अखंड भारत नक्शा विवाद, बे मौसम की बरसात : कंचना झा

कंचना झा, काठमांडू, 1जून । बड़ी विचित्र स्थिति है राजनीति की । वैसे तो कहा गया है कि देश को प्रगति की ओर उन्मुख करने में यदि सबसे ज्यादा किसी का हाथ होता है तो वह है देश की राजनीति । बशर्ते की साफ सुथरी राजनीति हो तो । नेपाल अभी जुझ रहा है भष्ट्राचार की राजनीति से । जिस देश की जनता अमन और चैन की तलाश में है, रोजी रोटी की तलाश में है । अपने उज्जवल भविष्य की तलाश में है उसे हम उलझा रहे हैं अखंड भारत के विरोध में । जी हाँ अभी नेपाल का हर व्यक्ति राष्ट्रवादी हो गया है क्योंकि हमारे पड़ोसी राष्ट्र में अखंड भारत का नारा लग रहा है । वहाँ की संसद में अखंड भारत का नक्शा लगाया है । नक्शा लगाया गया है भारत की संसद में और लोग विरोध कर रहे हैं नेपाल की सड़को पर ।
बड़े चालाक और शातिर हैं हमारे यहाँ के नेता । वो जानते हैं कि अभी सभी का ध्यान भूटानी शरणार्थियों के मामले में फंसे दिग्गज नेताओं की ओर है । सभी चाह रहे हैं कि दोषियों को कड़ी से कड़ी दंड मिले लेकिन दंड देगा कौन ? देने वाला खुद ही लोगों को गुमराह करने पर तुला है । आज किसी बात को लेकर आंदोलन में उतर जाता है तो कल किसी और बात को लेकर आंदोलन में उतर जाता है । भोली भाली हमारी जनता इन नेताओं के दांव पेंच को नहीं समझ पाती और आ जाती है उनकी बातों में । अखंड भारत के नक्शा को लेकर बवाल कौन मचा रहा है ? तो बाबूराम भट्टाराई । बाबूराम जी कि पढ़े लिखे हैं । बात को, परिस्थिति को समझते हैं । भूगौल, इतिहास, और संस्कृति को अच्छी तरह समझते हैं । इसके साथ ही उन्होंने अध्ययन भी बहुत किया है । वे पंडित परिवार से आते हैं जहाँ उन्होंने बहुतो बार हिमवत खंडे भारतवर्षे का उच्चारण किया होगा । इन्हीं भट्राई के बारे में बता दूँ कि इनपर भारतीय एजेंट होने का आरोप लगता आ रहा है । और वही भट्राई खुलकर विरोध कर रहे हैं भारत के संसद में अखंड भारत का नक्शा लगाए जाने पर । पिछले समय नेपाल में भारत विरोधी राष्ट्रवाद ने जो जन्म लिया है भट्राई उसी को भजाने की कोशिश में लगे हुए हैं ।
दूसरे हैं माधव नेपाल की पार्टी । ओली से विवाद बढ़ने के बाद अपनी अलग पार्टी की स्थापना की उन्होंने । लेकिन पिछले चुनाव में उनकी पार्टी धराशायी हो गई यद्यपि वो अभी सरकार में शामिल हैं । और उनकी पार्टी सस्ती लोकप्रियता कमाने की धुन में भारत विरोधी राष्ट्रीयता का फार्मूला भजाने में लगे हैं । उनकी पार्टी निकट विद्यार्थी संगठन ने भारत के ससंद में रखे अखंड भारत के चित्र प्रति आपत्ति जताते हुए प्रदर्शन किया है ।
नेकपा एमाले के अध्यक्ष ओली के बारे में सभी जानते हैं कि समय और जनता के भाव को उन्होंने खूब समझा है वो किसी को बरगलाना खूब अच्छी तरह से जानते हैं । असली मुद्दे से लोगों को कैसे बाहर किया जाए ? यह अगर कोई जानता है तो वह हैं केपी शर्मा ओली ।
ओली के बारे में तो सभी जानते हैं कि वो समय की तलाश में रहते हैं कि कब कोई इस तरह की खबर आए और वो अपनी रोटी सेकें । लेकिन बाबू राम भट्टराई या माधव नेपाल से किसी को ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वो इस तरह का विरोध भाव प्रकट करेंगे ।
एक नई शुरुआत करने जा रहे हैं प्रचण्ड । अभी उन्होंने भारत की धरती पर कदम ही रखा है कि इधर बवाल मच गया । यानी हम एक कदम आगे बढ़ना चाहते हैं कि बस कुछ न कुछ इस तरह की बात आगे ला दी जाती है कि बस एक बार फिर सब खत्म ।
गलती कुछ हम आम नागरिको की भी है कि हम भी अपने नेताओं की बातों में आ जाते हैं । हम जानते हैं कि अभी हमारी प्राथमिकता किसी और बातों की है लेकिन हम ध्यान कहाँ दे रहे हैं तो भारत पर ।
वैसे भी अगर देखा जाए तो अखंड भारत का नक्शा क्या गलत है ? यह भारतवर्ष का इतिहास है जिसे कोई झूठला नहीं सकता है । भारत की आज की जो नीति है वह है उसकी सनातन सोच । वह भी तलाश कर रहा है अपने पुरानी सभ्यता और संस्कृति को । जो उसकी असली पहचान है । जिससे वह अखंड भारतवर्ष कहलाता था । भारतवर्ष से हम और आप परिचित हैं लेकिन बहुत कमियां आ गई थी । अपनी पहचान को एकबार फिर वह अपनी युवाओं को दर्शाना चाहता है कि उसका युवावर्ग जो अपनी सभ्यता और संंस्कृति से भटक कर पश्चिमी सभ्यता की ओर आकर्षित हो रही है वह उसे वापस ला सके । उसकी सबसे बड़ी सोच ही यही है कि वह वापस अपने युवा वर्ग को आकृष्ट कर सके देश के प्रति ।
आज का समय ऐसा है कि किसी के चाहने से कुछ नहीं होता है । कोई देश अगर चाहे भी तो किसी दूसरे देश का कुछ नहीं विगाड़ सकता है क्योंकि पूरी दुनिया की निगाहें टीकी रहती है । और इसका बहुत बड़ा उदाहरण है अभी रुस यूक्रेन युद्ध । लोग समझते थे कि कहाँ टिक पाएगा यूक्रेन रुस के आगे लेकिन हकिकत से हम सभी वाकिफ हैं ।
इसलिए हाँ मन में यदि सवाल है तो उठाइए जरुर लेकिन इस तरह अपनी जनता का ध्यान नहीं भटकाए । जनता जिस बात को चाह रही है उसे पूरा करने में समय और चित्त को लगाए । न कि झूठी राष्ट्रीयता की चक्कर में लगाए ।

कार्यकारी संपादक
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