कैलाश महतो, परासी । “बालेन नगर प्रमुख हो, राष्ट्र प्रमुख होइन । उनले नगरको काम गर्ने हो, न कि राष्ट्र प्रमुखले गर्ने काम ।” – भद्रा घले, पूर्व मन्त्री, नेपाल सरकार
“गालियां बकने से ही ग्रेटर नेपाल बन जाये, तो भारत, अमेरिका और यूरोप को भी नेपाल में गोर्खालियों को मिला लेनी चाहिए ।” – एक बौद्धिक व्यक्तित्व ।
नेपाल की पूर्व मन्त्री भद्रा घले की उपर उल्लेखित व्यक्तव्य नंगा सत्य है । श्रीमति घले किसी र्याप, स्टण्ट्स या दिखावे से दूर रही सपष्टवादी प्रखरवक्ता मानी जाती हैं । किसी पद पर न होने के बावजूद राजनीतिक जीवन से दूर रही श्रीमती घले की विचार आज भी केवल पत्रकारों के लिए नहीं, अपितु राज्य और राजनीतिक वृत के लिए आज भी दृष्टिकोणभरा होता है ।
बालेन साह जिस राष्ट्रवाद का गुलाम बन रहा है, उस राष्ट्रवाद ने न जाने कितने जीवनों को अपूर्ण किया है, कितने परिवारों को खत्म किया है, कितने बस्तियों को उजाड भगाया है और कितने राष्ट्रीय संसाधनों का सौदेबाजी की है । हुर्दंगे र्याप गीत और सोचे समझे स्टण्ट्सों ने कई जन-आन्दोलन के राजनीतिक परिणामों को बेच खाया है, कई मधेश आन्दोलनों का सौदेबाजी की गई है और सारे स्वाधीनता आन्दोलन को सत्यानाश किया है ।
बालेन साह बाकई एक उर्जावान युवा मेयर है । देश की राजधानी उनके नेतृत्व तले है । काठमाण्डौ की मर्यादा आज भी दक्षिण एशिया के राजधनियों में अत्यन्त चिन्ताजनक स्थिति में है । बालेन को समझना चाहिए कि वे अब कोई र्यापर नहीं, राजनीतिक जनसेवी जन प्रतिनिधि हैं । स्टण्ट्स करने बालों ने स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन का मुद्दा का सौदा, मधेश के मसीहा कहलाने में प्रतिष्ठित समझने बाले ने अहंकार का आतंक और त्यागी का फटे छाता ओढने बाले ने भी राजनीति को बेहाया बना दिया है ।
देश व जनता प्रेम के मुद्दों को ताक पर रखकर किसी ने हिन्दु धर्म, किसी ने राज तन्त्र, किसी ने भारत को गाली, किसी ने नागरिकता का विरोध, किसी ने रंग का विरोध, किसी ने भाषा नफरत जैसे आततायी अलफाजों व व्यवहारों को राष्ट्रवाद से नाता जोड रखा है ।
बालेन ने एक वक्तव्य में कहा था कि वो कोई सडक छाप घर में नहीं, सत्तर अस्सी बिगहा जमीन के मालिक के महल में जन्म लिया है । बालेन के सत्य तर्क को सही मान लिया जाये तो उनका द्वैध चरित्र स्पष्ट होता है कि गर्व मधेश में रहे अपने बाप दादों की जमीन्दारी पर करें और लाभ केवल काठमाण्डौ को दें, तो यह बेशर्मी की बात है ।
पढाई से इंजिनियर तथा शौक से नेपाली र्यापर रहे बालेन को राजनीतिक बुखार लग गया है । “आदि पुरुष” फिल्म के “जानकी” नामक पात्र को भारतीय जन्म से नमाजे जाने से अगर बालेन को ऐतराज है, तो उन्हें प्रस्तुत फिल्म पर बन्देज लगाने को कुछ हदतक देशभक्ति कहा जा सकता है । मगर उस विवादित “आदि पुरुष” फिल्म के बहाने काठमाण्डौ में हिन्दी फिल्म संचालन पर ही रोक लगाना सस्ता देशभक्ति है ।
जिस “जानकी” जन्म की बात बालेन उठा रहे हैं, उस जानकी का नेपाली नजर में कितना प्रतिष्ठा है, उनके भाइ-भतिजे और वंशों का नेपाल में क्या और कितना अपमान है, उसके बारे में बालेन बिल्कुल अनभिज्ञ हैं । बालेन जिस इतिहास का बात करते हैं, हकीकत में वह इतिहास नेपाल के पक्ष में हो ही नहीं सकता । क्योंकि “जानकी” नेपाल की भूमि पर नहीं, प्राचीन काल के मिथिला और आज के बिहार के सीतामढी में जन्मी हैं । वैसे भी “जानकी” जन्म से सीता है और पालन पोषण से “जानकी” है, जो जनक के नाम से जानी जाती है । जनक के वर्तमान जनकपुर को अगर मिथिला के राजधानी जनकपुर को नेपाली भूमि माना जाये, तो मिथिला का ७०% से ज्यादा भूमि बिहार में अवस्थित है ।
वैसे हमने फिल्म देखा तो नहीं है, परन्तु फिल्म देखने बालों के विश्लेषण में “जानकी भारत की बेटी” नामक डायलॉग कहीं भी नहीं सुना जा रहा है । फिल्म दर्शक के अनुसार सीता से शादी के लिए बातें करते समय सीता रावण से कहती है, “मेरा राघव आयेगा और तुम्हें दण्ड मिलेगा ।” जवाब में रावण कहता है, “यह कोई मिथिला नहीं कि तुम्हारा राघव (राम) डोली और बारात लेकर लंकातक आयेगा ।” दूसरा डायलॉग है : राम और रावण के आमने सामने का, जिसमें राम कहता है, “लडो अपने कल्ह के लिए, अपने भविष्य के लिए ता कि गलत करने बालों को कल्ह भी पता चले कि भारत की बेटी पर हाथ लगाने बालों के साथ क्या हस्र होता है ।”
स्मरण रहे कि फिल्म निर्माता ने फिल्म “आदि पुरुष” उन ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर फिल्माया गया है, जो सन् १९०३ तक का इतिहास रहा है । सन् १९०३ तक हर ऐतिहासिक लिहाज और दस्तावेज से वर्तमान नेपाल के बहुत से दक्षिणी भूमि भारत का हुआ करता था, जिसमें लुम्बिनी, कपिलवस्तु और विराटनगर लगायत के अन्य कई प्रमुख स्थान और नगर पडते हैं । इससे स्पष्ट होता है कि बालेन साह के समझ से बाहर के मुद्दों पर “धोती” नामधारी बालेन को ही भारत के खिलाफ प्रयोग करने की नेपाली/गोर्खाली गहरी साजिश है ।
सार्वजनिक राजनीतिक पद जीतना जितना आसान है, उसे समझकर समझदार बनना उतना ही कठीन है । बालेन अपने असमझदारी का कहीं शिकार न हो जाये ।
बालेन का तर्क और दावा किसी भी मायने में देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम से नहीं जुड़ता । क्योंकि जब जानकीय इतिहास का बात आता है, नि:सन्देह ही भाषा के इतिहास को पकडना जायज होगा । नेपाली भाषा वि.सं. २०२८ सालतक गोर्खा भाषा भाषा था, न कि नेपाली भाषा । बालेन के बाप दादों ने भी उसी हिन्दी भाषा में पढे लिखे होंगे, जिस का वो विरोध करते हैं । बालेन अपने बाप दादों का सर्टिफिकेट्स को गौर से देखें तो पता चलेगा कि उनके लिए “टोपी” और “गोर्खा भाषा” प्रथम है या “धोती” और “हिन्दी भाषा” ? “टोपी और दाउरा सुरुवाल” लगा लेने से नेपाली हो जाने का प्रमाण होता, तो “अंग्रेजी बोलने बाले और टाइ-शूट” लगाने बाले कई नेपाली लोग भी अंग्रेज हो गये होते ।
बालेन के कुछ नगर कर्मचारी और एकाध सांसद बेचारे राष्ट्र को अपने सर का टिकी बनाकर एन्टेनीय (Antenna) प्रदर्शन करते दिख रहे हैं । काठमाण्डौ के सिनेमा घरों में छापामारी चला रहे हैं । बेचारे सिनेमा घर के मालिकों के इस आर्थिक संकट को महा संकट बना रहे हैं । बालेन अपने हैसियत से भी आगे निकलने के चक्कर में कहीं ऐसा न बन जाये कि न घोडा बन पाये, न गदहा और घोरगद्दर बन जायें ।
भारत के राजनीतिक कुछ दबदबे को साइज में लाने की रणनीतिक कोशिश होनी चाहिए । भारत के राजनीति से सबसे ज्यादा परेशान मधेश है । उसके राजनीति के कारण मधेश न तो पूरे के पूरे गुलाम बन पा रहा है, न राज्य में न्यायिक न्याय और प्रतिनिधित्व । मगर जहाँ तक हिन्दी भाषा का सवाल है, हिन्दी भारत के होने से पूर्व यह मिथिला-भोजपूरा-बज्जिका-सन्थाल- राजवंशी-अवध-थारु-गोर्खा-नेवार और सम्पूर्ण जनजातियों को आपस में जोडने बाला सुन्दर और सरल भाषा है/रहा है ।
इस बात से वाकिफ होना बेहद जरुरी है कि देशभक्तों के राह में केवल बालेन नहीं, उनसे भी नि:स्वार्थी और बिन्दास मधेशी लोग देशभक्त हैं, जिन्हें राज्य ने नागरिक बनने तक से रोकने का षड्यन्त्र करता रहा है । हिन्दी भाषा पर होने बाला आपत्तिजनक आक्रमण और दुर्व्यवहार मधेश विरोधी है । ऐसे बेहुदे आक्रमण को रोका न गया, तो बालेन के देशभक्ति से भी आक्रामक देशभक्ति देश में पनपने में कोई दिक्कत न होगी ।
बालेन के कर्मचारियों और एकाध पौने विचार के कुछ तमाशेगीर सांसदों के दावे अनुसार अगर कालापानी, ठोरी, तिलाठी, सुस्ता, आदि नेपाल के हैं, तो उन्हें कब्जा कब करोगे ? ग्रेटर नेपाल के लिए सिक्किम, उत्तराखण्ड, दार्जिलिंग और सुस्ता-कालापानी ही क्यों, काश्मीर से लेकर कन्या कुमारीतक की भूमि पर नेपाली शासन और झण्डा कब लहराओगे ?
जमीनी लडाई वो क्यों नहीं लडते, जिन्होंने उन जमीनों को या तो बेचा है, या फिर छोडकर भागे हैं ? बालेन पहले नगर प्रमुख के अपने भूमिका में सफल हो लें, फिर राष्ट्र प्रमुख के रुप में बाजी मारकर भारत, चीन, यूरोप और एशिया से आंखें मिलाकर अपने भूमि, इतिहास, अवतारों और सन्धियों को कार्यान्वयन करायें । हम भी पूरे साथ में रहेंगे । अगर नहीं तो नगर प्रमुख से राजीनामा देकर स्वतन्त्र नागरिक बनें और देश के सारे समस्याओं के समाधान के लिए स्वतन्त्र अभियान चलायें, या राष्ट्र प्रमुख बनकर अन्तर्राष्ट्रीय रुप में संयुक्त राष्ट्र संघ लगायत के अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से आवाज उठायें ।
अपने परिधि से बाहर का झंझट मोलने का एक मात्र कारण अपने राजनीतिक भविष्य का जुगाड करना,या नगर के कामों में हो रहे कोई न कोई असफलता को ढककर राष्ट्रवादी होने का स्टण्ट करना ।
गोर्खाली शासक मानसिकता के लोगों को अगर यह लगता है कि किसी को गाली देकर, झण्डे फहराकर, नारे लगाकर और हंगामे करके ही ग्रेटर नेपाल और राष्ट्रवाद का सुरक्षा संभव है, तो ग्रेटर नेपाल ही क्यों ?, ग्रेटर ब्रम्हाण्ड क्यों नहीं बनाया जा सकता है ?


