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शिव स्तुति का महान पर्व कांवड़ यात्रा!

 
डॉ श्री गोपाल नारसन एडवोकेट
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भगवान शिव की स्तुति का श्रावण मास में विशेष महत्व है।हिंदू धर्म मे आस्था रखने वाले लोगो के लिए श्रावण मास बहुत ही पावन व भक्तिमय है।हर साल श्रावण मास में करोड़ो की तादाद में कांवडिये सुदूर स्थानों से हरिद्वार, ऋषिकेश, गंगोत्री आकर गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर पदयात्रा करके अपने गांव कस्बे व शहर के शिवालयों की तरफ वापस लौटते हैं ,इस यात्राको कांवड़ यात्रा कहा जाता है। श्रावण की चतुर्दशी के दिन  गंगा जल से अपने निवास के आसपास शिव मंदिरों में शिव का अभिषेक किया जाता है। कहने को तो ये धार्मिक आयोजन भर है, लेकिन इसके सामाजिक सरोकार भी हैं। कांवड के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रचियता शिव की आराधना के लिए है। जल आम आदमी के साथ साथ पेड पौधों, पशु – पक्षियों, धरती में निवास करने वाले हजारो लाखों तरह के कीडे-मकोडों और समूचे पर्यावरण के लिए बेहद आवश्यक है।  भारत की भौगोलिक स्थिति को देखें तो यहां के मैदानी इलाकों में मानव जीवन नदियों पर ही आश्रित है। गंगा के जल से भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए  शिवभक्त कांवड़ में में बड़ी संख्या में नजर आते है ।यह कांवड़ यात्रा हरिद्वार हर की पैड़ी से शुरू होकर गंगनहर के समानांतर कांवड़ मार्ग पर चलते हुए आस्था की धारा के रूप में आगे बढ़ती है । इस यात्रा में जगह-जगह कांवड़ियों का स्वागत  उनकी सेवा के लिए लगाए गए शिविरों में होता है।भारतीय लोगों के लिए कांवड़ शब्द बिल्कुल अनसुना नहीं है। कभी श्रवण कुमार ने अपने माता पिता को कांवड़ में बैठा कर ही तीर्थ यात्रा कराई थी।श्रावण प्रारंभ होते ही केसरी रंग के कपड़ों में कावड़िए अपने कंधे पर कांवड़ लटकाए, पहले उसमें गंगाजल भरकर लाते हैं और अपनी मन्नत के अनुसार किसी विशेष शिव मंदिर में उस गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं।गंगाजल लाने और उससे शिवलिंग का अभिषेक करवाने तक का यह पूरा सफर पैदल और नंगे पांव किया जाता है। किंतु कुछ कावड़िये अपने वाहनों से भी यह यात्रा पूरी करते है।कावड़ियों के लिए निश्चित तौर पर यह काम बहुत हिम्मत का है। लेकिन शिव भक्ति के सामने कोई भी मुश्किल कहां रहती है।भले ही कावड़ियों के पैरों में छाले ही क्यो न पड़ जाए।  शिव भक्त फिर भी हार नही मानते हैं। ऐसा माना जाता है शिव का जलाभिषेक करने से शिव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की हर मनोकामना को पूरा करते हैं।श्रावण के महीने को शिव माह भी कहा जाता है, क्योंकि ये वो महीना होता है जब सारे देवता शयन करते हैं और शिव सक्रिय और जाग्रत रहकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।
हालांकि कावड़ यात्रा बड़ी मुश्किल है, लेकिन इस दौरान कावड़ियों को धार्मिक मान्यताओं व सरकार द्वारा बनाए गए कुछ नियमों का पालन भी करना पड़ता है जो अत्यंत आवश्यक होता है।इन मुख्य नियमो में,कावड़ यात्रा शुरू करते ही कावड़ियों के लिए किसी भी प्रकार का नशा करना वर्जित होता है। यात्रा पूरी होने तक उस व्यक्ति को मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से परहेज करना होता है।बिना स्नान किए कावड़ को हाथ नहीं लगा सकते,इसलिए स्नान करने के बाद ही कावड़िए अपने कावड़ को छू सकते है।
चमड़े से बनी किसी वस्तु का स्पर्श वर्जित माना गया है।पैदल कावड़िये वाहन का प्रयोग नही करते। चारपाई का उपयोग भी कांवड़ यात्रा के दौरान  कावड़ियों के लिए वर्जित है। इसके अलावा किसी वृक्ष या पौधे के नीचे  कावड़ को रखना भी वर्जित माना गया है।कावड़ ले जाने के पूरे रास्ते भर बोल बम और जय शिव-शंकर का उच्चारण करना फलदायी होता है। कावड़ को अपने सिर के ऊपर से लेकर जाना भी वर्जित माना गया है।
इन सभी नियमों का पालन करना आवश्यक है और इसके लिए कावड़ियों की संकल्पशक्ति की मजबूती अनिवार्य है,तभी वे इस कठिन किंतु रौमांचक कांवड़ यात्रा का हिस्सा बन सकते है।
जिस कावंड में गंगाजल भरकर शिवालय में ले जाया जाता है। उस कावंड को बनाने वाले हिन्दू ही नही मुस्लमान भी है। ज्वालापुर,सराय निवासी इस्लाम ,युनुस व रफीक का परिवार साल भर की रोजी रोटी इसी कावंड को तैयार कर उसे साधको को बेचकर प्राप्त करता है। इतना ही नही कई मुस्लमान हिन्दूओं के इस  कावंड मेले में कावंड सहायता शिविर लगाकर धार्मिक सौहार्द एवं आपसी भाईचारे का सन्देश भी देते है। कावंड मेले को बदरंग करते हुए कुछ कांवडिये भांग का  सेवन करते है तो चरस गांजे का अवैध व्यापार भी कावंड मेले की आड में खूब फलता फूलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार शिव की भक्ति आषाड मास के बीस दिन बीतने के बाद से ही श्रावण मास पूरा होने तक 40 दिन के लिए किये जाने की परम्परा है। भगवान शिव ही एक मात्र ऐसे परमात्मा है जिनकी देवचिन्ह के रूप में शिवलिगं की स्थापना कर पूजा की जाती है। लिगं शब्द का साधारण अर्थ चिन्ह अथवा लक्षण है। चूंकि भगवान शिव ध्यानमूर्ति के रूप में विराजमान ज्यादा होते है इसलिए प्रतीक रूप में अर्थात ध्यानमूर्ति के रूप शिवलिगं की पूजा की जाती है। पुराणों में लयनाल्तिमुच्चते अर्थात लय या प्रलय से लिगं की उत्पत्ति होना बताया गया है। जिनके प्रणेता भगवान शिव है। यही कारण है कि भगवान शिव को प्राय शिवलिगं के रूप अन्य सभी देवी देवताओं को मूर्ति रूप पूजा की जाती है।
शिव स्तुति एक साधारण प्रक्रिया है। ओम नमः शिवाय का साधारण उच्चारण उसे आत्मसात कर लेने का नाम ही शिव अराधना है। श्रावण मास में शिव स्तुति मनोकामना पूर्ण करने वाली होती है। ऋृग्वेद,यजुर्वेद व अर्थवेद में भगवान शिव को ईश,ईशान,रूद्र,ईश्वर,कपर्दी,नीलकण्ठ,सर्वज्ञ,सर्वशक्तिमान,भोलेशंकर नामों से जाना जाता है।गरूड पुराण में शिवलिगं निर्माण के विधान का उल्लेख किया गया है। जिसके तहत अलग अलग धातु या फिर वस्तु से निर्मित शिवलिंग की पूजा अर्चना से अलग अलग फल प्राप्ति होती है। कस्तूरी,चन्दन व कुमकुम से मिलकर बनाया गया गंधलिगं विशेष पूण्यकारी है। वही पुष्पों से पुष्पलिगं बनाकर शिव अराधना करने से पृथ्वी के अधिपत्य का सुख मिलता है।इसी प्रकार कपिल वर्ण गाय के गोबर से निर्मित गोशक्रलिगं की पूजा से एश्वर्य की प्राप्ति होना मानी जाती है। रजोमय लिंग पूजा करने से सरस्वती की कृपा साधक पर होने की मान्यता है। वही जौ,गेहूं,चावल के आटे से बने चवर्गोधूमशालिज लिंग पूजा से स्त्री,पुत्र व श्री सुख की अनुभूति का उल्लेख है। मिश्री से बने सितारखण्डमय लिंग पूजा से अरोग्यता ,हरताल व त्रिकुट लवण से बनाए गए लवणज लिंग से सौभाग्य प्राप्ति ,पार्थिव लिगं से कार्यसिद्धि ,भस्मय लिगं से सर्वफल प्राप्ति,गडोरथ लिगं से प्रीति वृद्धि,वशांकुर लिगं से वंश विस्तार,केशास्थि लिगं से शत्रुशमन,पारद शिव लिगं से सुख समृद्धि,कास्य व पीतल से बने शिव लिगं से मोक्ष प्राप्ति होने की मान्यता है।(लेखक आध्यात्मिक चिंतक एवं वरिष्ठ पत्रकार है)
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
पोस्ट बॉक्स 81,रुड़की, उत्तराखंड
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