रति आत्मीयता देखकर मुझे प्रसन्नता हुई । हो सकता है हमारी ओर से भी कोई कमी–कमजोरी हो, उसे हम अवश्य मनन करेंगे । आप लोगों की बात सुनकर हमें बहुत अच्छा लगा, अपने महत्वपूर्ण समय हमें देने के लिए हम आपका आभार व्यक्त करना चाहते हैं ।

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