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सीमा–विवाद हल के लिए बांग्ला देश मॉडल कितनी कारगर ? : डॉ. श्वेता दीप्ति

डॉ श्वेता दीप्ति , हिमालिनी अंक जुलाई । नेपाल और भारत के बीच कालापानी सीमा विवाद लंबे समय से तनाव का केंद्र रहा है । हाल ही में प्रधानमंत्री दहाल भारत की यात्रा सम्पन्न कर के आए हैं । जहाँ प्रधानमंत्री अपनी इस यात्रा को सफल मान रहे हैं वहीं विपक्ष इसे असफल मान रहा है । वैसे यह बात कोई नई नहीं है । प्रधानमंत्री कोई भी हों, किसी भी पार्टी के हों उनकी भारत –यात्रा हमेशा से विवादित ही रहती है । हर बार की तरह नेपाल–भारत सीमा विवाद प्रधानमंत्री के भारत जाने से पहले और आने के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है । वैसे एक बात तो स्पष्ट तौर से सामने आ रही है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक ओर जहाँ भारत से सम्बन्ध सुधरने की बात कही जा रही है, वहीं किसी न किसी बहाने से इस सम्बन्ध को कटु बनाने की भी कोशिश की जा रही है । जिस रोटी–बेटी के रिश्ते की दुहाई प्रत्येक नेता समय–समय पर देते आए हैं, वह अपना अस्तित्व पूरी तरह से खो चुका है । यह रिश्ता दिन–ब–दिन तिक्त होता जा रहा है और गौर करने की बात यह है कि इसमें सरकारी नीति की बहुत बड़ी भूमिका है ।

 

जहाँ तक सीमा विवाद की बात है तो अपनी भारत यात्रा के दौरान, प्रधान मंत्री पुष्प कमल दहाल प्रचंड ने कहा कि ‘भारत–बांग्लादेश सीमा समस्या समाधान मॉडल’ भी सीमा विवाद समाधान के लिए एक विकल्प हो सकता है, और उनके इस कथन के बाद से ही इस मॉडल की चर्चा शुरु हो गई है । जब पिछले साल तत्कालीन प्रधान मंत्री शेर बहादुर देउबा भारत यात्रा में गए थे, तब भारत के तत्कालीन विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने बांग्लादेश के साथ सीमा विवाद समाधान के मुद्दे का उल्लेख किया था । उन्होंने उस समय कहा था, ‘हमने बांग्लादेश के साथ सीमा विवाद सुलझा लिया है, नेपाल के साथ सीमा विवाद भी बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है ।’ इस कथन से यह अंदाजा लगाया गया कि बंगला देश मॉडल की तरह ही नेपाल से भी सीमा विवाद सुलझाया जा सकता है ।

क्या है ‘भारत–बांग्लादेश सीमा समस्या समाधान मॉडल’

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के साथ ही बांग्लादेश के साथ भूमि विवाद शुरु हो गया था । बंगलादेश उस समय पूर्वी पाकिस्तान हुआ करता था । १९७१ में बांग्लादेश की आजादी के ४३ साल बाद भी इस विवाद का समाधान नहीं हो सका था । भारत और बांग्लादेश के बीच ४,००० किमी लंबी सीमा पर कई बार विवाद हुए । जब २०१४ में नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधान मंत्री के रूप में चुने जाने के बाद, उनकी बांग्लादेश यात्रा के दौरान, भारत और बांग्लादेश ने ६ जून, २०१५ को एक ‘भू–सीमा समझौते’ पर हस्ताक्षर किए । और इस समझौते से करीब चार दशक से चल रहे सीमा विवाद का समाधान सम्भव हो पाया । इस समझौते के माध्यम से भारत ने दोनों देशों के बीच भूमि का आदान–प्रदान करके सीमा विवाद को हल करने के लिए अपने संविधान में संशोधन किया ।

१९७१ में स्वतंत्र देश बने बांग्लादेश के साथ सीमा विवाद थोड़ा अलग प्रकृति का था । दोनों देशों ने सैकड़ों ऐसी जमीनों पर दावा किया, जो पूरी तरह से दूसरे देश के इलाके से घिरी हुई थीं, जिन्हें एन्क्लेव कहा जाता था । दोनों देशों ने अपने–अपने क्षेत्रों से घिरे ऐसे परिक्षेत्रों के भीतर एक–दूसरे को शासन करने की अनुमति नहीं दी थी । जिसकी वजह से उन क्षेत्रों में रहने वाले निवासी शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं से वंचित थे । हालांकि दोनों देश सीमा की समस्या को सुलझाने पर काम कर रहे थे, लेकिन नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहे थे । १९७४ में, भारतीय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और बांग्लादेश के प्रधान मंत्री शेख मुजीबुर रहमान ने भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किए । लेकिन १९७५ में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री रहमान की हत्या के कारण वह समझौता लागू नहीं हो सका । इस बीच, सीमा समस्या को हल करने के लिए भारत और बांग्लादेश के बीच कई बैठकें और बातचीत हुई, लेकिन तकनीकी और राजनीतिक स्तर पर समस्या का समाधान नहीं हो सका । प्रधान मंत्री मोदी की २०१५ की बांग्लादेश यात्रा के दौरान एक ऐतिहासिक भूमि विनिमय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे । दरअसल, यह १९७४ के क्षेत्रीय सीमा समझौते को लागू करने का फैसला था । २०१५ में भूमि समझौते के साथ ही भारतीय बड़ी कंपनियों द्वारा बांग्लादेश के ऊर्जा क्षेत्र में ५ बिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश का समझौता भी हुआ था । दरअसल, कोर डिप्लोमेसी और इकोनॉमिक डिप्लोमेसी को मिलाकर यहां समस्या का समाधान निकाला गया । इस समझौते के अनुसार भारत और बांग्लादेश ने बड़ी मात्रा में भूमि का आदान–प्रदान किया । भारतीय सीमा के भीतर ३४ हजार जनसंख्या वाले १११ इनक्लेव जिसका क्षेत्रफल ६ हजार ९ सौ ५० हेक्टर था उसे बंगला देश को सौंप दिया था और बंगला देश के सीमा के भीतर स्थित १७ हजार जनसंख्या वाले ५१ इनक्लेव का दो हजार आठ सौ अससी हेक्टर जमीन भारत को सौप दिया था ।

उन क्षेत्रों में पहले से रह रहे निवासियों को अपना देश चुनने की सुविधा दी गई और उसी के अनुसार उन्हें नागरिकता प्रदान की गई । दोनों देशों के कुल ५१,००० नागरिक इससे प्रभावित हुए थे । उनमें से अधिकांश ने अपनी नागरिकता बदलने के बाद भी वहीं रहने का फैसला किया जहां वे पहले थे । इस समस्या के समाधान के लिए भारत को अपने संविधान में संशोधन करना पड़ा । १५ मई, २०१५ को, भारत ने संविधान में १००वां संशोधन पारित किया, जिसने बांग्लादेश के साथ समझौते के अनुसार अपनी भूमि बांग्लादेश को हस्तांतरित करने की अनुमति दी । चार दशक से चल रहे सीमा–विवाद की समस्या को हल करना भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है ।

नेपाल भारत सीमा विवाद को लेकर एक बार फिर से बंगलादेश माडल की चर्चा शुरु हो गई है । भारतीय अधिकारियों का मानना है कि बांग्लादेश के साथ उनके अनुभव के आधार पर नेपाल, चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा मुद्दों को सुलझाया जा सकता है । प्रधान मंत्री प्रचंड ने अपने भारतीय समकक्ष नरेंद्र मोदी द्वारा पहली बार सीमा समस्या के बारे में सार्वजनिक रूप से बोलने के बाद इसे ब्रेक थ्रू कहा है । उन्होंने कहा कि अब विकल्पों पर विचार किया जाएगा । मोदी से मुलाकात के अगले दिन पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा था, ‘हमने कल से विकल्पों के बारे में सोचना शुरू कर दिया है ।’ इसी सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि बांग्लादेश मॉडल भी एक विकल्प है । हमें बांग्लादेश जाने के लिए एक सीधा रास्ता चाहिए, यह बात नेपाल में बहुत पहले से चल रही है । हम इसे मैनेज कर सकते हैं, हमारे विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि यह एक समाधान हो सकता है ।’

क्या है नेपाल भारत सीमा विवाद

नेपाल की राजनीति में भारत विरोध राग के अपने ही फायदे हैं । भारत विरोध भी एक परंपरा की तरह ही है यहाँ के लिए । देश की बड़ी से बड़ी समस्या भारत विरोध के समय धुँधली पड़ जाती है । यहाँ तक कि किसी मुद्दे से अगर जनता का ध्यान हटाना है तब भी यह मोहरा बहुत कारगर सिद्ध होता है । गौर तलब बात यह है कि आज भी भारत द्वारा अपने नए संविधान भवन में अखण्ड भारत के सांस्कृतिक नक्शा के चित्र को रखने पर यहाँ भी काठमान्डू के मेयर बालेन शाह ने अपने कार्यालय में ग्रेटर नेपाल का नक्शा टांग दिया जिसमें वह हिस्सा नहीं दिखाया गया है जो नेपाली भूमि चीन के कब्जे में है । अगर चीन द्वारा नेपाल के माउंट एवरेस्ट को अपना बताया जाता है तो उस पर भी कोई विरोध या वक्तव्य जारी नहीं होता है । ऐसे में यह कहना गलत नहीं है कि हर कोई अपने राजनीतिक फायदे के लिए भारत के साथ विवाद की स्थिति बनाए रखना चाहता है । हालांकि हम यह भूल जाते हैं कि नेपाल–भारत के संबंध कोई नए नहीं हैं, बल्कि यह सदियों से चले आ रहे दो देशों के बीच अच्छे समन्वय और त्याग पर आधारित है । देखा जाए तो विदेशी व्यापार के लिए नेपाल की भारत पर निर्भरता एक सत्य है और ऐसे में कोई भी विवाद दोनों देशों के लिए ही नुकसानदेह साबित होगा ।

अगर पीछे मुड़कर सीमा विवाद के मसले को देखें तो कुछ ऐसी तसवीर सामने नजर आती है । २०१५ में जब भारत और चीन में व्यापारिक समझौते हुए थे उस वक्त दोनों देशों के बीच लिपुलेक चर्चा में था पर नेपाल नहीं । २०१८ में इसी विषय पर तत्कालीन विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने कहा था कि, लिपुलेक त्रिदेशीय सीमा बिन्दु नहीं है । दार्चुला का कालापानी स्थित लिपुलेक नेपाल का है, जिसपर भारत से विवाद है, इसलिए उस स्थान को त्रिदेशीय सीमा बिन्दु नहीं माना जा सकता है । मन्त्री ज्ञवाली ने कहा था कि लिपुलेक त्रिदेशीय सीमा बिन्दु नहीं होने के कारण चीन और भारत के बीच उक्त स्थान का प्रयोग व्यापार करने के लिए सहमति पर नेपाल सरकार का विरोध यथावत् है । उन्होंने यह भी कहा था जब तक दो देशों के बीच इस विवाद को नहीं सुलझा लिया जाता तब तक हम त्रिदेशीय नही कह सकते हैं । अभी समग्र कालापानी क्षेत्र विवादित विषय है और नेपाल इसमें दावा रखता है । गौर कीजिए कि यहाँ दावा शब्द आया और जब तक यह दावा सिद्ध नहीं हो जाता तब तक वह क्षेत्र विवादित ही माना जाएगा ।

भारत और चीन के बीच हुए व्यापारिक समझौते जिसमें लिपुलेक के प्रयोग की बात थी उसपर नेपाल ने अपना विरोध जताया था । मजे की बात तो यह है कि उस वक्त भी सामाजिक संजाल में गालियाँ सिर्फ भारत को मिली थी । जबकि इसमें चीन की बराबर की भागीदारी थी क्योंकि उस समझौते में वह भी शामिल था । कालापानी और लिपुलेक पर अगर नेपाल दावा रखता है तो उसकी अनुपस्थिति में इस पर चर्चा का कोई औचित्य नहीं रह जाता है । गौरतलब यह है कि यह विषय फिर ठंडा हो गया । उसके बाद जब भारत ने कश्मीर मसले के बाद अपना नया नक्शा जारी किया तो एक बार फिर इसी मुद्दे ने सर उठाया और नेपाल ने फिर इसका पुरजोर विरोध किया । नेपाल का यह कहना था कि विवादित जमीन को, भारत को एकतरफा निर्णय करते हुए नक्शे में शामिल नहीं करना चाहिए । उस क्षेत्र में भारत सरकार वर्षों से सड़क बना रही थी । किन्तु इसका संज्ञान किसी को भी नहीं हुआ और जब सड़क का उद्घाटन हुआ तो दो दिनों के अन्दर नक्शा तैयार कर लिया गया । उस समय इन परिस्थितियों को देखते हुए भारत ने यह माना कि यह सब चीन के इशारे पर हो रहा है क्योंकि वर्तमान सरकार का चीन के प्रति झुकाव सामने था । यह सड़क २००२ से निर्माणाधीन थी । इस सड़क के बनने से मानसरोवर की यात्रा सहज हुई । उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह क्षेत्र भारत के लिए सामरिक दृष्टि से भी यह काफी महत्तव रखता है । ऐसे में स्वाभाविक है कि चीन को यह बात कभी गँवारा नहीं होगी क्योंकि भारत और चीन के कई सीमा पर विवाद जारी है । चीन की विस्तारवादी नीति से भी पूरा विश्व वाकिफ है ।

जहाँ तक सवाल लिपुलेक और कालापानी का है तो जो बातें सबसे पहले समझ में आती है वो यह कि कालापानी एक तरह से डोकलाम की तरह है, जहां तीन देशों के बॉर्डर हैं । डोकलाम में भारत, भूटान और चीन हैं । वहीं कालापानी में भारत, नेपाल और चीन । ऐसे में भारत के लिए सैन्य नजरिये से यह ट्रायजंक्शन बहुत महत्वपूर्ण है । उस क्षेत्र में सबसे ऊंची जगह है ये । १९६२ युद्ध के दौरान भारतीय सेना यहां पर थी । डिफेंस एक्सपर्ट बताते हैं कि इस क्षेत्र में चीन ने भी बहुत हमले नहीं किए थे क्योंकि भारतीय सेना यहां मजबूत स्थिति में थी । इस युद्ध के बाद जब भारत ने वहां अपनी पोस्ट बनाई, तो नेपाल ने कोई विरोध नहीं किया था । ये अलग बात है कि उस वक्त भारत और नेपाल के संबंध भी अब जैसे तनावपूर्ण नहीं थे । भारत को डर ये है कि अगर वो इस पोस्ट को छोड़ता है, तो हो सकता है चीन वहां धमक जाए और इस स्थिति में भारत को सिर्फ नुकसान हासिल होगा । इन्हीं बातों के मद्देनजर भारत इस पोस्ट को छोड़ना नहीं चाहता है । सामरिक दृष्टिकोण से यह क्षेत्र भारत के लिए अत्यन्त महत्तवपूर्ण है और भारत इसे अपना हिस्सा मानता है । वैसे उस समय इन विवादों के बीच चीन ने यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया था कि यह भारत और नेपाल का मामला है और इसमें एकपक्षीय निर्णय से दोनों देशों को बचना चाहिए ।

भौगोलिक दृष्टिकोण से निर्जन एवं दुर्गम क्षेत्र का सही ढंग से सीमांकन न होने के कारण यह क्षेत्र हमेशा से विवादित रहा है । भारत और नेपाल के सर्वे अधिकारी कई सालों की साझा कोशिशों के बावजूद अभी तक कोई सर्वमान्य नक्शा नहीं बना पाए । दोनों देश के बीच सीमांकन आयोग का भी गठन हुआ था जो कि निष्क्रीय है ।

भारत और नेपाल के बीच लगभग १७५१ किमी सीमा है जिसका निर्धारण ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच युद्ध की समाप्ति के बाद स्थाई शांति के लिए २ दिसम्बर १८१५ को हस्ताक्षरित सुगोली की संधि के द्वारा किया गया था । संधि को नेपाल के राजा ने ४ मार्च १९१६ को अनुमोदित किया था । संधि की शर्तों के अनुसार नेपाल ने तराई के विवादास्पद इलाके और काली नदी के पश्चिम में सतलज नदी के किनारे तक (आज के उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश) जीती हुई जमीन पर अपना दावा छोड़ दिया था । इस संधि में नेपाल के साथ सिक्किम तक की सीमाएं तय हैं जिसमें उत्तराखण्ड से लगी २६३ किमी लंंबी सीमा भी शामिल है । नेपाल कालापानी के उत्तर पश्चिम में १६ किलोमीटर दूर लिम्पियाधुरा से निकलने वाली कूटी यांग्ती (नदी) को उसकी लम्बाई एवं जलराशि के आधार पर काली नदी मानता है, जबकि भारतीय पक्ष कालापानी से निकलने वाली जलधारा को ही काली नदी मानता रहा है । इन दोनों जलधाराओं का गुंजी के निकट मनीला में संगम होता है और आगे चलकर यही काली नदी शारदा और काफी आगे मैदान में चलकर घाघरा कहलाती है । कूटी के अलावा काली नदी की स्रोत जल धाराओं में धौली, गोरी और सरयू भी शामिल हैं । सरयू पंचेश्वर में और गोरी नदी जौलजीवी में काली से मिलती है । सुगोली की संधि में काली नदी के पश्चिम वाला क्षेत्र भारत का और पूरब वाला नेपाल का माना गया है । जिस नदी को नेपाल में काली नदी कहते हैं वह पश्चिम से पूरब की ओर बहती है । इसलिए नेपाल के दावे के अनुसार संधि में विभाजक दिशाएं पूरब–पश्चिम के बजाय उत्तर और दक्षिण मानी जानी चाहिए थीं । जबकि इस कूटी घाटी में नदी के दो किनारे उत्तर और दक्षिण दिशा की ओर हैं और घाटी के निचले आबादी वाले क्षेत्र में नदी के दोनों ओर भारत और नेपाल के गांव हैं । इधर भारत जिस नदी को काली मानता है वह उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है । इसलिए संधि के हिसाब से पूरब में नेपाल के दार्चुला जिले के छांगरू, दिलीगाड़, तिंकर और कौआ गांव है, जबकि पश्चिम में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के पिथौरागढ़ जिले की गुंजी, नपलच्यू, रौंगकौंग, नाबी, कूटी, गब्र्यांग और बुदी ग्राम सभाएं हैं । वर्तमान में इस नदी के दोनों ओर भाटिया जनजाति के लोग बसे हुए हैं । एक ही संस्कृति और नृवंश के चलते दोनों ओर के ग्रामवासियों के आपस में वैवाहिक और आर्थिक संबंध हैं । यह दोनों देशों के नागरिकों की स्थिति है । जहाँ सीमान्तों के बीच कोई मतभेद नहीं है ।

सीमा विवाद को सुलझाने के लिए होती रही है पहल

भारत और नेपाल ने अपने सीमा विवादों के स्वीकार्य समाधान तलाशने के लिए पिछले कई वर्षों में कई दौर की बातचीत की है लेकिन प्रगति धीमी और छिटपुट रही है । १९८१ में दोनों देशों ने एक ज्वाइंट टेक्निकल लेवल बाउंड्री कमिटी का गठन किया, जिसे सर्वेक्षण करने और सीमा के इलाकÞे को तय करने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों का नक्शा बनाने का जिम्मा सौंपा गया था । विदेश मंत्रियों के स्तर पर भी कई द्विपक्षीय वार्ताएं हुई, उच्च–स्तरीय दौरे जिनके एजÞेंडे में सीमा विवादों के राजनयिक समाधान पर चर्चा करना; और सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास के प्रयास शामिल रहा किन्तु ये पहल सीमा विवादों को हल करने में विफल रही ।
बाउंड्री कमिटी का काम भारत और नेपाल की सीमा की अलग–अलग व्याख्याओं से और ज्यादा जटिल हो गया क्योंकि दोनों पक्षों ने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक औचित्य का दावा किया । कमिटी के काम में प्रशासनिक बाधाएं भी एक सतत चिंता का कारण रही हैं । और २००७ के बीच, बाउंड्री कमिटी ने भूमि सीमा के रूप में १,२३३ किमी और नदी सीमा के रूप में ६४७ किमी का सीमांकन किया था । यह कालापानी और सुस्ता क्षेत्रों में विवादों को हल करने में नाकाम रहा था क्योंकि दोनों पक्षों ने परस्पर विरोधी दावे तब किए थे । कमिटी ने भारत के महासर्वेक्षक और नेपाल के सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक द्वारा संयुक्त रूप से हस्ताक्षरित १८२ स्ट्रिप–नक्शों को तैयार किया, जिसमें ८,५५३ बाउंड्री पिलर को भी वर्णित किया था ।

इसके साथ ही नेपाल के भीतर राजनीतिक अस्थिरता और निरंतर सियासी संघर्ष ने इन क्षेत्रीय विवादों को बार–बार उभरने में योगदान दिया है । नेपाल के राजनीतिक दलों ने हमेशा जनता का समर्थन हासिल करने के लिए भारत के साथ देश की सीमा विवादों का सिर्फ राजनीतिकरण ही किया है, समाधान नहीं खोजा है ।

१९८७ में दोनों पक्षों ने भारत–नेपाल ज्वाइंट कमीशन बनाया, एक उच्च–स्तरीय द्विपक्षीय व्यवस्था, जिसे सीमा विवादों के समाधान सहित पारस्परिक हित के विभिन्न मुद्दों को संबोधित करने के लिए जिम्मेदार बनाया गया था । इस ज्वाइंट कमीशन ने सीमा विवादों को हल करने के लिए एक व्यवस्था के रूप में काम करने की मांग की और इसने दोनों पक्षों को रचनात्मक बातचीत में शामिल होने और आपसी सम्मान और समझ की भावना से बातचीत जारी रखने को कहा । कुछ वर्षों तक ज्वाइंट कमीशन समय–समय पर इस दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा करने और बाकी मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मिलते रहे लेकिन इससे कुछ फायदा नहीं हुआ और आखिÞरकार यह निष्क्रिय हो गया ।

इसे दो दशक के अंतराल के बाद २०१४ में पुनर्जीवित किया गया था और अगस्त २०२० में इसकी आठवीं बैठक आयोजित की गई, जहां दोनों पक्षों ने सीमा विवाद सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की थी ।
१९९६ में, दोनों देशों ने महाकाली संधि पर हस्ताक्षर किए जिसका मकÞसद महाकाली नदी से पानी साझा करना था और इसमें सीमा विवादों को हल करने के लिए एक प्रावधान (अनुच्छेद ९) शामिल किया गया था । इस संधि ने एक ज्वाइंट कमेटी फॉर वाटर रिसोर्सेज (जेसीडब्ल्यूआर) और एक ज्वाइंट टेक्निकल लेवल बाउंड्री ( जेटीएलबी) की स्थापना करके ऐसा करने की कोशिश की, लेकिन इसका कोई साफ परिणाम नहीं निकल पाया ।
इन समितियों की स्थापना के अलावा दोनों पक्षों ने कई उच्च–स्तरीय यात्राओं के जÞरिए अपने विवादों के समाधान का रास्ता निकालने की कोशिश की । इनमें २०१८ में भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा और २०२० में नेपाल के प्रधान मंत्री केपी शर्मा ओली की भारत यात्रा भी शामिल है । कई बार ज्वाइंट टेक्निकल लेवल बाउंड्री कमीटी की बैठकों और दोनों सरकारों के विदेश सचिवों और गृह मंत्रियों के बीच बैठकों सहित दोनों देशों के बीच कई स्तर की वार्ताएं भी आयोजित की गई हैं ।

इस संबंध में एक उल्लेखनीय व्यवस्था एमिनेंट पर्सन्स ग्रूप (ईपीजी) (प्रतिष्ठित व्यक्ति समूह) है, जो २०१६ में दोनों देशों द्वारा स्थापित एक उच्च स्तरीय निकाय है जो खÞास तौर पर १९५० की शांति और मित्रता संधि और सीमा विवादों के संबंध में बचे हुए मुद्दों को हल करने पर सिफारिशें आगे बढ़ाता रहता है । इस समूह में प्रत्येक पक्ष से चार प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल थे जिनकी जिम्मेदारी द्विपक्षीय संबंधों के सभी पहलुओं की जांच करना और भविष्य के लिए सिफारिशें करना था । अब निष्क्रिय हो चुके ईपीजी ने जुलाई २०१८ में अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया लेकिन अभी तक ईपीजी ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की है । हालांकि यह रिपोर्ट सीमा विवादों के तत्काल समाधान की दिशा दिखाए ऐसा प्रतीत नहीं होता है, फिर भी यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता था ।

इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री प्रचण्ड की भारत यात्रा पर सबकी नजर थी । भारतीय प्रधानमंत्री मोदी के आश्वासन ने एक बार फिर से यह उम्मीद जगाई है कि दोनों देशों के बीच के सीमा विवाद को सुलझा लिया जाएगा । किन्तु उह भीसत्य है कि सीमा विवादों को सुलझाने के लिए निश्चित रूप से कूटनीतिक कौशल, परिपक्वता, चातुर्य और सहजता की आवश्यकता होती है । किसी भी समझौता और संधि करने से पहले यह भी आवश्यक है कि बाद के पछतावे से बचा जा सके । नेपाल को इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि इसके लिए काफी आंतरिक चर्चा और मजबूत होमवर्क की जरूरत है ।



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